यूपी में शिक्षकों के बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा: एक ही डिग्री पर 10 लोगों की नियुक्ति, हाईकोर्ट ने दिए STF जांच के आदेश

यूपी के बेसिक स्कूलों में एक डिग्री पर 10 शिक्षकों की नियुक्ति का भंडाफोड़, इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त एक्शन, राज्य के सभी प्राइमरी शिक्षकों के रिकॉर्ड की एसटीएफ (STF) जांच के दिए आदेश।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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उत्तर प्रदेश: सरकारी बेसिक स्कूलों में एक ही शैक्षिक प्रमाणपत्र पर 10 शिक्षकों की नियुक्ति का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इस भयंकर फर्जीवाड़े पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) को निर्देश दिया है कि वह राज्य के सभी सरकारी बेसिक स्कूलों में तैनात शिक्षकों के नियुक्ति पत्रों और शैक्षिक रिकॉर्ड की गहन जांच करे।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने बीते 16 अक्टूबर को यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। अदालत ने कक्षा एक से आठवीं तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों को सख्त निर्देश दिया है कि वे औपचारिक अधिसूचना प्राप्त होने के एक सप्ताह के भीतर अपने शैक्षिक प्रमाणपत्र और नियुक्ति आदेश संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) कार्यालय में जमा करें।

पीठ ने चेतावनी दी है कि इस आदेश को लागू करने में किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि ऐसा होता है, तो संबंधित शिक्षा अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

न्यायालय ने एसटीएफ को दस्तावेजों के सत्यापन के लिए एक पारदर्शी और प्रभावी तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया है। इसके लिए एसटीएफ जरूरत पड़ने पर संबंधित जिले के एसएसपी या पुलिस आयुक्त की मदद ले सकती है। जांच प्रक्रिया की गंभीरता को देखते हुए एसटीएफ के एडीजी को इस पूरे मामले की निगरानी करने को कहा गया है। एडीजी चाहें तो रोजमर्रा की निगरानी के लिए किसी अन्य अधिकारी को भी नामित कर सकते हैं।

फर्जीवाड़े की जड़ों तक पहुंचने के लिए हाईकोर्ट ने शिक्षकों के लिए एक और अनिवार्य शर्त रखी है। सभी शिक्षकों को एक नोटरीकृत हलफनामा दाखिल करना होगा। इस हलफनामे में उन्हें यह बताना होगा कि क्या उनके परिवार का कोई भी करीबी रिश्तेदार उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में बीएसए या उससे ऊपर के पद पर कार्यरत है या पूर्व में रहा है।

अदालत ने यूपी के शिक्षा निदेशक को भी बीएसए द्वारा की जाने वाली इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी का जिम्मा सौंपा है। वे भी इस कार्य के लिए किसी अधिकारी को नियुक्त कर सकते हैं। मामले की अगली सुनवाई और अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के लिए अदालत ने चार नवंबर की तारीख तय की है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों की दयनीय स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि छात्रों की कमी के कारण बड़ी संख्या में प्राइमरी स्कूल बंद हो गए हैं। अदालत के अनुसार, इसके पीछे संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा के गिरते स्तर और शिक्षकों का खराब प्रदर्शन मुख्य कारण है। यह स्थिति केवल हाल के वर्षों में हुई नियुक्तियों का परिणाम नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों से धोखाधड़ी से नौकरी पाने की जो प्रथा चल रही है, यह उसी का नतीजा है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति में अभी भी सुधार नहीं हुआ है, तो इसका एक मुख्य कारण शिक्षकों की गुणवत्ता और उनका ईमानदारी व गंभीरता से अपने कर्तव्यों का पालन न करना हो सकता है।

यह पूरा मामला कुसुमलत्ता नामक एक शिक्षिका द्वारा दायर रिट याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। न्यायालय के पिछले निर्देश के अनुपालन में, एसटीएफ लखनऊ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि याचिकाकर्ता ने गोरखपुर में पहले से ही सहायक शिक्षिका के रूप में काम कर रही कुसुमलत्ता श्रीवास्तव के शैक्षिक दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी तरीके से नौकरी हासिल की थी।

एसटीएफ की जांच में यह भी सामने आया कि राज्य में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर या किसी अन्य व्यक्ति के दस्तावेजों का इस्तेमाल करके रोजगार प्राप्त किया है।

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