नई दिल्ली: साल 2023 में कुकी-मैतेई जातीय हिंसा के बाद मणिपुर में बनाए गए राहत शिविरों के हालात पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने इन विस्थापित शिविरों (आईडीपी) में हुई 31 अस्वाभाविक मौतों पर सख्त रुख अपनाया है, जिनमें एक यौन उत्पीड़न के कारण हुई मौत भी शामिल है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने राज्य सरकार को एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मौत के कारणों और दोषियों की पहचान के लिए की जा रही जांच का पूरा ब्योरा मांगा गया है।
पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे मुआवजे की भारी असमानता पर भी कड़े सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जब जातीय हिंसा के पीड़ितों के परिजनों को 4 से 5 लाख रुपये दिए गए, तो शिविरों में जान गंवाने वालों के परिवारों को मात्र 30,000 रुपये का मामूली मुआवजा क्यों दिया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम आदेश जस्टिस गीता मित्तल समिति की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता विभा डी. मखीजा ने इस रिपोर्ट को अदालत के समक्ष पेश किया। इस रिपोर्ट में 7 जून को प्रकाशित एक खबर का हवाला दिया गया था, जिसमें गृह विभाग के आंकड़ों के हवाले से राहत शिविरों में 25 अस्वाभाविक मौतों सहित कुल 731 लोगों की जान जाने की बात कही गई थी। उस मीडिया रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि इन शिविरों में करीब 43,000 विस्थापित लोग रह रहे हैं।
अधिवक्ता मखीजा ने अदालत को बताया कि जब समिति ने मौतों का विवरण मांगा, तो सरकार ने शुरुआत में केवल अधूरे आंकड़े ही सौंपे। काफी दबाव डालने के बाद ही राज्य ने आवश्यक जानकारी साझा की। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिरिबाम और चुराचांदपुर के राहत शिविरों में नौ-नौ अस्वाभाविक मौतें दर्ज की गईं। इसी तरह बिष्णुपुर में छह, इंफाल पश्चिम में चार, इंफाल पूर्व में दो और काकचिंग में एक अस्वाभाविक मौत का मामला सामने आया।
हालात की गंभीरता को देखते हुए, पीठ ने राज्य के मुख्य सचिव को भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए किए जाने वाले उपचारात्मक उपायों की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, दर्ज एफआईआर (FIR) पर जांच प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत विवरण भी मांगा गया है।
जस्टिस मित्तल समिति ने अदालत को मुआवजे से जुड़ी एक और विसंगति की जानकारी दी। समिति ने बताया कि चुराचांदपुर शिविर में यौन उत्पीड़न का शिकार हुई पीड़िता की मां को 2.5 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया, लेकिन ज्यादातर अन्य मामलों में परिजनों को सिर्फ 30,000 रुपये ही मिले। वहीं, कांगपोकपी राहत शिविर में प्राकृतिक कारणों से 128 विस्थापितों की मौत हुई, लेकिन उनके परिजनों को प्रशासन की तरफ से कोई भी मुआवजा नहीं दिया गया।
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