
नई दिल्ली: पूरा केरल इन दिनों ओणम के जश्न और उल्लास में डूबा हुआ है। बाज़ारों में रौनक है और घरों में त्योहार की तैयारियां चल रही हैं। लेकिन इस चकाचौंध से कोसों दूर, वंडीपेरियार के जंगलों में रहने वाले मलमपंडारम खानाबदोश जनजाति के एक पांच सदस्यीय परिवार के लिए यह सब बेमानी है। उनके पास न पहनने के लिए नए कपड़े हैं, न खाने को कोई दावत और न ही सिर छिपाने के लिए कोई पक्की छत।
डेढ़ साल का मासूम मनोज और उसकी तीन साल की बहन मेला कड़ाके की ठंड से बचने के लिए बस अपनी मां से चिपक कर किसी तरह खुद को गर्म रखने की कोशिश करते हैं।
इन छोटे बच्चों के साथ उनका चार साल का भाई मनु, मां कुंजुमोलि और पिता रमन कुट्टी भी रहते हैं। यह पूरा परिवार चार लकड़ी के डंडों और एक प्लास्टिक के तिरपाल से बने एक अस्थायी शेड में दिन गुज़ार रहा है। उनका यह बेहद कमजोर और जर्जर ठिकाना तेनकाची नहर के किनारे, पोन नगर में वल्लाकदावू चेक पोस्ट के पास स्थित है। इस भयानक जंगल और मौसम की मार से बचने के लिए उनके पास बस यही एक आसरा है जो हवा के तेज झोंके में कभी भी उड़ सकता है।
इस परिवार की यह दर्दनाक स्थिति सरकारी पुनर्वास कार्यक्रमों की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। ऐसा नहीं है कि प्रशासन ने इन्हें बसाने की कोशिश नहीं की। वन विभाग ने कुछ समय पहले इन्हें सरकारी क्वार्टर में शिफ्ट किया था, लेकिन वहां रहने के हालात बेहद अमानवीय थे। एक छोटे से हॉल में 32 लोगों को एक साथ रहने के लिए मजबूर किया गया था। जगह की भारी कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से तंग आकर रमन कुट्टी और उनके परिवार को आखिरकार वापस जंगल लौटना पड़ा और अपना यह तिरपाल का तंबू तानना पड़ा।
रमन के दिन की शुरुआत बहुत जल्दी हो जाती है। वह जंगली शहद और लोबान इकट्ठा करने के लिए घने जंगलों की खाक छानते हैं। इस दौरान कुंजुमोलि अपने छोटे बच्चों की हिफाजत के लिए उस खुले शेड में अकेली रह जाती हैं। रमन देर रात ही वापस लौटते हैं और उनकी दिन भर की कमाई ही यह तय करती है कि परिवार को उस रात खाना नसीब होगा या नहीं।
यह परिवार दिन में सिर्फ एक बार, सुबह के समय ही खाना पकाता है। उनके सोने की जगह गीली जमीन पर बिछा हुआ एक पतला सा कपड़ा है। इस वजह से उनका बिस्तर और बच्चों का शरीर हमेशा कीचड़ से सना रहता है।
यहां का जीवन हर दिन मौत से एक जुआ खेलने जैसा है। यह इलाका जंगली जानवरों, खासकर हाथियों के हमलों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। जब ये विशालकाय जानवर उनके कमजोर शेड के करीब आते हैं, तो कुंजुमोलि के पास आत्मरक्षा के लिए सिर्फ एक छोटी सी टॉर्च होती है। वह अपने डरे-सहमे बच्चों को सीने से लगा लेती हैं और अंधेरे में उस मद्धम रोशनी को चमकाकर बस यह प्रार्थना करती हैं कि हाथी उन्हें बिना नुकसान पहुंचाए वहां से गुजर जाएं।
हालात इस कदर बदतर हैं कि उनके पास पीने का साफ पानी तक मौजूद नहीं है। वे तिरपाल से नीचे गिरने वाले बारिश के पानी को एक बर्तन में सावधानी से इकट्ठा करते हैं और उसी से अपनी प्यास बुझाते हैं। एक तरफ जहां पूरा राज्य त्योहार की रोशनी से जगमगा रहा है, वहीं इस परिवार का यह खामोश संघर्ष केरल की बहुचर्चित कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच पर एक गंभीर और तीखा सवाल खड़ा करता है।
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