
उत्तर प्रदेश: गाजियाबाद के दो अस्पतालों ने एक अमानवीय कृत्य के बाद अब आपराधिक मुकदमे और मुआवजे की देनदारी से बचने का रास्ता निकाला है। इन अस्पतालों ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक हलफनामा देकर मृतका के माता-पिता को 12 लाख रुपये 'दान' के रूप में देने की बात स्वीकार की है। यह पूरा मामला एक नाबालिग बच्ची से जुड़ा है, जो यौन उत्पीड़न का शिकार हुई थी। गंभीर रूप से घायल इस मासूम को इन अस्पतालों ने इलाज देने से मना कर दिया था, जिसके बाद समय पर चिकित्सा न मिलने के कारण उसकी दर्दनाक मौत हो गई थी।
इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस और अस्पतालों के असंवेदनशील रवैये पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने कहा कि वे इस व्यवस्था को सुधारने के लिए कड़े कदम उठाएंगे। अदालत अब चिकित्सा संस्थानों के लिए 'मस्ट-ट्रीट' (इलाज अनिवार्य) दिशानिर्देश लागू करने पर विचार कर रही है। इसके साथ ही यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ताओं के बयानों की पुलिस द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग को भी अनिवार्य किया जाएगा।
पीड़िता के माता-पिता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने अदालत में अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में इससे संबंधित प्रावधान पहले से मौजूद हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई भी इनका पालन करता हुआ नजर नहीं आता। हरिहरन ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के कई ऐसे फैसले हैं जो अस्पतालों के लिए घायलों का इलाज करना अनिवार्य बनाते हैं, इसके बावजूद ऐसी अमानवीय लापरवाही लगातार हो रही है। उन्होंने भारी मन से कहा कि यदि दोनों में से किसी एक अस्पताल ने भी बच्ची को जरूरी इलाज दे दिया होता, तो शायद आज वह जिंदा होती।
इस पर जस्टिस बागची ने भी सहमति जताते हुए कहा कि कानून और सुप्रीम कोर्ट के नियम अपनी जगह मौजूद हैं। लेकिन अदालत के आदर्श माहौल और जमीनी हकीकत के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है। उन्होंने जीवन की रक्षा को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इस मामले में कानून लागू करने वाली एजेंसी और चिकित्सा संस्थान दोनों ही अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाने में पूरी तरह से विफल साबित हुए हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने भी अधिवक्ता हरिहरन की बातों का समर्थन करते हुए घटना की निंदा की। उन्होंने कहा कि बच्ची के साथ जिस तरह का असंवेदनशील और अमानवीय व्यवहार किया गया, उसने उसकी पीड़ा को और अधिक बढ़ा दिया। सीजेआई ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि रोजाना अपराध से निपटते हुए पुलिसकर्मी अक्सर असंवेदनशील हो जाते हैं। इसलिए पुलिस अधिकारियों को अपराध के पीड़ितों के प्रति अत्यधिक सहानुभूति रखने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षित और संवेदनशील किए जाने की सख्त जरूरत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले में महत्वपूर्ण क्षणों में पुलिस और अस्पताल दोनों की तरफ से भारी चूक हुई है।
सिस्टम की इस खामी को दूर करने के लिए पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता हरिहरन और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सुझाव मांगे हैं, ताकि अदालत इस संबंध में कुछ सकारात्मक निर्देश जारी कर सके। पीठ का मानना है कि वैधानिक प्रावधान होने के बावजूद वे जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो रहे हैं और इस कमी को दूर करने की अत्यंत आवश्यकता है।
इलाज के लिए 'गोल्डन पीरियड' (स्वर्णिम समय) का जिक्र करते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि अगर बच्ची को तत्काल चिकित्सा सहायता मिल जाती तो उसकी जान बच सकती थी। उन्होंने कहा कि इतने भयानक आघात से गुजरी बच्ची को अस्पताल कम से कम खून तो चढ़ा ही सकते थे, जो कि उस वक्त सबसे बड़ी जरूरत थी।
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