प्रस्तावित FCRA संशोधन बिल पर भड़का असम क्रिश्चियन फोरम: कहा- छिन जाएंगे गरीबों के अस्पताल, धार्मिक स्वायत्तता पर भी मंडरा रहा है खतरा

एफसीआरए (FCRA) संशोधन बिल को लेकर असम क्रिश्चियन फोरम की चेतावनी, कहा- नए नियमों से पूर्वोत्तर में गरीबों, आदिवासियों के अस्पताल और स्कूल हो जाएंगे बंद।
Assam Christian Forum
फाइल फोटोफोटो साभार- Assam Christian Forum (Facebook)
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नई दिल्ली: प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए (FCRA) संशोधन बिल को लेकर पूर्वोत्तर भारत में विरोध के सुर तेज हो गए हैं। असम क्रिश्चियन फोरम ने इस बिल का कड़ा विरोध करते हुए केंद्र सरकार और आठ पूर्वोत्तर राज्यों के सांसदों से इसके कठोर प्रावधानों को तुरंत वापस लेने की अपील की है। फोरम का स्पष्ट कहना है कि इन सख्त नियमों को थोपने के बजाय, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार मौजूदा एफसीआरए 2010 में ही उचित बदलाव किए जाने चाहिए।

फोरम ने अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि ये प्रस्तावित संशोधन असम और पूरे पूर्वोत्तर में काम कर रहे नागरिक समाज संगठनों, चर्चों और उन तमाम संस्थानों के लिए एक बड़ा खतरा हैं, जो लंबे समय से गरीबों, दलितों, आदिवासियों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।

इस नए बिल के विवादित प्रावधानों के तहत मूल 1976 अधिनियम के लागू होने के बाद से विदेशी योगदान से बनी सभी चल और अचल संपत्तियों को सीधे तौर पर जब्त करने की बात कही गई है। इसके लिए एक 'नामित प्राधिकरण' का गठन किया जाएगा, जिसे इन संपत्तियों पर कब्जा करने और उन्हें अपने तरीके से निपटाने का असीमित अधिकार होगा। इतना ही नहीं, जिन संगठनों का पंजीकरण रद्द होगा, उनका बचा हुआ फंड भी सीधे भारत की संचित निधि में ट्रांसफर कर दिया जाएगा।

फोरम के अनुसार, संपत्तियों का स्थायी मालिक बनने के बाद यह प्राधिकरण ट्रांसफर किए गए फंड को किसी भी सरकारी निकाय को सौंप सकता है या फिर संपत्तियों को बेच सकता है। यह कदम पहले की उस व्यवस्था को पूरी तरह से पलट देता है, जहां पंजीकरण रद्द होने पर भी संगठन अपनी संपत्तियों को सुरक्षित रख सकते थे और केवल उनका बचा हुआ फंड ही फ्रीज किया जाता था। फोरम ने इन नए उपायों को महज नियमन मानने से इंकार करते हुए इसे एक दंडात्मक जब्ती करार दिया है।

शनिवार, 8 अगस्त को असम क्रिश्चियन फोरम के प्रवक्ता एलन ब्रूक्स ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने न्याय व्यवस्था की मूल भावना का जिक्र करते हुए कहा कि प्राकृतिक न्याय की यह मांग है कि सजा हमेशा अपराध के अनुपात में ही होनी चाहिए।

ब्रूक्स ने चौंकाने वाले आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि हाल के वर्षों में 15,000 से अधिक संगठनों को विदेशी योगदान प्राप्त करने से रोका गया है। इनमें से भ्रष्टाचार या गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के कारण केवल एक दर्जन संगठनों पर ही कार्रवाई हुई है। बाकी अधिकांश संगठनों ने सिर्फ देरी से रिपोर्ट जमा करने या अकाउंटिंग में हुई छोटी तकनीकी गलतियों की वजह से अपना पंजीकरण खो दिया।

उन्होंने इसे घोर अन्याय बताते हुए कहा कि ऐसी छोटी भूल-चूक के लिए 1976 से बनी संपत्तियों से संगठनों को बेदखल कर देना बुनियादी निष्पक्षता के खिलाफ है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसी विशेष संपत्ति के भ्रष्ट तरीके से प्राप्त होने या बनने के पारदर्शी प्रमाण मिलने पर ही सिर्फ उस विशिष्ट संपत्ति को कब्जे में लिया जाना चाहिए, न कि पूरी संस्था को।

फोरम ने चेतावनी दी है कि इस बिल का सबसे भयानक असर उन आम लाभार्थियों पर पड़ेगा जो दूरदराज के इलाकों में रहते हैं। असम सहित पूर्वोत्तर के कई दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में अधिकांश स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय पूरी तरह या आंशिक रूप से विदेशी मदद से ही बनाए गए हैं, क्योंकि वहां आज भी सरकारी बुनियादी ढांचा बेहद जर्जर स्थिति में है।

बयान में इस जमीनी हकीकत पर जोर दिया गया है कि पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी दो-तिहाई आबादी अपनी बीमारियों के लिए पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में कर्मचारियों, दवाओं, जांच सुविधाओं और बिजली का भारी अभाव रहता है। स्कूलों में अक्सर एक ही अनियमित शिक्षक होता है और मिड-डे मील जैसी योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। खराब यातायात के कारण ये ग्रामीण गुवाहाटी और शिलांग जैसे शहरों में मौजूद बेहतर सुविधाओं तक पहुँच ही नहीं पाते हैं।

ऐसी विकट परिस्थितियों में चर्च द्वारा संचालित संस्थानों और नागरिक समाज समूहों ने आगे आकर इस खाई को पाटने का काम किया है। वे नाममात्र की फीस पर या बिल्कुल मुफ्त में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं, जो कि संविधान के तहत राज्य का मौलिक कर्तव्य है। ये संस्थाएं अपने शिक्षकों को सीमित वेतन देती हैं और विदेशी अनुदान तथा स्थानीय दान पर निर्भर रहती हैं, क्योंकि इस तरह के नेक कार्यों के लिए भारतीय सार्वजनिक धन प्राप्त करना बहुत ही कठिन प्रक्रिया है।

फोरम ने कहा कि यदि नामित प्राधिकरण इन संपत्तियों पर कब्जा कर लेता है, तो इन संगठनों को मजबूरी में अपनी जीवनरक्षक सेवाएं बंद करनी पड़ेंगी। इसका सीधा नुकसान गरीब मरीजों, छात्रों और स्थानीय समुदायों को होगा। ये सुविधाएं ही फिलहाल लोगों को भूमिहीन होने, भयंकर गरीबी का शिकार होने और इसके कारण पैदा होने वाले जातीय तनावों से बचा रही हैं।

इसके अलावा, फोरम ने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर भी अत्यंत गंभीर सवाल उठाए हैं। बिल में धार्मिक स्वरूप बनाए रखते हुए सरकार की देखरेख में चर्चों, मस्जिदों और मंदिरों के राज्य प्रबंधन की अनुमति देने वाले प्रावधान जोड़े गए हैं। फोरम का मानना है कि यह सीधे तौर पर पूजा स्थलों की स्वायत्तता और उनकी स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा है।

न्यायिक प्रक्रिया की खामियों को उजागर करते हुए फोरम ने बताया कि प्रस्तावित बिल में अपील करने के अधिकार को बहुत ज्यादा सीमित कर दिया गया है। इसके तहत किसी जिला न्यायाधीश या निर्दिष्ट न्यायिक अधिकारी के समक्ष केवल 90 दिनों के भीतर ही अपील की जा सकेगी, जिससे प्रभावित संगठनों को अपना बचाव करने का पर्याप्त समय और अवसर ही नहीं मिल पाएगा।

असम क्रिश्चियन फोरम ने इस प्रस्तावित जब्ती व्यवस्था को सिरे से खारिज करते हुए मौजूदा एफसीआरए में ही न्यायसंगत संशोधन की मांग की है। फोरम ने अपील की है कि पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में एक पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित की जाए, संगठन को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर मिले, सजा अपराध के अनुपात में हो और जनसेवा के लिए बनी संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। साथ ही, उन्होंने सार्वजनिक-निजी भागीदारी और अनुदान सहायता की एक मजबूत एवं सुलभ नीति बनाने पर भी विशेष जोर दिया है।

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