प्रयागराज: महाकुंभ और विज्ञापनों पर करोड़ों लुटाते तंत्र के बीच, 'बांस के पुल' पर हिचकोले खाते स्कूल जा रहे नौनिहालों का कैसा होगा भविष्य?

प्रयागराज के फूलपुर में विकास की पोल खोलती तस्वीर, जहां करोड़ों के विज्ञापन और महाकुंभ के बजट के बीच बच्चे जान जोखिम में डालकर स्कूल जाने को मजबूर हैं।
Phulpur Kotwa village Prayagraj
स्मार्ट सिटी और करोड़ों के विज्ञापनों के बीच प्रयागराज के विकास की यह जमीनी हकीकत हैरान करने वाली है।फोटो साभार- अनामिका, रवि राज
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प्रयागराज: देश ने हाल ही में अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया है। शहरों की जगमगाती इमारतों और लाल किले की प्राचीर से दिखने वाली आज़ादी की भव्य तस्वीर के पीछे, असल भारत की एक बेहद मार्मिक और कड़वी सच्चाई छिपी है। यह सच्चाई मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते उन लोगों की है, जिनकी आवाज़ विकास के शोर में दब गई है।

यह कहानी स्मार्ट सिटी कहे जाने वाले प्रयागराज के फूलपुर विधानसभा क्षेत्र स्थित कोटवा गांव की है। मुख्य रूप से निषाद और सोनकर बहुल इस इलाके के लोग आज भी एक अदद रास्ते के लिए तरस रहे हैं। यहां के उच्च प्राथमिक विद्यालय तक पहुंचने के लिए कोई सुरक्षित सड़क नहीं है।

Phulpur Kotwa village
गांव के लोगों और स्कूल जाने वाले छात्रों के लिए पुल नहीं है. जिससे पानी में या बांस के बने पुल से होकर जाना पड़ता है.फोटो साभार- अनामिका, रवि राज

शिक्षा के मौलिक अधिकार को पाने के लिए यहां के स्कूली बच्चे रोज़ाना अपनी जान जोखिम में डालते हैं। ये मासूम बच्चे, जिन्हें आज के दौर में 'जेन अल्फा' कहा जाता है, तालाब में तब्दील हो चुके गहरे पानी के बीच से गुजरने और एक जर्जर बांस-लकड़ी के पुल के सहारे स्कूल जाने को विवश हैं। यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि पिछले 10 से 15 वर्षों से यहां के बच्चे इसी तरह शिक्षा की ओर तैरकर पहुंच रहे हैं।

तुलना कीजिए कि एक तरफ महानगरों के आधुनिक स्कूल हैं और दूसरी तरफ कोटवा गांव का यह विद्यालय, जहां तक पहुंचने का रास्ता भी सरकार मयस्सर नहीं करा पाई है। स्थानीय लोगों ने कई बार आला अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन सरकारी फाइलों में उनकी शिकायतें कहीं दफन हो गईं और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

UP education system, Phulpur Kotwa village
पानी भरे रास्ते से होकर स्कूल जाते छात्रफोटो साभार- अनामिका, रवि राज

गांव के एक बुजुर्ग, अपना नाम न छापने की शर्त पर, इस व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हैं। उनका कहना है कि हर दिन जान जोखिम में डालकर बच्चे स्कूल जाते हैं।

यह उन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के लिए शर्म का विषय है जो वोट के लिए विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं। वर्तमान में यहां के सांसद प्रवीन पटेल और विधायक दीपक पटेल हैं, दोनों ही सत्ताधारी दल बीजेपी से आते हैं।

गांव के एक बुजुर्ग

प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि प्रयागराज के जिलाधिकारी मनीष वर्मा से जब इस गंभीर मसले पर बात करने का प्रयास किया गया, तो उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। ऐसा प्रतीत होता है कि दशकों से संघर्ष कर रहे ग्रामीणों के प्रार्थना पत्रों को सरकारी मशीनरी ने समोसा-पकौड़ी खाकर इसी बारिश के पानी में फेंक दिया है।

हालात से हार मानने के बजाय, स्थानीय ग्रामीणों ने अपने बच्चों के भविष्य को संवारने का बीड़ा खुद उठाया है। उन्होंने जलमग्न हो चुके मार्ग पर अपने सीमित संसाधनों से लकड़ी का एक अस्थायी पुल तैयार किया है, ताकि नौनिहालों के कदम स्कूल तक पहुंच सकें। ग्रामीणों के इस जज्बे की सराहना की जानी चाहिए।

UP education system, Phulpur Kotwa village
स्कूली छात्रों के समाने मजबूरी है जलमग्न रास्ते से होकर जाने आने के लिए.फोटो साभार- अनामिका, रवि राज

इस बदहाली के बीच सरकारी खर्चों के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले आठ सालों में योगी सरकार ने अपने प्रचार-प्रसार पर 6800 करोड़ रुपये फूंके हैं, जिसका अर्थ है कि हर दिन लगभग 2 करोड़ रुपये केवल विज्ञापनों पर खर्च हुए हैं। इसके साथ ही, कांवड़ यात्रा पर फूल बरसाने और महाकुंभ के नाम पर लाखों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं।

धर्म और प्रचार के लिए खजाना खोल देने वाली सरकार के पास इन मासूमों के भविष्य की नींव मजबूत करने का ना तो वक्त है और ना ही इच्छाशक्ति। स्मार्ट सिटी के दावों के बीच, कोटवा गांव का यह जर्जर लकड़ी का पुल सत्ता से सीधा सवाल कर रहा है कि क्या शिक्षा का मौलिक अधिकार केवल कागजों तक ही सीमित है?

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