
नई दिल्ली। सीपीआई (CPI) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने सोमवार को गौतम बुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने नोएडा में हाल ही में हुए मजदूर आंदोलन के बाद बड़े पैमाने पर की गई अवैध हिरासतों और कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया है। इसके साथ ही उन्होंने प्रशासन से तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की है।
वामपंथी नेता ने 17 अप्रैल को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ हुई अपनी टेलीफोनिक बातचीत का हवाला दिया। उन्होंने पुलिस से वेतन वृद्धि और काम करने की स्थिति में सुधार की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हिरासत में लिए गए एक हजार से अधिक श्रमिकों और अन्य लोगों को रिहा करने का आग्रह किया।
अपने पत्र में सांसद ने ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन (AILU), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल द्वारा तैयार की गई एक 'फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट' का जिक्र किया है। उन्होंने दावा किया कि 13 से 17 अप्रैल के बीच की गई गिरफ्तारियों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों की स्पष्ट रूप से अनदेखी की गई है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक स्थानों, कार्यस्थलों और आवासीय क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रमिकों, राहगीरों, महिलाओं और नाबालिगों को बिना किसी स्थापित कानूनी प्रक्रिया के उठा लिया गया। यह दावा किया गया है कि अकेले कासना में लगभग 350 नाबालिगों और करीब 800 वयस्कों को हिरासत में लिया गया था। हालात ये थे कि उनके परिवारों को कई दिनों तक उनके ठिकानों के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गई।
पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि कई मामलों में बंदियों को एफआईआर (FIR) की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गईं या उन्हें गिरफ्तारी का कारण तक नहीं बताया गया। इस वजह से इन लोगों के लिए कानूनी उपचार और अपना पक्ष रखने का अधिकार प्राप्त करना बेहद मुश्किल हो गया।
संवैधानिक सुरक्षा उपायों के अनुपालन पर चिंता व्यक्त करते हुए नेता ने कहा कि ये आरोप सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य प्रक्रियाओं के उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं। इन प्रक्रियाओं में मजिस्ट्रेट के सामने समय पर पेशी और कानूनी परामर्श का अधिकार प्रमुख रूप से शामिल है।
सांसद के इस पत्र में नोएडा और भंगेल में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) के कार्यालयों को सील किए जाने का भी मुद्दा उठाया गया है। इसके अलावा, जिला सचिव गंगेश्वर दत्त शर्मा और अन्य पदाधिकारियों सहित ट्रेड यूनियन नेताओं को लंबे समय तक घर में नजरबंद (हाउस अरेस्ट) रखने का आरोप लगाया गया है।
मौजूदा स्थिति को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए सांसद ने पुलिस से सभी गिरफ्तारियों और हिरासतों की तुरंत समीक्षा करने की अपील की। उन्होंने बिना पर्याप्त आधार के पकड़े गए लोगों को रिहा करने, उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने, बंदियों को कानूनी मदद उपलब्ध कराने और ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर लगे प्रतिबंधों को हटाने का आग्रह किया।
पुलिसिंग में संयम और वैधानिकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए पत्र में कहा गया है कि मनमानी या बलपूर्वक कार्रवाई की कोई भी धारणा तनाव को और भड़का सकती है। ऐसा होने से कानून व्यवस्था से आम जनता का विश्वास भी कम होगा।
गौरतलब है कि पिछले सप्ताह नोएडा में बड़े पैमाने पर मजदूर आंदोलन हुआ था। इस दौरान महिलाओं सहित हजारों कारखाने के कर्मचारी वेतन वृद्धि और बेहतर कार्य स्थितियों की मांग को लेकर हड़ताल पर चले गए थे।
देखते ही देखते कुछ हिस्सों में यह आंदोलन हिंसक हो गया था। इस दौरान आगजनी, पथराव और तोड़फोड़ की कई घटनाएं सामने आई थीं, जिससे इलाके में तनाव का माहौल बन गया था।
इन घटनाओं पर पुलिस का कहना है कि स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए केवल हल्के बल का प्रयोग किया गया था। हालांकि, विरोध प्रदर्शनों से निपटने के पुलिस के इस तरीके की काफी आलोचना भी हुई है।
इस बीच, हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रमिक श्रेणियों में न्यूनतम मजदूरी में अंतरिम वृद्धि की घोषणा कर दी है। राहत की बात यह है कि ये संशोधित दरें 1 अप्रैल से पूर्वव्यापी प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू की गई हैं।
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