
बेंगलुरु। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ कर्नाटक में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। किसान और दलित संगठनों ने 23 अक्टूबर को पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर जन-मार्च और प्रदर्शन का आह्वान किया है। इस आंदोलन की मुख्य मांग एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रद्द करना, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना और उनके खिलाफ लगे आरोपों की एक निष्पक्ष न्यायिक जांच कराना है।
सोमवार को बेंगलुरु में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मशहूर अभिनेता प्रकाश राज ने इस आंदोलन का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि जो सरकार बच्चों और किसानों पर लाठियां बरसाती है, उसे सत्ता से बेदखल करना नागरिकों की जिम्मेदारी है। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि यह बदलाव शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीके से और संविधान द्वारा दिए गए वोट के अधिकार के जरिए होना चाहिए।
प्रकाश राज ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि 23 अक्टूबर को पूरे देश को जंतर-मंतर में तब्दील कर दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस या सेना की कितनी भी तैनाती कर ली जाए, इस जन-आंदोलन को अब दबाया नहीं जा सकेगा। दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों पर हुए पुलिसिया एक्शन की निंदा करते हुए उन्होंने इसे लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार दिया।
राज्य रैयत संघ (State Raitha Sangha) के अध्यक्ष बडगलपुरा नागेंद्र ने केंद्र सरकार पर किसानों के हितों की अनदेखी करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक आंदोलन के बाद किए गए वादे आज तक पूरे नहीं हुए हैं। नागेंद्र के मुताबिक, कर्नाटक में गन्ना किसानों के मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण केंद्र सरकार की यही उदासीनता है।
वहीं, दलित संघर्ष समिति के कार्यकर्ता गुरुप्रसाद केरागोडु ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाने की मांग की। इसके साथ ही, उन्होंने एक नए चुनाव आयोग के गठन और जन-अनुकूल मतदाता सूची तैयार करने पर जोर दिया।
केरागोडु ने मांग की है कि एसआईआर लागू होने के बाद हुए सभी चुनावों को फौरन रद्द करके नए सिरे से चुनाव कराए जाएं। उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने और युवा प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमों को बिना शर्त वापस लेने की भी अपील की है।
एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को लेकर इन नेताओं का आरोप है कि इसके तहत मतदाता सूची से नाम हटाने का सबसे ज्यादा नुकसान घुमंतू समुदायों, दलितों, आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को उठाना पड़ा है। इसे समानता और उचित प्रतिनिधित्व के संवैधानिक सिद्धांतों के लिए बड़ा खतरा बताते हुए नेताओं ने दलित संगठनों से इस मुद्दे को समुदाय के अस्तित्व की लड़ाई मानकर एकजुट होने का आह्वान किया है।
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