उत्तर प्रदेश: नोएडा में 13 अप्रैल को हुए प्रदर्शन में शामिल कई मजदूरों और कार्यकर्ताओं को अपने हक की आवाज उठाना काफी भारी पड़ा है। बेहतर वेतन और काम के हालात सुधारने की मांग करने वाले इन लोगों की सारी जमा-पूंजी अब खत्म हो चुकी है और वे एक अदद नौकरी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
इस विरोध प्रदर्शन के चार महीने बीत जाने के बाद भी, पुलिस कार्रवाई में गिरफ्तार हुए मजदूर गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। जमानत लेने, कानूनी दस्तावेज जुटाने और अपने केस लड़ने में उनका हजारों रुपये खर्च हो चुका है। कुछ मामलों में तो यह खर्च लाखों तक पहुंच गया है।
इन खर्चों में कोर्ट में अर्जी देना, हलफनामा बनवाना, नोटरी, सर्टिफाइड कॉपी निकलवाना और दस्तावेजों की फोटोकॉपी जैसी चीजें शामिल हैं। इसके अलावा सूरजपुर कोर्ट के लगातार चक्कर लगाने, पेशी के कारण दिहाड़ी का नुकसान, खाने-पीने और स्थानीय यात्रा पर भी भारी रकम खर्च हो रही है।
इस परेशानी को और बढ़ाने का काम परिवारों की भागदौड़ ने किया। जमानत और रिहाई के लिए जरूरी कागजात और वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी करने के लिए मजदूरों के परिजनों को दिल्ली, सूरजपुर कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट और अपने पैतृक गांवों के बीच अनगिनत चक्कर लगाने पड़े।
एक कपड़ा फैक्ट्री में 25 वर्षीय ट्रेनी सुपरवाइजर मनजीत (बदला हुआ नाम) को प्रदर्शन के कथित तौर पर हिंसक होने के पांच दिन बाद पकड़ा गया था। 18 अप्रैल को वह अपनी कंपनी से बाहर निकला ही था कि पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर कासना जेल भेज दिया। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में रहने वाले उसके माता-पिता और छह भाई-बहन तुरंत उस तक नहीं पहुंच सके। मनजीत ने बताया कि भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद वह बिल्कुल अकेला पड़ गया था और उसकी गिरफ्तारी के 10 दिन बाद ही उसके चाचा उससे मिल पाए।
रिहाई के एक महीने बाद भी मनजीत को काम नहीं मिल पा रहा है। उसका कहना है कि गिरफ्तारी के कारण नौकरी छूट जाने से उसका आत्मविश्वास पूरी तरह से टूट गया है। दोस्तों के बहुत जोर देने पर उसने कुछ जगह इंटरव्यू दिए, लेकिन कहीं से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।
मनजीत के मुताबिक, सिर्फ कागजी कार्रवाई में ही उसके चाचा के कम से कम 15,000 से 20,000 रुपये खर्च हो गए। यह तब हुआ जब वकीलों ने उसका केस मुफ्त (प्रो बोनो) में लड़ा था। उसने बताया कि कई अन्य लोग ऐसे भी हैं जिन पर कई एफआईआर दर्ज हैं और उनके पास मुफ्त में केस लड़ने वाले वकील भी नहीं हैं।
ई-रिक्शा चलाने वाले करण (बदला हुआ नाम) को 13 अप्रैल की रात तब पकड़ा गया, जब वह अपना काम खत्म करके रिक्शा खड़ा कर चुका था। उसके चाचा के अनुसार, वह पास की दुकान से रात का खाना लेने जा रहा था तभी कुछ पुलिसकर्मी उसे उठा ले गए।
करण के चाचा ने बताया कि उन्होंने अपने भतीजे की जमानत और रिहाई पर 2.5 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं। प्रदर्शन के चार दिन बाद, पुलिस ने करण पर उन्हीं धाराओं में एक अलग पुलिस स्टेशन में एक और मामला दर्ज कर दिया। इस भारी भरकम खर्च में कानूनी दस्तावेजों की तैयारी, यात्रा, चार महीने का कमरे का किराया और ई-रिक्शा की ईएमआई शामिल है।
एक टेक्सटाइल फैक्ट्री में काम करने वाले नमन (बदला हुआ नाम) के पिता ने बताया कि यात्रा और खाने के खर्च को छोड़कर, उनके कम से कम 27,500 रुपये खर्च हो चुके हैं। बेटे को जेल से छुड़ाने की जद्दोजहद में उनके कई दिनों की दिहाड़ी भी मारी गई। उन्होंने बताया कि उनके वकील ने केवल 5,100 रुपये लिए, लेकिन उन्होंने ऐसे वकीलों के बारे में भी सुना है जो एक पेशी के 3,000 से 5,000 रुपये लेते थे और फिर गायब हो जाते थे।
इस लंबी कानूनी लड़ाई को चंदा और कर्ज लेकर लड़ा जा रहा है। कार्यकर्ता आदित्य आनंद के भाई केशव आनंद ने बताया कि कम से कम 10 एफआईआर का सामना कर रहे कार्यकर्ताओं का कानूनी खर्च लाखों में पहुंच गया है।
केशव ने कहा कि सभी आठ कार्यकर्ताओं पर वे अब तक लगभग 7-10 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। यह खर्च तब आ रहा है जब वरिष्ठ वकील उनका केस मुफ्त में लड़ रहे हैं, जबकि इनमें से दो लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत आरोप लगे हैं। ज्यादातर पैसा दोस्तों और परिवारों द्वारा चंदे (क्राउडफंडिंग) के जरिए जुटाया गया है, जबकि कुछ रकम कर्ज लेकर व्यवस्थित की गई है।
केशव आनंद ने बताया कि वकालतनामा दाखिल करने, जमानत याचिका लगाने और सुनवाई में शामिल होने के लिए परिजनों को दिल्ली, सूरजपुर और इलाहाबाद हाई कोर्ट के बीच लगातार धक्के खाने पड़ रहे हैं, जिससे उनका जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है।
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