UP में रविदास जयंती आयोजनों पर अनुमति न दिए जाने की अटकलें: सांसद चंद्रशेखर ने कहा- ये बहुजन समाज का अपमान!

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजे पत्र में भीम आर्मी चीफ ने कहा है कि गुरु रविदास जी जैसे महान संत की जयंती मनाने से रोकना बहुजन समाज का अपमान तो है ही, साथ ही प्रशासनिक मनमानी और संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन भी है।
वाराणसी में श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर, सीर गोवर्धनपुर में स्थित है और इसे काशी का दूसरा स्वर्ण मंदिर कहा जाता है।
वाराणसी में श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर, सीर गोवर्धनपुर में स्थित है और इसे काशी का दूसरा स्वर्ण मंदिर कहा जाता है।सोशल मीडिया
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लखनऊ- उत्तर प्रदेश में संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती के आयोजनों और शोभायात्राओं पर कई जिलों में प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने की खबरों ने सामाजिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। आजाद समाज पार्टी के संस्थापक एवं नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक सख्त पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने इसे संविधान, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार दिया है। पत्र में भीम आर्मी चीफ ने कहा है कि गुरु रविदास जी जैसे महान संत की जयंती मनाने से रोकना बहुजन समाज का अपमान तो है ही, साथ ही प्रशासनिक मनमानी और संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन भी है।

गुरु रविदास जयंती हर साल माघ महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह रैदास पंथ धर्म का वार्षिक केंद्र बिंदु है। संत रविदास जी के पिता का नाम ‘संतोख दास‘ (रग्घु) और माता जी का नाम ‘कर्माबाई‘ (कलसा) था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पास स्थित सीर गोवर्धन गांव में माघ की पूर्णिमा को संवत 1433 में हुआ उन्हें ‘रैदास‘ नाम से भी जाना जाता है। चर्मकार कुल से होने के कारण उनके पिता चमड़े के जूते बनाने और मरम्मत करने का काम किया करते थे, और रविदास भी इस व्यवसाय में अपने पिता का हाथ बटाया करते थे।

रविदास जाति प्रथा के उन्मूलन में प्रयास करने के लिए जाने जाते हैं।उन्होंने भक्ति आंदोलन में भी योगदान दिया है, और संत कबीर के मित्र के रूप में पहचाने जाते हैं। आज भी उनके अनुयायी, विशेषकर दलित और बहुजन समाज, उन्हें सामाजिक न्याय और मानवतावाद के प्रतीक के रूप में पूजते हैं, और उनकी जयंती (फाल्गुन मास की पूर्णिमा) पर देशभर में उत्सव आयोजित होते हैं। इस वर्ष 1 फरवरी को रविदास जयंती मनाई जाएगी।

भीम आर्मी चीफ ने रखी ये मांगें

पत्र में चंद्रशेखर ने गुरु रविदास जी को भारतीय समाज के महान संत, समाज सुधारक और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में याद करते हुए कहा कि उनके जीवनभर के संघर्ष ने जाति-भेद, छुआछूत और सामाजिक अन्याय के खिलाफ समानता, मानव गरिमा तथा भाईचारे का संदेश दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि गुरु रविदास जी की विचारधारा भारतीय संविधान की आत्मा- समानता, बंधुत्व और न्याय से सीधे जुड़ी हुई है। पत्र में लिखा, " यह अत्यंत चिंताजनक है कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों से संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती के आयोजनों एवं शोभायात्राओं को लेकर प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। यह केवल गुरु रविदास जी के अनुयायियों पर नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। इस प्रकार की घटनाएँ प्रशासनिक मनमानी को दर्शाती है और यह सिद्ध करती है कि शासन-प्रशासन में कुछ तत्व संविधान के प्रति अपनी जवाबदेही भूल चुके हैं। संत गुरु रविदास जी की जयंती मनाने से रोकना केवल बहुजन समाज का अपमान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ओर संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।"

आजाद ने पत्र में सरकार से चार प्रमुख मांगें की हैं। पहली, राज्य के प्रत्येक जिले में गुरु रविदास जी की जयंती मनाने की पूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए और आयोजनों में बाधा डालने वाले अधिकारियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो। दूसरी, जिन जिलों में अनुमति न दी जा रही है, वहां के जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक से यह असंवैधानिक निर्णय किन आधारों पर लिया गया, इसका स्पष्टीकरण लिया जाए। तीसरी, भेदभावपूर्ण एवं मनमाने रवैये के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी सामाजिक या धार्मिक समूह के अधिकारों का हनन न हो। चौथी, राज्य सरकार स्पष्ट आदेश जारी करे कि किसी जिले में जयंती आयोजनों में कोई बाधा न डाली जाए और सभी प्रशासनिक इकाइयों को सहयोग करने के निर्देश दिए जाएं।

पत्र के अंत में चंद्रशेखर ने चेतावनी दी है कि यदि इन मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो इसे बहुजन समाज, सामाजिक न्याय और संत परंपरा के विरुद्ध साजिश माना जाएगा। ऐसे में लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक दायरे में रहकर कड़े आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संत शिरोमणि गुरु रविदास जी का अपमान किसी भी स्थिति में सहन नहीं किया जाएगा, क्योंकि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपने महापुरुषों और संतों को सम्मान देने तथा उनके विचारों के प्रचार-प्रसार का समान अधिकार है।

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