मोदी सरकार पर कांग्रेस का तीखा प्रहार: 'मजदूर विरोधी' नीतियों की आलोचना कर लेबर कोड की समीक्षा की मांग

मजदूर दिवस पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का केंद्र पर बड़ा हमला, मनरेगा की बहाली और 400 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी लागू करने की रखी मांग।
Congress National President Mallikarjun Kharge
कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे
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नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के मौके पर कांग्रेस पार्टी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला है। मुख्य विपक्षी दल ने सरकार को पूरी तरह से 'मजदूर विरोधी' करार देते हुए नए लेबर कोड (श्रम संहिताओं) की तत्काल समीक्षा करने की मांग उठाई है। इसके साथ ही मनरेगा योजना को फिर से मजबूत करने और देशभर में 400 रुपये प्रतिदिन का राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन लागू करने पर भी जोर दिया गया है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर हिंदी में एक पोस्ट साझा करते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने देश में वर्तमान बेरोजगारी के हालात को सीधे तौर पर सरकार की 'हम दो, हमारे दो' की नीतियों का ही नतीजा बताया।

खरगे ने कहा कि इसी नीति से प्रेरित होकर मोदी सरकार ने जो नया लेबर कोड लागू किया है, वह पूरी तरह से श्रमिकों के खिलाफ है। इसके परिणामस्वरूप आज हर जगह असंतोष पनप रहा है। नोएडा से लेकर पानीपत स्थित आईओसीएल (IOCL) प्लांट, रायखेड़ा में अदाणी की फैक्ट्री, पतरातू के एनटीपीसी (NTPC) और श्रीपेरंबुदूर स्थित सैमसंग की फैक्ट्री तक, हर जगह मजदूरों का गुस्सा फूट रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष के मुताबिक, नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय यह नया कानून ठेका मजदूरी (कॉन्ट्रैक्ट लेबर) और 'हायर एंड फायर' (जब चाहो नौकरी पर रखो, जब चाहो निकाल दो) जैसी शोषक प्रथाओं को बढ़ावा दे रहा है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने इस लेबर कोड की जल्द से जल्द समीक्षा करने की आवश्यकता जताई है।

मनरेगा को लेकर भी सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। खरगे ने दावा किया कि मोदी सरकार ने संसद में जबरन कानून पारित करवाकर इस अहम रोजगार गारंटी योजना को व्यावहारिक रूप से खत्म कर दिया है। उन्होंने बताया कि अब मजदूरी का 40 प्रतिशत वित्तीय बोझ राज्य सरकारों के कंधों पर डाल दिया गया है।

राज्य सरकारें इतना भारी आर्थिक तनाव उठाने में असमर्थ हैं, जिसके चलते अंततः उन्हें यह काम रोकना ही पड़ेगा। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र की नीतियों ने मजदूरों को बेरोजगारी के दलदल में धकेल दिया है और उन्हें मजबूरी में 'गिग वर्क' की तरफ जाने के लिए विवश कर दिया है।

आंकड़ों का हवाला देते हुए खरगे ने बताया कि वर्तमान में देश का 69 प्रतिशत कार्यबल निर्धारित वैधानिक न्यूनतम वेतन से भी कम पैसों पर काम करने को मजबूर है। उन्होंने सरकार पर जानबूझकर मजदूरी को स्थिर रखने और एक बड़ा संकट पैदा करने का आरोप लगाया।

महंगाई को ध्यान में रखते हुए देखा जाए तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। पिछले एक दशक यानी वर्ष 2014-15 से लेकर 2022-23 के बीच भारत के अधिकांश श्रमिकों की मजदूरी में सालाना 1 प्रतिशत से भी कम की वृद्धि दर्ज की गई है।

शिक्षित युवाओं और खासकर स्नातकों के बीच फैली भयानक बेरोजगारी का जिक्र करते हुए कांग्रेस ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) को धड़ल्ले से बेचने के कारण नौकरियां खत्म हुई हैं। सरकार ने जानबूझकर करीब 30 लाख खाली पड़े सरकारी पदों को नहीं भरा है। इतना ही नहीं, सरकार की गलत नीतियों के कारण सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सेक्टर भी पूरी तरह से तबाह हो गया है।

इन तमाम मुद्दों के बीच कांग्रेस ने देश के श्रमिकों के हक में अपनी पांच प्रमुख मांगों को फिर से दोहराया है। इनमें मनरेगा को पुनर्जीवित कर इसे शहरी क्षेत्रों तक विस्तारित करना और मनरेगा को शामिल करते हुए 400 रुपये प्रतिदिन का राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन तय करना मुख्य रूप से शामिल है। इसके अलावा, मजदूरों और कामगारों के लिए 25 लाख रुपये तक का 'यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज' प्रदान करने वाला 'स्वास्थ्य का अधिकार' (Right to Health) कानून बनाने की मांग भी की गई है।

अंत में कांग्रेस ने सभी असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा का सुरक्षा कवच देने पर भी खासा जोर दिया। खरगे ने स्पष्ट किया कि रोजगार के संविदाकरण यानी ठेकेदारी प्रथा को रोकना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और मजदूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए नए लेबर कोड्स की हर हाल में समीक्षा की जानी चाहिए।

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