
नई दिल्ली- आईआईटी दिल्ली के ड्रोणागिरी हॉस्टल में नवरात्रि के दौरान चिकन और अंडे की सर्विंग बंद किए जाने को लेकर छात्रों में विवाद खड़ा हो गया है। हॉस्टल में पहले से ही वेज और नॉन-वेज के लिए अलग मेस, अलग किचन और डाइनिंग एरिया मौजूद होने के बावजूद नॉन-वेज छात्रों की मांग को नजरअंदाज कर दिया गया, जिसके चलते व्हाट्सएप ग्रुप में गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमले शुरू हो गए।
द मूकनायक के साथ शेयर की जानकारी में छात्रों ने बताया कि नव रात्रि के मौके पर पूरे हॉस्टल मेस में चिकन और अंडे की सर्विस अस्थायी रूप से बंद कर दी गई है, जो राम नवमी तक चलेगी। ड्रोणागिरी हॉस्टल में वेजिटेरियन छात्रों की मांग पर अलग मेस और अलग किचन की व्यवस्था पहले से ही लागू है। नॉन-वेज छात्रों का तर्क है कि जब इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से अलग-अलग है, तो एक हफ्ते के लिए नॉन-वेज सर्विस क्यों रोकी जाए? उन्होंने इसे “प्योरिटी” और “वेजिटेरियन छात्रों के फायदे में एडजस्टमेंट” के नाम पर थोपा गया निर्णय बताया।
इस मुद्दे पर हॉस्टल के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में बहस तेज हो गई। नॉन-वेज छात्रों पर “अशुद्ध” और “संस्कृति विरोधी” होने के आरोप लगाए गए। इसके जवाब में नॉन-वेज छात्रों ने भी तीखे पलटवार किए। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि छात्रों ने सामूहिक रूप से डीन ऑफ डाइवर्सिटी एंड इंक्लूजन को ईमेल भेजकर इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की।
ईमेल को जानबूझकर रेडिट पर लीक कर दिया गया, जहां इसे “शुद्ध वेजिटेरियन आईआईटी” और “धार्मिक थोपना” जैसे टैग के साथ शेयर किया गया। पोस्ट में कई कमेंट्स में गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमले हुए। अंततः रेडिट मॉडरेटर ने पोस्ट को प्राइवेसी ब्रेक के कारण डिलीट कर दिया।
ड्रोणागिरी हॉस्टल में वेज और नॉन-वेज की अलग व्यवस्था वेजिटेरियन छात्रों की पुरानी मांग पर ही की गई थी। नॉन-वेज छात्रों का कहना है कि जब किचन और डाइनिंग एरिया पूरी तरह अलग हैं, तो नव रात्रि जैसे त्योहार के नाम पर पूरी हॉस्टल की सर्विस रोके जाने का कोई तार्किक आधार नहीं है। उन्होंने कहा, “हम एक हफ्ते के लिए एडजस्ट कर सकते हैं, लेकिन जब इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से उपलब्ध है, तो यह अनावश्यक दबाव है।” स्टूडेंट्स कहते हैं मेस में खाना हर किसी के लिए होता है, चाहे उसका बैकग्राउंड कुछ भी हो। व्रत रखना एक निजी मामला है और इससे दूसरों के खाने की पसंद में दखल नहीं देना चाहिए। अगर आप मांस नहीं खा रहे हैं, तो बस मत खाइए; अपनी विचारधारा दूसरों पर थोपने की कोशिश मत कीजिए।
वेजिटेरियन पक्ष का तर्क है कि त्योहार के दौरान “शुद्धता” बनाए रखना जरूरी है और पूरे कैंपस में एक जैसी संस्कृति होनी चाहिए। नॉन वेज की डिमांड करने वाले स्टूडेंट्स ने बताया कि वार्डन को इस मुद्दे से अवगत करवा दिया है और उन्होंने रविवार को इसपर विचार का आश्वाशन दिया लेकिन वीकेंड होने की वजह से छात्रों को उम्मीद है कि होस्टल प्रशासन सोमवार को इसपर रेस्पोंड करेगा।
यह विवाद आईआईटी दिल्ली तक सीमित नहीं है। कुछ समय पहले साउथ एशियन यूनिवर्सिटी (SAU) दिल्ली में नव रात्रि के दौरान नॉन-वेज भोजन निलंबित करने के फैसले पर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। वहां भी छात्रों ने इसे “धार्मिक थोपना” और “डाइटरी फ्रीडम पर हमला” बताया था।
आईआईटी दिल्ली में पहले भी नॉन-वेज मेस चार्जेस और अलग व्यवस्था को लेकर विवाद हो चुके हैं।
2023 में IIT बॉम्बे में छात्रों ने हॉस्टल मेस में छह मेज़ों को "सिर्फ़ शाकाहारियों के लिए" तय किए जाने का विरोध करते हुए, जान-बूझकर उन मेज़ों पर मांसाहारी खाना खाया। इससे एक टकराव की स्थिति पैदा हो गई, और नियमों को चुनौती देने के लिए कुछ छात्रों पर भारी जुर्माना लगाया गया।
2025 में IIT खड़गपुर प्रशासन को एक नोटिस वापस लेना पड़ा, जिसमें छात्रों की खाने की पसंद के आधार पर उनके बैठने के लिए अलग इंतज़ाम का सुझाव दिया गया था; भारी विरोध के बाद प्रशासन ने इस फ़ैसले को पलटने का वादा किया।
2018 में IIT मद्रास में शाकाहारी और मांसाहारी छात्रों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार और वॉशबेसिन होने की खबरें सामने आईं, जिससे छात्रों के बीच काफ़ी नाराज़गी फैल गई।
2022 में IIT रुड़की में छात्रों ने एक हॉस्टल आज़ाद भवन में मांसाहारी खाना शुरू किए जाने का विरोध किया; इस हॉस्टल को पहले कट्टर शाकाहारियों के लिए एक सुरक्षित जगह माना जाता था।
नॉन वेज खाने वाले स्टूडेंट्स का तर्क है कि शाकाहारियों के लिए अलग से टेबल तय करना, साझा डाइनिंग स्पेस को "दूषित" करता है; ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इसमें माँस खाने वाले छात्रों को जो अक्सर निचली जाति या अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि से आते हैं, "अपवित्र" माना जाता है।
धार्मिक या व्यक्तिगत मान्यताओं का सम्मान करने के लिए केवल शाकाहारियों के लिए अलग जगहें बनाने और एक साझा, समावेशी कैंपस माहौल बनाए रखने की दो विचारधारा के बीच इससे टकराव पैदा होता है।
ज़्यादातर मामलों में, अलगाव की इन पहलों को संस्थान की आधिकारिक नीति के बजाय, स्थानीय मेस स्टाफ़ या कैफ़ेटेरिया प्रबंधन द्वारा शुरू की गई पहल के तौर पर बताया जाता है ; जिसके बाद इस मामले को सुलझाने के लिए उच्च-स्तरीय हस्तक्षेप की ज़रूरत पडती है।
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