"मुझे शूर्पणखा कहा जाना मेरी ताकत, गालियां मिलना हमारी जीत": दिल्ली में गूंजी मुखर स्त्रियों और नए भारत के युवाओं की आवाज

दिल्ली में 'मेरा रंग फाउंडेशन' के मंच से मुखर स्त्रियों की हुंकार- राजनीति और समाज में महिलाओं को चुप कराने की साजिशों और ट्रोलिंग पर युवा वक्ताओं का कड़ा प्रहार।
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दिल्ली में 'मेरा रंग फाउंडेशन' के मंच पर RJD प्रवक्ता प्रियंका भारती ने ट्रोल्स को दिया करारा जवाब। जानें राजनीति में मुखर स्त्रियों और नई पीढ़ी पर क्या बोले वक्ता।
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नई दिल्ली। "अगर मुझे शूर्पणखा कहा जाता है, तो मैं इसे अपनी ताकत और उस साहसी स्त्री के प्रतीक के रूप में देखती हूं, जो अपनी इच्छाओं को बेबाकी से स्वीकार करती है।" राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका भारती का यह बयान सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के संघर्ष और उनके कड़े प्रतिरोध की एक नई तस्वीर पेश करता है। अवसर था ‘मेरा रंग फाउंडेशन’ के दस वर्ष पूरे होने पर आयोजित एक खास परिचर्चा का।

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ‘बदलाव की आहट : नई पीढ़ी, नए सवाल’ विषय पर एक बेहद गंभीर और सार्थक मंथन आयोजित किया गया। इस मंच पर मीडिया, राजनीति, अभिव्यक्ति और स्त्री की मुखरता को लेकर कई अहम सवाल उठाए गए। परिचर्चा का शानदार संचालन न्यूज़लॉन्ड्री हिंदी के मैनेजिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार अतुल चौरसिया ने किया। उन्होंने नई पीढ़ी द्वारा समाज और राजनीति में लाए जा रहे बदलावों की दिशा पर पैनल में शामिल युवाओं से तीखे सवाल पूछे।

चर्चा के दौरान जेन-ज़ी (Gen-Z) की प्रचलित महानगरीय छवि को तोड़ने का भी आह्वान किया गया। लोक गायिका नेहा सिंह राठौर ने स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी का मतलब सिर्फ ढीले कपड़े पहनकर ‘कूल’ दिखने वाले युवा नहीं हैं। उन्होंने कहा कि असली जेन-ज़ी उन छोटे शहरों और कस्बों का युवा भी है, जो अपनी आजीविका के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने समाज द्वारा मुखर स्त्रियों को आसानी से न स्वीकारे जाने की विडंबना पर भी गहरी चोट की।

सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के चरित्र हनन के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता नेहा यादव ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को चुप कराने का सबसे आसान हथियार उनके चरित्र पर सवाल उठाना बना दिया गया है। वैचारिक आलोचना की जगह महिलाओं को अक्सर व्यक्तिगत हमलों का सामना करना पड़ता है।

इसी मुद्दे पर आरजेडी प्रवक्ता प्रियंका भारती ने सोशल मीडिया की ट्रोलिंग को अपनी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि जिस दिन गालियां पड़नी बंद हो जाएंगी, समझो हमारी धार कमजोर पड़ गई है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के नाम पर मिलने वाले अपशब्दों को भी उन्होंने उसी वैचारिक विरासत का सम्मान बताकर गर्व के साथ स्वीकार किया।

स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर श्याम मीरा सिंह ने युवाओं की अभिव्यक्ति के नए डिजिटल रास्तों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज का युवा अपनी अभिव्यक्ति की जगह तलाश रहा है और जन आंदोलनों को इसी खोज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए। वहीं, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने पत्रकारिता की अपनी पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए लोकतंत्र और राजनीतिक दलों में नई पीढ़ी के प्रतिनिधित्व पर बेबाक राय रखी।

कार्यक्रम की शुरुआत में मेरा रंग फाउंडेशन की संस्थापक और मैनेजिंग ट्रस्टी शालिनी श्रीनेत ने संस्था के 10 साल के लंबे सफर की यादें ताजा कीं। साल 2016 में सोशल मीडिया के एक छोटे से प्रयास से शुरू हुई यह संस्था आज महिला अधिकारों, घरेलू हिंसा के खिलाफ और लैंगिक समानता की मजबूत आवाज बन चुकी है।

मुख्य संवाद से पूर्व ‘द त्रिपाठी सिस्टर्स’ (आयुषी और टियारा त्रिपाठी) ने स्त्री शक्ति पर केंद्रित एक मनमोहक ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किया। शास्त्रीय नृत्य से जुड़ी इन दोनों कलाकारों ने अपनी कला के जरिए कार्यक्रम के मूल विषय को बेहद खूबसूरती से दर्शकों के सामने रखा।

इस खास मौके पर महिला अधिकारों और जेंडर जस्टिस के लिए लंबे समय से काम कर रहीं अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति गोयल को ‘रंग साहस’ सम्मान से नवाजा गया। उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान हिंदी के जाने-माने कवि-कथाकार अरुण आदित्य ने प्रदान किया।

कार्यक्रम का एक और प्रमुख आकर्षण फौजिया दास्तानगो की प्रस्तुति रही। उन्होंने अपनी विशिष्ट दास्तानगोई शैली में स्त्रीवादी कविताओं का पाठ किया, जिसने महिलाओं के जीवन की सामाजिक विडंबनाओं और उनकी स्वतंत्रता के सवालों को जीवंत कर दिया।

आयोजन में एसिड अटैक सर्वाइवर्स के पुनर्वास के लिए काम करने वाले 'छांव फाउंडेशन' की भी अहम सहभागिता रही। कार्यक्रम के अंत में कथाकार और उपन्यासकार विवेक मिश्र ने सभी वक्ताओं, कलाकारों, सहयोगी संस्थाओं और भारी संख्या में उपस्थित युवाओं का आभार व्यक्त करते हुए इस सफल आयोजन का समापन किया।

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