"नाम सुनते ही कमरा देने से इनकार..." सुप्रीम कोर्ट के जज ने समाज में फैले भेदभाव की घटनाओं का जिक्र कर बताए अनुभव!

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने दिल्ली और ओडिशा की भेदभावपूर्ण घटनाओं का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि देश में 'संवैधानिक नैतिकता' को समाज की धारणाओं और बहुसंख्यक विचारों से हमेशा ऊपर रखा जाना चाहिए।
Justice Ujjal Bhuyan
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने समाज में मौजूद भेदभाव की घटनाओं का जिक्र करते हुए क्यों कहा कि 'संवैधानिक नैतिकता' सबसे ऊपर है? फोटो साभार- इंटरनेट
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने इस बात पर जोर दिया है कि देश में संवैधानिक नैतिकता को हर हाल में 'सार्वजनिक या लोकप्रिय नैतिकता' से ऊपर रखा जाना चाहिए, भले ही वह बहुसंख्यकों का ही विचार क्यों न हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि अक्सर व्यक्तिगत या समाज की लोकप्रिय धारणाएं उन मानकों के खिलाफ खड़ी नजर आती हैं, जिनकी अपेक्षा हमारा संविधान करता है।

जस्टिस भुइयां 21 फरवरी को हैदराबाद में तेलंगाना जजेस एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा आयोजित एक सेमिनार को संबोधित कर रहे थे।

समाज में मौजूद गहरे भेदभाव की दो मिसालें

आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी समाज में मौजूद गहरी खाइयों और भेदभाव को उजागर करने के लिए जस्टिस भुइयां ने दो अलग-अलग घटनाओं का जिक्र किया। पहला मामला दिल्ली का था, जहां एक मुस्लिम पीएचडी छात्रा को केवल उसकी धार्मिक पहचान की वजह से किराए पर कमरा देने से मना कर दिया गया। वहीं, दूसरी घटना हाल ही में ओडिशा में सामने आई, जहां बच्चों के माता-पिता ने मिड-डे मील योजना के तहत एक दलित महिला द्वारा बनाए गए भोजन को अपने बच्चों को खाने से रोक दिया।

दिल्ली वाली घटना का विस्तार से जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वह छात्रा उनकी बेटी की दोस्त थी। उन्होंने कहा, "वह साउथ दिल्ली में वर्किंग वुमन हॉस्टल चलाने वाली एक मकान मालकिन के पास गई थी। पहले तो मकान मालकिन ने उसका नाम पूछा। जब उसने अपना नाम बताया, जो कि बहुत स्पष्ट नहीं था, तो मालकिन ने आगे सवाल किए और उसका सरनेम (उपनाम) पूछा। सरनेम बताते ही उसकी मुस्लिम पहचान उजागर हो गई। इसके बाद मकान मालकिन ने साफ शब्दों में कह दिया कि यहां कोई कमरा खाली नहीं है और उसे अपने लिए कहीं और जगह तलाशनी चाहिए।"

इन घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि ये मामले तो केवल एक बानगी (Tip of the iceberg) हैं, हकीकत में ऐसी समस्याएं समाज में कहीं ज्यादा गहरी हैं।

नाज फाउंडेशन फैसले का जिक्र और मौलिक अधिकार

साल 2009 के ऐतिहासिक 'नाज फाउंडेशन बनाम भारत संघ' फैसले की याद दिलाते हुए जस्टिस भुइयां ने एक महत्वपूर्ण बात कही। यह वही मामला है जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। उन्होंने बताया कि इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से राज्य को संवैधानिक नैतिकता के ऊपर सार्वजनिक नैतिकता को तरजीह देने से रोका था।

उन्होंने आगे कहा, "इस मामले में अदालत ने केंद्र सरकार की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया था जिसमें कहा गया था कि 'लोकप्रिय नैतिकता' राज्य का एक वैध उद्देश्य हो सकता है और इसे कानून के जरिए लागू किया जा सकता है। हाई कोर्ट ने तय किया था कि अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को केवल इसलिए सीमित नहीं किया जा सकता क्योंकि समाज का एक बड़ा वर्ग कुछ कार्यों को नापसंद करता है।"

संस्थाओं को संयम बरतने की नसीहत

लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि संवैधानिक नैतिकता यह सुनिश्चित करती है कि ये संस्थाएं संयम बरतें। वे केवल अपने संख्या बल, अधिकार या सत्ता के दम पर मनमानी न करें, बल्कि हमेशा संवैधानिक मूल्यों के दायरे में रहकर काम करें।

अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने जिला अदालतों के न्यायाधीशों को अमेरिका के पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस थुरगुड मार्शल के विचार याद दिलाए। उन्होंने कहा कि किसी भी न्यायाधीश की "एकमात्र और वास्तविक ताकत" जनता का सम्मान होती है, जिसे एक जज केवल अपनी स्वतंत्रता और संविधान के प्रति अपनी सच्ची निष्ठा से ही अर्जित कर सकता है।

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