गुजरात: नर्मदा जिले में वन भूमि पर खेती के अधिकार को लेकर आदिवासी किसानों का शांतिपूर्ण आंदोलन उग्र होता जा रहा है। सागबारा तालुका के किसान उस जमीन पर खेती करने की मांग कर रहे हैं, जिसे वे सालों से जोतते आ रहे हैं। यह पूरा मामला अब एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद में तब्दील हो चुका है।
शुक्रवार को अपने छठे दिन में प्रवेश करने के बाद यह सात दिवसीय धरना और भी तेज हो गया। विवाद की शुरुआत तब हुई जब वन विभाग के कर्मचारियों ने किसानों को खेत जोतने से रोक दिया। इसके जवाब में किसान पीछे हटने के बजाय रात भर खेतों में ही डटे रहे। अब इस आंदोलन में कांग्रेस के समर्थन के साथ-साथ भाजपा नेताओं की भी एंट्री हो गई है, जिससे इस मुद्दे को एक नई राजनीतिक दिशा मिल गई है।
इस पूरे विवाद की जड़ में एक पेचीदा प्रशासनिक सीमा का पेंच फंसा है। जिन 12 गांवों के किसान विरोध कर रहे हैं, जिनमें खोपी गांव भी शामिल है, वे नर्मदा जिले के निवासी हैं। वहीं, जिस वन भूमि पर वे अपनी पारंपरिक खेती का दावा कर रहे हैं, वह सूरत जिले के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आती है।
सूरत वन विभाग के एसीएफ गौरव कुमार के अनुसार, प्रशासन वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत काम कर रहा है। यह कानून 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर खेती करने वाले योग्य दावेदारों को सुरक्षा प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि जमीन सूरत जिले में है और खेती करने के इच्छुक किसान नर्मदा के सागबारा से हैं, इसलिए इस मामले में उस गांव की ग्राम सभा के प्रस्ताव की आवश्यकता होती है जहां जमीन स्थित है।
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि उंमरपाड़ा के लोगों ने सूचित किया है कि उनकी ग्राम सभा ने सागबारा के किसानों को वहां खेती करने की अनुमति देने वाला कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है। वन विभाग के मुताबिक, नर्मदा जिला बनने से पहले यह क्षेत्र तत्कालीन भरूच जिले का हिस्सा था, लेकिन अब विवादित जमीन सूरत में है। ऐसे में यह विवाद पूरी तरह से प्रशासनिक सीमाओं से जुड़ गया है।
दूसरी तरफ, आंदोलनकारी किसानों का तर्क बेहद सीधा है। उनका कहना है कि वे वर्षों से इस जमीन पर खेती कर रहे हैं और केवल प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में बदलाव या किसी नए नियम के कारण उन्हें उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। एक किसान ने अपने वीडियो संदेश में साफ कहा कि सरकार और वन विभाग पुलिस तैनात करके उन्हें खेती करने से रोक रहे हैं, जिसके खिलाफ वे अपना हक वापस पाने के लिए धरने पर बैठे हैं।
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर, जहां आम तौर पर जल, जंगल और जमीन के अधिकारों पर बात होती है, वहीं ये किसान अपनी आजीविका बचाने के लिए खेतों में संघर्ष कर रहे हैं। इस बीच भाजपा नेत्री लीलाबेन वसावा, नर्मदा के सांसद मनसुख वसावा, नांदोल की विधायक डॉ. दर्शनाबेन देशमुख और पूर्व मंत्री मोतीलाल वसावा व शंकर वसावा सहित कई डेड़ियापाड़ा के भाजपा नेताओं ने मौके पर पहुंचकर किसानों को अपना समर्थन दिया है।
भाजपा सांसद मनसुख वसावा ने किसानों से शांतिपूर्ण आंदोलन बनाए रखने की अपील करते हुए अधिकारियों के रवैये पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केवल दफ्तर में बैठकर सैटेलाइट मैप देखने से फैसले नहीं लिए जाने चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से जमीनी हकीकत समझने और सात बार चुने गए जनप्रतिनिधियों की बात सुनने की हिदायत दी, ताकि सूरत और नर्मदा के किसानों के बीच हो रहे इस भेदभाव को मिटाकर न्याय दिया जा सके।
नेताओं के इस हस्तक्षेप से प्रशासन पर दबाव काफी बढ़ गया है, खासकर इसलिए क्योंकि यह मामला उस आदिवासी बहुल इलाके से जुड़ा है जहां जंगल और जमीन सीधे तौर पर लोगों की आजीविका का साधन हैं। हालांकि, किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए राजनीतिक समर्थन दूसरी प्राथमिकता है। जब तक उन्हें इस विवाद का निष्पक्ष, कानूनी और स्थायी समाधान नहीं मिल जाता, तब तक उनका यह धरना निर्बाध रूप से जारी रहेगा।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।
यहां सब्सक्राइब करें