नई दिल्ली: भारत के महापंजीयक (RGI) ने आगामी जातिगत जनगणना को लेकर एक बेहद अहम फैसला लिया है। जनगणना के दौरान जातियों की सूची वाले ड्रॉप-डाउन मेनू का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। इसके बजाय 'ओपन-एंडेड' यानी खुले सवालों का विकल्प चुना गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि लोग अपनी जो जाति बताएंगे, उसे बिना किसी बदलाव के वैसा ही दर्ज कर लिया जाएगा।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि सर्वे करने वाले कर्मचारी लोगों से सिर्फ उनकी जाति पूछेंगे। जो भी जवाब मिलेगा, उसे बिना किसी काट-छांट के लिख लिया जाएगा। किसी भी उपनाम, उप-जाति या अन्य जवाबों को किसी बड़ी जाति श्रेणी में वर्गीकृत करने का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा।
देशभर में जनसंख्या की गिनती और जातिगत जनगणना का यह महाभियान अगले साल फरवरी महीने में शुरू होने जा रहा है। हालांकि, पहाड़ी और बर्फबारी वाले दुर्गम इलाकों में सर्दियों की दिक्कतों से बचने के लिए यह प्रक्रिया इसी साल 1 सितंबर से आरंभ कर दी जाएगी।
यह नया प्रारूप काफी हद तक साल 2011 में हुई सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) जैसा ही होने की संभावना है। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि किसी भी उपनाम को किसी विशेष जाति वर्ग में नहीं डाला जाएगा। अधिकारी के मुताबिक सारी जानकारी ठीक वैसे ही दर्ज होगी जैसी जनता द्वारा बताई जाएगी।
इससे पहले भारत के महापंजीयक ने केंद्र और राज्यों की जाति सूचियों के आधार पर एक ड्रॉप-डाउन मेनू बनाने पर विचार किया था। यह योजना विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए थी। बता दें कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को दर्ज करने के लिए जनगणना में पहले से ही ड्रॉप-डाउन मेनू का इस्तेमाल होता है।
साल 2011 की जनगणना में भी जातियों को लेकर इसी तरह के खुले सवाल पूछे गए थे। खराब गुणवत्ता, मानकीकृत रजिस्ट्री के अभाव और खामियों के कारण उस समय के आंकड़े किसी काम नहीं आ सके थे। उस दौरान लोगों ने बिना किसी सत्यापन के अपनी जातियां बताई थीं, जिससे यह प्रक्रिया एक प्रशासनिक दुःस्वप्न बन गई थी।
इसका नतीजा यह हुआ कि 2011 में करीब 46.7 लाख अलग-अलग जातियों के नाम सामने आए। इसकी तुलना में 1931 की व्यापक जातिगत जनगणना में केवल 4,147 जातियां ही दर्ज हुई थीं। भारी विसंगतियों के कारण केंद्र सरकार को अंततः उस कच्चे डेटा को रोकना पड़ा था।
इस फैसले पर एक केंद्रीय मंत्री ने स्वीकार किया कि ओपन-एंडेड सवालों से 2011 जैसे परिणाम फिर से आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार हमेशा से मानती रही है कि जटिलताओं के कारण जातिगत जनगणना में खराब डेटा मिलने की पूरी आशंका होती है। लेकिन विपक्ष राजनीतिक कारणों से इसकी मांग कर रहा था, जिसे सरकार ने मान लिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अब अंतिम डेटा से विपक्ष को ही निपटना होगा।
सरकार का यह भी तर्क है कि राज्य को जातिगत पहचान तय करने वाला मध्यस्थ नहीं बनना चाहिए। इसलिए ओपन-एंडेड विकल्प ही इस प्रक्रिया को पूरा करने का एकमात्र सही रास्ता है। प्रस्तावित प्रणाली के तहत कर्मचारी यह तय नहीं करेगा कि बताई गई जाति किसी मान्यता प्राप्त श्रेणी या उप-जाति में आती है या नहीं।
गृह मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार, जनगणना कोई सत्यापन प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह केवल एक रिकॉर्डिंग प्रक्रिया है। इसमें आपके दावों का कोई सबूत नहीं मांगा जाता है। यदि कोई ब्राह्मण खुद को यादव बताता है, तो कर्मचारी उससे जाति प्रमाण पत्र नहीं मांगेगा। सरकार का मानना है कि ड्रॉप-डाउन मेनू बनाने से अविश्वसनीय डेटा में राज्य की भागीदारी जैसी स्थिति पैदा हो जाती।
सरकार के इस फैसले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और संघ परिवार के एक वर्ग की चिंता भी दूर हो गई है। उनका तर्क था कि मौजूदा केंद्रीय और राज्य जाति सूचियों पर निर्भर होने से उस जाति व्यवस्था को और मजबूती मिलेगी, जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान संस्थागत बनाया गया था।
हालांकि, खुले प्रारूप को चुनने के बाद अब सरकार के सामने फिर से 2011 जैसी चुनौती खड़ी हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि लाखों व्यक्तिगत और मनमाने जवाबों को कैसे एक विश्वसनीय और मानकीकृत जाति डेटा में बदला जाएगा, वह भी बिना ऐसा लगे कि सरकार ने लोगों द्वारा दी गई जानकारी में अपनी तरफ से कोई छेड़छाड़ की है।
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