
प्रयागराज- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टाले जाने और ग्राम प्रधानों का कार्यकाल प्रशासक के रूप में बढ़ाए जाने को लेकर राज्य सरकार से कड़ा जवाब तलब किया है। जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि जिन आदेशों के आधार पर ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में जारी रखा गया है, वे ऐसे वैधानिक प्रावधान पर आधारित हैं जिसे पहले ही हाईकोर्ट की खंडपीठ असंवैधानिक घोषित कर चुकी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे आदेश "प्रथम दृष्टया शून्य (Non Est)" प्रतीत होते हैं।
यह आदेश रिट याचिका संख्या 23749/2026 पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने 25 मई और 26 मई के उन सरकारी आदेशों को चुनौती दी थी जिनके जरिए पंचायत चुनाव स्थगित कर ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखने की व्यवस्था की गई थी। याचिका में यह भी मांग की गई थी कि राज्य निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K के अनुरूप तीनों स्तरों के पंचायत चुनाव समयबद्ध तरीके से कराने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि विवादित आदेश उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत पारित किए गए हैं। जबकि इसी प्रावधान को वर्ष 2000 में प्रम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K के विपरीत मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
अदालत ने अपने आदेश में खंडपीठ के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुसार किसी भी पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं हो सकता और नए पंचायत चुनाव कार्यकाल समाप्त होने से पहले हर हाल में पूरे किए जाने चाहिए। अदालत ने खंडपीठ की उस महत्वपूर्ण टिप्पणी को दोहराया जिसमें कहा गया था, "संविधान के अनुच्छेद 243E में प्रयुक्त 'shall and no longer' शब्दों का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है। कोई भी पंचायत पांच वर्ष से अधिक नहीं चल सकती और किसी भी स्थिति में अगले पंचायत के चुनाव पांच वर्ष की अवधि समाप्त होने से पहले पूरे किए जाने चाहिए।"
खंडपीठ के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि "राज्य सरकार पंचायत चुनाव पांच वर्ष से आगे नहीं टाल सकती और न ही वह राज्य निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्तियों का अतिक्रमण कर सकती है। पंचायत चुनाव कराने का संपूर्ण नियंत्रण संविधान के अनुच्छेद 243K के तहत राज्य निर्वाचन आयोग के पास है।"
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने बताया कि पंचायत चुनावों से जुड़ा यही मुद्दा एक अन्य जनहित याचिका में भी विचाराधीन है। सरकार का कहना था कि सर्वोच्च न्यायालय के विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए निर्देशों के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग का गठन किया है, जो पंचायत चुनावों में OBC आरक्षण से संबंधित रिपोर्ट तैयार कर रहा है। जब तक आयोग अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर देता, तब तक पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं है क्योंकि आरक्षण का निर्धारण चुनाव प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है।
हालांकि अदालत ने इस दलील पर आश्चर्य व्यक्त किया कि OBC आयोग का गठन काफी पहले किए जाने के बावजूद आज तक उसकी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है।
राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची पहले ही प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। आयोग ने कहा कि चुनाव कराने के लिए आवश्यक प्रशासनिक और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सरकार के मौजूदा रुख के कारण चुनाव कराने में बाधा उत्पन्न हो रही है।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 25 और 26 मई 2026 के विवादित आदेश उस कानूनी प्रावधान के तहत पारित किए गए हैं जिसे पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। इसलिए "ये आदेश प्रथम दृष्टया 'नॉन एस्ट' (कानून की दृष्टि में अस्तित्वहीन) प्रतीत होते हैं और ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
अदालत ने याचिकाकर्ता को OBC आयोग को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी और राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सरकार यदि OBC आयोग की रिपोर्ट तैयार हो चुकी है तो उसे रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे और यह भी स्पष्ट बताए कि पंचायत चुनाव किस निश्चित समयसीमा में कराए जाएंगे।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यदि अगली सुनवाई तक संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो उत्तर प्रदेश सरकार के उत्तरदायी अधिकारी (प्रतिवादी संख्या-2) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा।
अदालत ने संबंधित अधिकारी से व्यक्तिगत शपथपत्र भी मांगा है और पूछा है कि "जब इस न्यायालय की खंडपीठ संबंधित वैधानिक प्रावधान को पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी थी, तब किन परिस्थितियों में उसी प्रावधान के आधार पर विवादित आदेश जारी किए गए?"
हाईकोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि "यदि इसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया तो प्रथम दृष्टया यह माना जा सकता है कि न्यायालय की खंडपीठ के निर्णय की अवमानना (Contempt) की गई है।"
मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को दोपहर 2 बजे निर्धारित है।
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