
कर्नाटक: जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाने की दिशा में कर्नाटक सरकार ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। गदग जिले के सिंगातालुर गांव में स्थानीय नाइयों द्वारा दलित समुदाय के लोगों को अपनी सेवाएं देने से इनकार करने के बाद, सरकार ने खुद के खर्च पर गांव में एक नया सैलून खोल दिया है।
यह संभवतः राज्य में अपनी तरह की पहली सरकारी पहल है। इस सरकारी सैलून को गांव के बस स्टैंड के पास सरकारी जमीन पर बनाया गया है। इसके उद्घाटन के मौके पर समाज कल्याण विभाग और ग्राम पंचायत के कई अधिकारी मौजूद रहे।
1.2 लाख रुपये की लागत से हुआ तैयार
टीन की चादरों से बनी इस दुकान के निर्माण और जरूरी उपकरणों पर समाज कल्याण विभाग ने करीब 1.2 लाख रुपये खर्च किए हैं। शुरुआत में इस सैलून को चलाने के लिए मुंडरगी से एक नाई को विशेष तौर पर बुलाया गया था।
क्या था पूरा विवाद?
अधिकारियों के अनुसार, बाल काटने का पारंपरिक काम करने वाले हदपाड़ा (Hadapada) परिवार पिछले कई सालों से धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर गांव के दलितों के बाल काटने से मना करते आ रहे थे। एक अधिकारी ने बताया कि हदपाड़ा परिवार गांव के देवता 'वीरभद्रेश्वर' के भक्त हैं। उनका मानना है कि साल के एक खास समय में देवता उनके घर आते हैं, इसलिए वे उस दौरान दलितों को अपनी सेवाएं नहीं दे सकते।
यह मामला तब गरमा गया जब दलित युवाओं ने गांव की एकमात्र नाई की दुकान पर सेवा पाने के अपने कानूनी अधिकार की मांग शुरू कर दी। उन्होंने जिला प्रशासन का दरवाजा खटखटाया और कहा कि जाति के आधार पर सेवा से वंचित करना पूरी तरह से गैरकानूनी है।
प्रशासन की सख्ती और नया समाधान
विवाद बढ़ने पर पुरानी दुकान बंद कर दी गई। इसके बाद जिला प्रशासन ने ग्रामीणों और नाई समुदाय के साथ कई बैठकें कीं। उन्हें दुकान फिर से खोलने और समाज के हर वर्ग को सेवाएं देने के लिए समझाया गया। जब बातचीत से बात नहीं बनी, तो कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देते हुए नोटिस भी जारी किए गए, लेकिन फिर भी समस्या का कोई हल नहीं निकला।
आखिर में, जब कोई और रास्ता नहीं बचा, तो अधिकारियों ने सभी को समान अधिकार दिलाने के लिए एक अलग सरकारी सैलून स्थापित करने का फैसला किया। प्रशासन के अनुरोध पर 'हदपाड़ा अन्नप्पा समाज' के प्रदेश अध्यक्ष देवू हदपाड़ा ने इस नई दुकान को चलाने के लिए अपने भाई (जो खुद एक नाई हैं) को भेजने की सहमति दे दी।
समाज को बदलने की दिशा में एक कदम
देवू हदपाड़ा ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा, "यह बड़े दुख की बात है कि समाज में पिछड़े वर्गों को नीचा देखने की बीमार मानसिकता आज भी मौजूद है। लेकिन हमने ऐसी प्रथाओं को खत्म करने के लिए सरकार को अपना पूरा सहयोग दिया है। यह दुकान अब सभी समुदायों के लिए खुली है।"
मुंडरगी तालुका पंचायत के कार्यकारी अधिकारी विश्वनाथ होसामनी ने बताया कि यह समस्या पिछले करीब दो साल से चल रही थी। उन्होंने कहा, "अब सभी संबंधित विभागों के आपसी तालमेल और प्रयासों से हम इस मुद्दे का एक शांतिपूर्ण समाधान निकालने में सफल रहे हैं।"
गांव वालों ने ली राहत की सांस
गांव वालों ने भी प्रशासन के इस कदम का खुले दिल से स्वागत किया है। सिंगातालुर की रहने वाली मरियाज्जा ने उम्मीद जताई कि इस पहल से भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा, "इस कदम ने हमारे भीतर यह उम्मीद जगाई है कि छुआछूत की यह कुप्रथा अब हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।"
अधिकारियों का भी मानना है कि यह अनोखी पहल राज्य में अन्य जगहों पर होने वाले ऐसे भेदभाव से निपटने के लिए एक 'रोल मॉडल' साबित हो सकती है।
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