लखनऊ में तैयार हो रहा है डॉ. आंबेडकर का नया स्मारक: जानिए क्या हैं इसकी खूबियां और राजनीतिक मायने

यूपी चुनाव 2027 से पहले लखनऊ में 100 करोड़ की लागत से तैयार हो रहा नया डॉ. आंबेडकर स्मारक, जानें मायावती के बनाए पार्क से यह कैसे है अलग।
New Ambedkar Memorial Lucknow
यूपी में 100 करोड़ की लागत से नया डॉ. आंबेडकर स्मारक बनकर तैयार हो रहा है।(Ai Image)
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उत्तर प्रदेश: मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सरकार द्वारा लखनऊ के गोमती नगर में बनाए गए विशाल आंबेडकर स्मारक के लगभग दो दशक बाद, शहर में डॉ. बी.आर. आंबेडकर को समर्पित एक और स्मारक बनकर लगभग तैयार है।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इसके लिए जुलाई का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह समय सीमा 2027 की शुरुआत में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों से काफी पहले तय की गई है ताकि इसे समय पर जनता को समर्पित किया जा सके।

ऐशबाग में ईदगाह के ठीक सामने 5,493.52 वर्ग मीटर क्षेत्र में बन रहे इस 'भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मारक एवं सांस्कृतिक केंद्र' को केवल एक पारंपरिक ढांचे के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसे एक बहुउद्देशीय सांस्कृतिक और संस्थागत परिसर के रूप में विकसित किया जा रहा है।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला साल 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा रखी गई थी।

अधिकारियों के अनुसार, शुरुआत में इस परियोजना के सिर्फ स्मारक हिस्से के लिए 45.04 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। हालांकि, समय के साथ इसका दायरा काफी बढ़ गया और अब इसमें कई नई चीजें शामिल की गई हैं।

ऑडिटोरियम, फिनिशिंग और बाहरी विकास जैसे अतिरिक्त कार्यों को विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से अलग-अलग चरणों में पूरा किया जा रहा है। इन व्यापक बदलावों के कारण परियोजना की कुल लागत अब 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुकी है।

गतिविधि-आधारित नया परिसर

मौजूदा आंबेडकर स्मारक मुख्य रूप से एक भव्य दर्शनीय स्थल है, लेकिन इस नए परिसर को एक 'गतिविधि-आधारित परिसर' (एक्टिविटी-बेस्ड कैंपस) के रूप में नया रूप दिया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य आम जनता की भागीदारी बढ़ाना और डॉ. आंबेडकर के विचारों पर अकादमिक शोध को बढ़ावा देना है।

इस परिसर के बिल्कुल बीचों-बीच डॉ. आंबेडकर की 25 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी, और इसी प्रतिमा के इर्द-गिर्द पूरे स्थल का विकास किया जा रहा है।

परियोजना में एक तीन मंजिला प्रशासनिक भवन, 500 सीटों की क्षमता वाला एक विशाल ऑडिटोरियम, एक कॉमन बेसमेंट और सबस्टेशन व पंप रूम जैसी जरूरी सहायक संरचनाएं भी शामिल की गई हैं।

अब तक चारदीवारी, प्रवेश द्वार, आंतरिक सड़कें और जल निकासी व्यवस्था का काम पूरा किया जा चुका है। वहीं बाहरी सजावट (फसाड फिनिशिंग), लैंडस्केपिंग और ऑडिटोरियम के भीतर का काम अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यह परियोजना केवल एक राजनीतिक प्रतीक मात्र नहीं है। इससे जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि यह केवल एक स्मारक नहीं रहेगा, बल्कि यह एक ऐसा सांस्कृतिक और संस्थागत परिसर बनेगा जहां लोगों को आंबेडकर के विचारों को गहराई से समझने का शानदार अवसर मिलेगा।

योजना के तहत यहां एक पुस्तकालय, संग्रहालय क्षेत्र, पिक्चर गैलरी और एक अनुसंधान केंद्र भी बनाया जा रहा है। इसके साथ ही बाहर से आने वाले शोधकर्ताओं के ठहरने के लिए आवासीय सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं।

राज्य सरकार इस नए शोध केंद्र को लखनऊ के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय से जोड़ने के एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर भी तेजी से काम कर रही है।

निर्माण कार्य को कई पैकेजों में बांटकर किया जा रहा है। मुख्य ढांचे का निर्माण 'कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज' (C&DS) कर रही है, जबकि डिजाइनिंग और विशेष कार्यों की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंपी गई है।

ढांचागत कार्य काफी हद तक पूरा कर लिया गया है और अब यह परियोजना फिनिशिंग व बाहरी विकास के अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच गई है।

जमीनी स्तर पर साफ नजर आ रही प्रगति के बीच अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इमारतों के बुनियादी ढांचे, चारदीवारी और ऑडिटोरियम का बाहरी आवरण तैयार है। यह परियोजना 2026 के मध्य तक पूरी होने की राह पर है और इसे जुलाई के आसपास आम लोगों के लिए खोलने का लक्ष्य रखा गया है।

चुनावी समीकरण और राजनीतिक महत्व

साल 2022 के चुनावों से पहले इसके शिलान्यास की तरह ही, इस परियोजना के पूरा होने का समय भी राजनीतिक नजरिए से बेहद मायने रखता है।

क्षितिज पर दिख रहे 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए, यह नया स्मारक दलित समुदायों के बीच भाजपा की पैठ को और मजबूत करने का काम कर सकता है। इसके जरिए सरकार खुद को आंबेडकर की विरासत के सच्चे संरक्षक और उनके विचारों को आधुनिक ज्ञान के साथ जोड़ने वाले दल के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।

दलित मतदाताओं को साधने पर भाजपा का यह नया फोकस उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों की पृष्ठभूमि में सामने आया है।

इन हालिया चुनावों में पार्टी की सीटें घटकर 36 रह गईं, जबकि 2019 में उसने राज्य की 80 में से 62 सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर एकतरफा दबदबा बनाया था। सीटों में आई इस भारी गिरावट का मुख्य कारण दलित समुदायों का समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के पक्ष में लामबंद होना माना गया।

इस चुनावी झटके के बाद भाजपा पूरी तरह से अपने सामाजिक समीकरणों को फिर से दुरुस्त करने में जुट गई है। इसी के तहत डॉ. आंबेडकर पर केंद्रित प्रतीकात्मक और संस्थागत पहलों पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के संस्कृति और पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने जानकारी दी कि इस परियोजना को तीन अलग-अलग चरणों में पूरा किया जा रहा है। पहले चरण के सभी काम खत्म हो चुके हैं और पूरी परियोजना को 15 जुलाई तक अंतिम रूप दे दिया जाएगा।

दो स्मारकों में क्या है अंतर?

नए परिसर और गोमती नगर के मौजूदा स्मारक के बीच का स्पष्ट अंतर बताते हुए मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि यह नई जगह पहले वाले स्मारक से बिल्कुल अलग और आधुनिक है। नए परिसर में पुस्तकालय, थिएटर, ऑडिटोरियम और अनुसंधान की बेहतर सुविधाएं मौजूद हैं, जहां स्कॉलर्स को हॉस्टल जैसी सुविधा भी दी जाएगी।

उन्होंने यह भी दावा किया कि नया स्मारक आधुनिक माध्यमों का उपयोग करके डॉ. आंबेडकर के विचारों के प्रसार पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करेगा। युवाओं और आम लोगों को शिक्षित करने के लिए यहां ऑडियो-विजुअल और वर्चुअल रियलिटी (VR) तकनीक के जरिए विशेष शो आयोजित किए जाएंगे।

पर्यटन मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि इसके अकादमिक हिस्से को डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय से जोड़ने के लगातार प्रयास जारी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से भविष्य में शैक्षणिक और शोध गतिविधियों को काफी मजबूती मिलेगी।

इस जगह की महत्ता को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि शहर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित होने के कारण यहां बड़ी संख्या में आगंतुकों और पर्यटकों का पहुंचना बहुत आसान हो जाएगा।

आंबेडकर पार्क का इतिहास

लखनऊ के गोमती नगर क्षेत्र में स्थित 123 एकड़ में फैला 'आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल' आज लोगों के बीच आंबेडकर पार्क के नाम से मशहूर है।

इस विशाल पार्क की परिकल्पना मूल रूप से साल 1995 में की गई थी, जिसके बाद 2003 में इसके स्वरूप का विस्तार किया गया। अंततः साल 2008 में बहुजन समाज पार्टी की सरकार के कार्यकाल के दौरान इसका भव्य उद्घाटन किया गया था।

भले ही इस विचार की शुरुआत 90 के दशक के मध्य में हुई हो, लेकिन इसने अपना असली और अंतिम रूप तब लिया जब मायावती के नेतृत्व में बसपा ने 2007 से 2012 के बीच राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई।

यह परिसर केवल डॉ. आंबेडकर को ही समर्पित नहीं है, बल्कि इसमें 6.5 एकड़ का एक विशेष आंबेडकर मेमोरियल भी है, जहां उनकी विशाल मूर्तियां और सुंदर भित्ति चित्र (म्यूरल) लगे हुए हैं।

इसके अलावा, परिसर के भीतर बने सामाजिक परिवर्तन संग्रहालय में महात्मा ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज और बसपा संस्थापक कांशीराम जैसे प्रमुख समाज सुधारकों की मूर्तियां और भित्ति चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं।

इस पार्क की सबसे आकर्षक और चर्चित विशेषताओं में से एक इसकी 'हाथी गैलरी' है। इस गैलरी में दोनों तरफ बिल्कुल सममित रूप से पत्थर की 62 विशालकाय हाथियों की मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

पार्क के इस हिस्से की उस वक्त विपक्षी दलों ने कड़ी आलोचना की थी। यह विवाद तब और गहरा गया था जब तत्कालीन बसपा सरकार ने इसके विस्तार के लिए पास ही बने एक स्टेडियम को गिराकर उसकी जमीन को इस परियोजना में शामिल करने का कड़ा फैसला लिया था।

तमाम विवादों के बावजूद समय के साथ यह जगह एक बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो चुकी है। अब यहां सिर्फ आंबेडकर जयंती के मौके पर ही नहीं, बल्कि पूरे साल देश-विदेश के पर्यटकों की भारी भीड़ लगी रहती है।

गोमती नगर में ही सहारा शहर की जमीन पर प्रदेश के नए यूपी विधानसभा भवन का निर्माण प्रस्तावित है। यह तय माना जा रहा है कि इस नए विधानसभा भवन के बन जाने के बाद भविष्य में यह भव्य आंबेडकर स्मारक उसी के ठीक बगल में स्थित होगा।

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