नई दिल्ली: दिल्ली में चल रहे विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान ने गारस्टिन बास्टियन (जीबी) रोड की सेक्स वर्कर्स की चिंताओं को बढ़ा दिया है। चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट को अपडेट करने की इस प्रक्रिया ने इन महिलाओं के सामने एक बड़ा पहचान का संकट खड़ा कर दिया है।
द हिन्दू की सुरुचि कुमारी ने रिपोर्ट किया है कि, इनमें से ज्यादातर महिलाओं के पास चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए वो दस्तावेज नहीं हैं, जिनसे उनके विवरण की पुष्टि हो सके। आयोग के नियमों के मुताबिक, पिछली वोटर लिस्ट में उनका या उनके किसी खून के रिश्तेदार का नाम होना भी जरूरी है। लेकिन इन महिलाओं के लिए ऐसा करना लगभग असंभव है, क्योंकि इनमें से ज्यादातर को बचपन में ही तस्करी कर यहां लाया गया था और उन्हें अपने जन्म स्थान तक के बारे में कुछ याद नहीं है।
वोट देने का अधिकार छिनने के डर के साथ-साथ इन महिलाओं को अब यह खौफ भी सता रहा है कि क्या उन्हें यहां से निकाल दिया जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो वे कहां जाएंगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जीबी रोड के अलग-अलग कोठों में अपनी जिंदगी के कई दशक गुजार चुकीं इन महिलाओं के लिए इस मतदाता सूची प्रक्रिया से बाहर होने का मतलब एक भयानक अनिश्चितता का शुरू होना है।
करीब 40 वर्षीय एक सेक्स वर्कर रीता (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उन्होंने साल 2010 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से हर बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है। उनका कहना है कि वोट देने से उन्हें समाज में कुछ हद तक समानता का एहसास होता था, क्योंकि उनकी जिंदगी पहले से ही बहुत संघर्षपूर्ण और मुश्किलों भरी है।
आंकड़ों पर गौर करें तो जीबी रोड की तंग गलियों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में रहने वाली कुल 2,800 सेक्स वर्कर्स में से एक बड़ा हिस्सा 40 वर्ष या उससे अधिक उम्र का है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इनमें से केवल 650 महिलाओं का नाम ही वर्तमान मतदाता सूची में दर्ज है।
एक बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) ने बताया कि उनके बूथ के 1,300 से ज्यादा मतदाताओं में से 783 को 'शिफ्टेड' (स्थानांतरित) चिह्नित किया गया है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन 'शिफ्टेड' लोगों में 450 सेक्स वर्कर्स शामिल हैं।
इस रिपोर्ट के लिए जिन 14 महिलाओं से बात की गई, उनमें से कोई भी अपने परिवार के संपर्क में नहीं है। इस वजह से पुराने रिकॉर्ड में उनके विवरण की जांच करना पूरी तरह से नामुमकिन हो गया है। ये महिलाएं कभी स्कूल नहीं गईं और पहचान पत्र के नाम पर इनके पास केवल आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी ही मौजूद हैं।
हालांकि, चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, अगर कोई मतदाता पिछली लिस्ट के रिकॉर्ड से लिंक नहीं हो पाता है, तो सत्यापन के लिए ये तीनों दस्तावेज मान्य नहीं माने जाते। आयोग का स्पष्ट कहना है कि इस पूरी कवायद का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र मतदाता न छूटे और कोई भी अपात्र व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल न हो।
बसंती (बदला हुआ नाम) को महज 12 साल की छोटी उम्र में बेंगलुरु से तस्करी करके जीबी रोड लाया गया था और वह 30 से अधिक वर्षों से इस पेशे में हैं। उन्हें इस नई प्रक्रिया के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं है, लेकिन उन्होंने बताया कि उनका फॉर्म भर दिया गया था, जिसके बदले उन्हें कोई पावती पर्ची नहीं मिली।
इस प्रक्रिया के संभावित नतीजों के बारे में सुनकर उनकी चिंताएं भी छलक उठीं। उन्होंने घबराते हुए सवाल किया कि अगर उनके पास जन्म प्रमाण पत्र या दसवीं की मार्कशीट नहीं है, तो क्या वे वोट नहीं दे पाएंगी? क्या उन्हें दिल्ली छोड़ने के लिए कह दिया जाएगा?
आज 52 वर्षीय बसंती पिछले चार साल से पुनर्वास केंद्र में हैं और उन्होंने सेक्स वर्क पूरी तरह से छोड़ दिया है। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी यहीं गुजार दी है और अब उन्हें केवल अपने पिता का नाम याद है। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके पिता अब जीवित हैं या नहीं।
बीएलओ के अनुसार, वापस आए 100 फॉर्म में से पांच से भी कम मतदाताओं को पिछले रिकॉर्ड से जोड़ा जा सका है। अधिकारी ने बताया कि जो लोग फॉर्म वापस करेंगे, उनके नाम ड्राफ्ट रोल में प्रकाशित किए जाएंगे। जिनका पुराना रिकॉर्ड नहीं मिलेगा, उन्हें चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए 12 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करने का नोटिस भेजा जाएगा।
अधिकारी ने अंदेशा जताते हुए कहा कि ज्यादातर महिलाओं के पास जन्म प्रमाण पत्र, 10वीं या 12वीं की मार्कशीट या घर के मालिकाना हक का कोई भी पक्का कागज नहीं है, इसलिए उनके नाम काटे जाने की पूरी आशंका है। अभी करीब 100 फॉर्म और वापस आने बाकी हैं।
एनजीओ 'कट-कथा' से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता ने बताया कि यहां की ज्यादातर महिलाओं को किशोरावस्था में ही तस्करी कर लाया गया था, जिससे उनके परिवार से संपर्क हमेशा के लिए टूट गए। उनका कहना है कि इन महिलाओं तक पहुंच भी काफी सीमित होती है और यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे किसके लिए काम कर रही हैं।
सुनीता ने इन महिलाओं को 'शिफ्टेड' चिह्नित करने की प्रक्रिया को भी गलत ठहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये महिलाएं सिर्फ कोठे बदलती हैं, जिसका मतलब है कि वे उसी इमारत के किसी दूसरे फ्लोर या कमरे में चली जाती हैं। वे इस इलाके को छोड़कर कहीं नहीं जातीं, जो कि यहां एक बेहद आम बात है और बीएलओ को इस सच्चाई से वाकिफ होना चाहिए।
आठ साल पहले मेरठ से दिल्ली आईं करीब 30 वर्षीय साफरीन (बदला हुआ नाम) ने 2024 के आम चुनाव में पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। उन्होंने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा कि वे सभी मदद के लिए केवल मकान मालिकों और गैर-सरकारी संगठनों के भरोसे बैठी हैं। साफरीन का मानना है कि यह नई प्रक्रिया उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करती है।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि पति की मौत के बाद इसी काम की बदौलत वे अपने बच्चों की परवरिश कर पा रही हैं और बेटियों की शादी के लिए पैसे जोड़ रही हैं। लेकिन सरकार उन्हें कोई मान्यता नहीं देती, क्योंकि अगर वे ऐसा करते, तो उन्हें पता होता कि एक सेक्स वर्कर अपने परिवार के दस्तावेज कभी नहीं ला सकती। साफरीन ने सवाल किया कि जब उन्हें अपनी मां तक का नाम याद नहीं है, तो वे जन्म प्रमाण पत्र कहां से लाएं।
साफरीन के कमरे के बगल में रहने वालीं 40 वर्षीय रीता ने भी व्यवस्था पर अपना गुस्सा जाहिर किया। उनका कहना है कि प्रवासी मजदूर ही इस शहर को चलाते हैं, लेकिन फिर भी उनके साथ भारी भेदभाव किया जाता है। रीता के मुताबिक, नागरिक के रूप में उनके अधिकार पहले ही सीमित हैं और यह नई प्रक्रिया पूरी तरह से भेदभावपूर्ण है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर इस उम्र में सरकार उनसे उनकी भारतीयता का सबूत मांगना चाहती है या उनका अपना मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनने का हक छीनना चाहती है, तो छीन ले। क्योंकि वैसे भी वे इसके खिलाफ कुछ नहीं कर पाएंगी।
हालांकि, रीता के बेटे रवि जैसे कुछ बच्चों को यह उम्मीद जरूर है कि उनके 10वीं और 12वीं कक्षा के प्रमाण पत्र शायद उनकी मां का नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने में मददगार साबित हो सकें।
इस पूरे मामले पर दिल्ली के संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी बलराम मीणा ने अपनी बात स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि बेघर लोगों और सेक्स वर्कर्स जैसे हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए कोई अलग प्रक्रिया नहीं है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर इन महिलाओं का पुराना रिकॉर्ड नहीं मिलता है और उनके पास आवश्यक दस्तावेज भी नहीं हैं, तो तय प्रक्रिया के अनुसार मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए जाएंगे।
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