
ओडिशा के रायगड़ा में खनन गतिविधियों का विरोध कर रहे आदिवासियों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के ठीक छह महीने बाद पुलिस ने एक बड़ा एक्शन लिया है। इस मामले में दो प्रमुख आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं, डॉ. रैंडल सेक्वेरा और लक्ष्मण नाइक को गिरफ्तार किया गया है।
इस पुलिसिया कार्रवाई के बाद से नागरिक समाज संगठनों में भारी आक्रोश है और इसे आवाज दबाने की कोशिश बताया जा रहा है।
पुलिस ने दोनों कार्यकर्ताओं को 16 अक्टूबर की रात कलाहांडी जिले स्थित उनके आवास से हिरासत में ले लिया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, इन दोनों पर हत्या के प्रयास, दंगा भड़काने और आर्म्स एक्ट के तहत बेहद गंभीर मामले दर्ज किए गए हैं।
इस गिरफ्तारी की सोशल मीडिया पर भी खूब आलोचना हो रही है। मशहूर हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सिरिएक एब्बी फिलिप्स, जिन्हें 'द लिवर डॉक' के नाम से जाना जाता है, ने 'एक्स' पर अपनी गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने डॉ. सेक्वेरा को एक बेहद 'दयालु चिकित्सक' बताते हुए कहा कि बॉक्साइट खनन का रास्ता साफ करने के लिए ही उन्हें अपराधी साबित किया जा रहा है।
डॉ. फिलिप्स ने पुरानी यादें साझा करते हुए बताया कि डॉ. सेक्वेरा बेंगलुरु के सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज में उनके जूनियर थे। साल 2018 में इसी डॉक्टर ने ओडिशा के कुट्रुमाली में एक दुर्गम बॉक्साइट समृद्ध पठार पर चढ़कर आदिवासी कुटिया कोंध गांव में मानसून स्वास्थ्य शिविर लगाया था।
डॉ. फिलिप्स ने चिकित्सा जगत और आम नागरिकों से मार्मिक अपील करते हुए कहा कि वे इस अन्याय के खिलाफ बोलें, ताकि उनकी आवाज को किसी जेल की कोठरी में दफन होने से बचाया जा सके।
दूसरी ओर, पुलिस ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पुलिस का स्पष्ट कहना है कि यह गिरफ्तारी विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने के लिए नहीं की गई है। उनका दावा है कि सेक्वेरा और नाइक ने ही अप्रैल में रायगड़ा जिले के कांतामल गांव में आदिवासियों को सुरक्षाबलों पर जानलेवा हमला करने के लिए उकसाया था।
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि शुरुआत में दर्ज की गई एफआईआर में रैंडल और नाइक का नाम नहीं था, लेकिन बाद की जांच में उनकी मुख्य भूमिका सामने आई।
गौरतलब है कि अप्रैल में हुई उस हिंसक झड़प के दौरान भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था और आंसू गैस के गोले भी दागे गए थे। उस घटना में कई स्थानीय लोग और पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
दक्षिण पश्चिमी रेंज के डीआईजी अखिलेश्वर सिंह ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने कहा कि डॉ. सेक्वेरा लोगों को चिकित्सा सेवाएं नहीं दे रहे थे, बल्कि राज्य सरकार के खिलाफ आदिवासियों की भावनाओं को भड़का रहे थे। उन्होंने नाइक पर भी स्थानीय लोगों को गुमराह करने का गंभीर आरोप लगाया।
डीआईजी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि कलाहांडी और रायगड़ा जिलों में कई अन्य डॉक्टर भी शांतिपूर्वक काम कर रहे हैं, लेकिन डॉ. सेक्वेरा को छोड़कर किसी और को गिरफ्तार नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं, क्योंकि कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने के दौरान इन दोनों ने ऐसी कोई भी शिकायत नहीं की।
इस बीच, राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर मुखर हो गए हैं। सीपीआई (एम) की ओडिशा राज्य समिति ने इन गिरफ्तारियों की कड़ी निंदा की है। पार्टी का सीधा आरोप है कि सिजिमाली और कुट्रुमाली पहाड़ियों में कॉर्पोरेट खनन परियोजनाओं का विरोध करने के कारण ही इन दोनों को साजिश के तहत निशाना बनाया गया है।
'कंसर्नड सिटीजन्स कमेटी, ओडिशा' ने भी इस पूरी घटना को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संगठन का आरोप है कि यह गिरफ्तारी आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों- 'जल, जंगल और जमीन' के अधिकारों से वंचित करने के उद्देश्य से की गई है।
नागरिक समूहों का यह भी कहना है कि राज्य सरकार अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे आदिवासी और दलित समुदायों का लगातार दमन कर रही है। जो भी कार्यकर्ता जन आंदोलनों का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें पुलिस केस में फंसाकर जेल भेजा जा रहा है।
मालूम हो कि लक्ष्मण नाइक एक प्रमुख दलित कार्यकर्ता हैं, जो 'मां माटी माली सुरक्षा मंच' और 'समाजवादी जन परिषद' से जुड़े हुए हैं। वहीं, नागरिक समाज समूहों के अनुसार, डॉ. सेक्वेरा लंबे समय से कलाहांडी और रायगड़ा जिलों में आदिवासी समुदायों की भलाई के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं।
इन दोनों कार्यकर्ताओं ने हमेशा खनन गतिविधियों और औद्योगीकरण से परेशान स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद की है।
अब कई लोकतांत्रिक और प्रगतिशील संगठनों से यह अपील की जा रही है कि वे ओडिशा की जनता के 'जल, जंगल और जमीन' के हक में चल रही इस लड़ाई के साथ एकजुटता दिखाएं और इन कार्यकर्ताओं पर दर्ज आपराधिक मामलों को तत्काल वापस लेने की मांग करें।
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