उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर जाकर जनजातियों से संपर्क की कोशिश ट्रैवल यूट्यूबर को पड़ा भारी, हो सकती है 5 साल की जेल

बिना अनुमति दुनिया के सबसे खतरनाक 'उत्तरी सेंटिनल द्वीप' पहुंचे यूट्यूबर मिखाइल पोलियाकोव, सेंटिनली जनजाति से संपर्क की कोशिश में अब खानी पड़ सकती है 5 साल की जेल की हवा।
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ट्रैवल यूट्यूबर मिखाइल पोलियाकोव ने भारत के प्रतिबंधित 'उत्तरी सेंटिनल द्वीप' पर घुसपैठ की। खतरनाक सेंटिनली जनजाति से संपर्क करने की कोशिश में हुई गिरफ्तारी, हो सकती है 5 साल की सजा।
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नई दिल्ली: एक मशहूर ट्रैवल यूट्यूबर को अपने एक खतरनाक रोमांच के चक्कर में भारी कानूनी संकट का सामना करना पड़ रहा है। मिखाइल पोलियाकोव (Mykhailo Polyakov) नाम के इस यूट्यूबर पर बिना अनुमति के एक बेहद संवेदनशील और प्रतिबंधित आदिवासी क्षेत्र में घुसपैठ करने का गंभीर आरोप है। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, यह पूरा मामला साल 2025 में उनकी उत्तरी सेंटिनल द्वीप (North Sentinel Island) की अवैध यात्रा से जुड़ा है।

यह दुनिया की एक ऐसी जगह है जहां बाहरी लोगों के जाने पर पूरी तरह से पाबंदी है। अगर पोलियाकोव दोषी साबित होते हैं, तो उन्हें पांच साल तक की जेल हो सकती है।

अधिकारियों ने बताया कि मिखाइल पोलियाकोव न केवल इस प्रतिबंधित द्वीप के करीब पहुंचे, बल्कि उन्होंने वहां रहने वाली सेंटिनली जनजाति से संपर्क साधने की भी दुस्साहसिक कोशिश की। बताया जा रहा है कि उन्होंने द्वीप के किनारे पर एक नारियल और एक डाइट कोक (Diet Coke) का कैन छोड़ दिया था।

इस हरकत ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं, क्योंकि यह जनजाति बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई है और किसी भी तरह के संपर्क से हिंसक रूप से बचती है। भारतीय पुलिस द्वारा उनकी इन संदिग्ध गतिविधियों की पुष्टि होने के बाद ही इस मामले का खुलासा हुआ और उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

उत्तरी सेंटिनल द्वीप सेंटिनली जनजाति का इकलौता घर है, जिन्हें दुनिया के सबसे अलग-थलग रहने वाले समुदायों में गिना जाता है। भारत सरकार ने इस आदिम जनजाति के अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए बेहद सख्त नियम बनाए हैं।

किसी भी बाहरी व्यक्ति को इस द्वीप के आस-पास जाने तक की इजाजत नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य इन आदिवासियों को बाहरी दुनिया की उन बीमारियों से बचाना है, जिनसे लड़ने की क्षमता उनके शरीर में नहीं होती।

जांचकर्ताओं का कहना है कि पोलियाकोव ने अपनी इस घुसपैठ की योजना कई महीनों पहले से बनानी शुरू कर दी थी। खबरों के मुताबिक, उसने अपनी इस गैरकानूनी यात्रा के कई हिस्सों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की है। यहां तक कि उसने सीटी बजाकर इन आदिवासियों का ध्यान अपनी ओर खींचने की भी गुस्ताखी की थी।

किनारे पर अपना सामान (नारियल और कोक) छोड़ने के बाद वह वहां से लौट आया था, लेकिन महज दो दिन बाद ही उसे पुलिस ने धर दबोचा। अब अधिकारी उसके खिलाफ कोर्ट में अपना मामला मजबूत करने के लिए उसके यात्रा रिकॉर्ड और कैमरे में मौजूद वीडियो सबूतों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस घटना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी आलोचना हो रही है। वैश्विक आदिवासी अधिकार समूह 'सर्वाइवल इंटरनेशनल' (Survival International) ने इस कृत्य पर सख्त नाराजगी जताई है। संस्था की निदेशक कैरोलिन पियर्स (Caroline Pearce) ने इस हरकत को "लापरवाह और मूर्खतापूर्ण" करार दिया है।

उन्होंने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि इस तरह के बेवकूफाना कदम न केवल बाहरी व्यक्ति के लिए, बल्कि उस पूरी जनजाति के लिए भी जानलेवा साबित हो सकते हैं।

इस खतरनाक द्वीप पर इस तरह का जानलेवा वाकया पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले साल 2018 में, जॉन एलन चाऊ (John Allen Chau) नाम के एक अमेरिकी नागरिक की इस द्वीप पर जाने की कोशिश में तीर लगने से जान चली गई थी। वहीं, उससे बहुत पहले 2006 में भी दो मछुआरे गलती से अपनी नाव भटकने के कारण इस द्वीप के बहुत करीब पहुंच गए थे और उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। ये पुरानी घटनाएं साफ तौर पर बताती हैं कि सरकार ने इस इलाके की घेराबंदी के लिए इतने कड़े नियम क्यों बनाए हैं।

भारत में ऐसे मामलों और जनजातियों की सुरक्षा से निपटने के लिए 'अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन' (Andaman and Nicobar Islands Protection of Aboriginal Tribes Regulation) नाम का एक विशेष कानून लागू है। इस कानून के तहत बिना पूर्व अनुमति के संरक्षित क्षेत्रों में प्रवेश करना एक बेहद गंभीर अपराध माना जाता है।

इसमें भारी जुर्माने के साथ-साथ कड़ी जेल की सजा का भी प्रावधान है। अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यह कानून सिर्फ बाहरी लोगों की सुरक्षा के लिए नहीं है, बल्कि इस जनजाति की जीवनशैली और उनके एकांत का सम्मान करने के लिए भी है।

मिखाइल पोलियाकोव का यह मामला फिलहाल भारतीय अदालत में चल रहा है और इस पर अगली सुनवाई 29 अप्रैल को तय की गई है। फिलहाल इस घटना ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारी पृथ्वी पर कुछ जगहों को उनके हाल पर छोड़ देना ही सबके लिए सबसे बेहतर है।

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