
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा के अधिकार को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE), काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) या किसी भी अन्य शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त कोई भी प्राइवेट स्कूल आरटीई अधिनियम, 2009 के नियमों से बच नहीं सकता है। यह कानून 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को एक मौलिक अधिकार के रूप में सुनिश्चित करता है।
भदोही जिले के पचवल स्थित बभनौटी के सेंट जॉन्स स्कूल द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण आदेश दिया गया। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर ने उत्तर प्रदेश सरकार को कड़े निर्देश दिए। अदालत ने राज्य सरकार से पिछले पांच वर्षों का स्कूल-वार डेटा पेश करने को कहा है, जिससे यह पता चल सके कि कितने बच्चों को आरटीई कानून का लाभ मिला है।
हाईकोर्ट ने सरकार से उन सभी बच्चों का विस्तृत विवरण मांगा है जिन्हें इस अधिनियम के तहत प्रवेश दिया गया है। इसके साथ ही, अदालत ने उन मामलों की भी सख्त जानकारी मांगी है जहां राज्य भर के स्कूलों द्वारा या तो बच्चों को दाखिले से इनकार कर दिया गया या फिर उनके आवेदनों पर कोई भी कार्रवाई नहीं की गई। कोर्ट ने डोनेशन (कैपिटेशन फीस) वसूलने या शिक्षा मानकों के खिलाफ जाकर स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं के इस्तेमाल से जुड़ी शिकायतों का भी ब्योरा तलब किया है। इसके अलावा, सरकार को यह भी बताना होगा कि ऐसी शिकायतों पर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के संज्ञान में यह बात आई है कि राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त कुछ निजी शिक्षण संस्थान बच्चों को दाखिला देने में आनाकानी कर रहे हैं। ये स्कूल अपनी सामान्य फीस और अन्य शुल्कों का मोह छोड़ने को तैयार नहीं हैं। शिक्षण संस्थानों के इसी रवैये को देखते हुए अदालत ने सरकार से एक विस्तृत हलफनामा दायर करने को कहा है।
अदालत ने राज्य सरकार के वकील को निर्देश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई की तारीख 15 सितंबर तक हर हाल में हलफनामा दाखिल कर दिया जाए। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि सीबीएसई, सीआईएससीई और अन्य सभी बोर्डों से संबद्ध स्कूलों को इस पूरी जांच प्रक्रिया में प्रशासन का सहयोग करना होगा। इन सभी संस्थानों को मांगी गई जानकारी जुटाने के लिए संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) और जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) की अनिवार्य रूप से मदद करनी होगी।
जस्टिस दिवाकर ने अपने आदेश के अंत में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह सारी जानकारी केवल इसलिए मांगी जा रही है ताकि अदालत के सामने शिक्षा व्यवस्था की एक पूरी तस्वीर उभर कर आ सके। उन्होंने साफ किया कि फिलहाल कोर्ट ने किसी भी स्कूल के आचरण को लेकर कोई भी राय नहीं बनाई है। अदालत ने यह भी भरोसा दिया कि बिना उचित नोटिस दिए और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, इस जानकारी के आधार पर किसी भी शिक्षण संस्थान के खिलाफ कोई भी अनुचित कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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