कलबुर्गी: UGC Act 2026 लागू करने की मांग, दलित संघर्ष समिति ने सुप्रीम कोर्ट की रोक को बताया सामाजिक न्याय के लिए झटका

संस्थागत हत्याओं और जातिगत भेदभाव के खिलाफ कलबुर्गी में प्रदर्शन, केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट की रोक हटवाने की अपील
KDSS Protest, Kalaburagi
शिक्षण संस्थानों में 'संस्थागत हत्याओं' पर बवाल। KDSS ने यूजीसी विनियम 2026 लागू करने और छात्रों की सुरक्षा के लिए PM को भेजा ज्ञापन।
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कलबुर्गी: उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और सुरक्षा की मांग को लेकर कर्नाटक दलित संघर्ष समिति (केडीएसएस) ने राज्यव्यापी आंदोलन के तहत 9 फरवरी को कलबुर्गी में जोरदार प्रदर्शन किया। समिति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 को तत्काल प्रभाव से लागू करने की वकालत की। प्रदर्शनकारियों ने इन नियमों को लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक की कड़ी आलोचना की और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा और गंभीर झटका करार दिया।

भेदभाव के खिलाफ लंबी लड़ाई

प्रदर्शन को संबोधित करते हुए समिति के राज्य संयोजक डी.जी. सागर और कार्यकर्ता आर.के. हुडगी ने स्पष्ट किया कि ये विनियम उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव पर लगाम लगाने के लिए एक बहुत पुरानी और जरूरी मांग है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और पिछड़े समुदायों के छात्रों के लिए एक सुरक्षित और समावेशी शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करना वक्त की मांग है।

उन्होंने कहा, "ये नियम केवल कागजी कार्रवाई नहीं हैं, बल्कि समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centres), हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र जैसी व्यवस्थाएं प्रदान करते हैं, जो छात्रों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।"

'संस्थागत हत्याओं' पर गंभीर सवाल

वंचित समाज के छात्रों की बढ़ती मौतों को "संस्थागत हत्या" (Institutional Killings) का नाम देते हुए, डॉ. सागर ने कहा कि ऐसी घटनाएं विश्वविद्यालयों के भीतर गहरी जड़ें जमा चुके भेदभाव को उजागर करती हैं। उन्होंने रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि ये महज अलग-थलग त्रासदियां नहीं थीं। ये घटनाएं एक प्रणालीगत अन्याय और कमजोर छात्रों की सुरक्षा में विश्वविद्यालय प्रशासन की विफलता का जीता-जागता सबूत हैं।

चौंकाने वाले आंकड़े और मानसिक तनाव

आंकड़ों का हवाला देते हुए डॉ. सागर ने स्थिति की गंभीरता पर प्रकाश डाला:

  • 2007 से 2011 के बीच: कथित जाति-आधारित भेदभाव के कारण उच्च शिक्षण संस्थानों में कम से कम 20 छात्रों ने आत्महत्या की।

  • 2014 से 2021 के बीच: केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत डेटा के अनुसार, आईआईटी (IITs), आईआईएम (IIMs) और एनआईटी (NITs) जैसे प्रमुख संस्थानों में लगभग 122 छात्रों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

उन्होंने कहा कि ये आंकड़े उच्च शिक्षा प्रणाली में मानसिक तनाव और सामाजिक बहिष्कार (Social Exclusion) के भयावह स्तर को दर्शाते हैं।

प्रधानमंत्री को भेजा ज्ञापन

डॉ. सागर ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह तत्काल सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए और रोक को हटाने की मांग करे, ताकि यूजीसी के नियमों को लागू कर छात्रों को वैधानिक सुरक्षा प्रदान की जा सके।

प्रदर्शन के अंत में, समिति ने उपायुक्त (Deputy Commissioner) के माध्यम से प्रधानमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा। इसमें उच्च शिक्षा में समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए विनियमों को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग दोहराई गई।

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