
प्रयागराज- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के अवैध धर्मांतरण कानून (Uttar Pradesh Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021) के तहत दर्ज एक महत्वपूर्ण मामले में अहम आदेश सुनाया है। न्यायालय ने दो युवतियों की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें मुरादाबाद के बिलारी थाने में दर्ज एफआईआर (केस क्राइम नंबर 21/2026) को रद्द करने की मांग की गई थी। एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि पांच मुस्लिम युवतियों ने एक हिंदू छात्रा को बुर्का पहनाकर और इस्लाम कबूलने के लिए दबाव डालकर अवैध धर्मांतरण का प्रयास किया।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने अपने आदेश में साफ किया कि इस मामले में FIR रद्द करने लायक कोई स्थिति नहीं बनती है। पीठ ने कहा कि जांच में अब तक जो सामग्री सामने आई है, उससे प्राथमिक तौर पर संज्ञेय अपराध बनता दिखता है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है।
परिवादी (रिस्पांडेंट नंबर 3) जो पीड़िता का भाई है, ने 22 जनवरी 2026 को बिलारी थाने में FIR दर्ज कराई थी। उसने बताया कि उसकी बहन कक्षा 12 की छात्रा है और मुरादाबाद के शाहकुंज कॉलोनी में ट्यूशन पढ़ने जाती है। वहां पढ़ने वाली कुछ मुस्लिम लड़कियां उसकी बहन को लगातार बुर्का पहनने और इस्लाम कबूलने के लिए उकसा रही थीं।
जांच के दौरान पीड़िता का बयान धारा 180 BNSS और 183 BNSS के तहत रिकॉर्ड किया गया। उसने बताया कि 20 दिसंबर 2025 को जब कोचिंग क्लासेस की छुट्टी थी, तब उसकी दोस्त ने बुर्का लाकर उसे पहनने को कहा। जब उसने मना किया तो सभी आरोपियों ने उसे जबरन बुर्का पहना दिया। उसके बाद उसे एक रेस्तरां ले जाकर नॉन-वेज खाना खिलाया गया।
पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने यह भी कहा कि मुख्य आरोपी xxया उसे इस्लाम कबूलने के लिए बार-बार कहती थी। उसने बताया, "xxया मेरा दिमाग धोने की कोशिश कर रही थी। मैंने यह बात अपने माता-पिता को नहीं बताई क्योंकि उसने ऐसा करने से मना किया था। वे मुझसे कहती थीं कि उनके धर्म में आज़ादी है - बुर्का पहनने के बाद वे कहीं भी जा सकती हैं।"
हालांकि, पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया कि किसी ने उसे कलमा पढ़ने या रोजा रखने को नहीं कहा। लेकिन उन्होंने कुरान को 40 दिनों में पढ़ने की बात कही थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता शिव शंकर मिश्रा और अशुतोष उपाध्याय ने तर्क दिया था कि FIR में किसी विशेष घटना की तारीख, समय और जगह का उल्लेख नहीं है। उनका कहना था कि परिवादी (पीड़िता का भाई) खुद xxया को परेशान करता था और जब उसने प्रस्ताव रखा तो मना कर दिया गया, जिसके बाद बदले की भावना से यह FIR दर्ज कराई गई। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता सिर्फ 18 साल की युवतियां हैं और उनकी बोर्ड परीक्षाएं चल रही थीं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि FIR में सिर्फ सामान्य और अस्पष्ट आरोप नहीं हैं। पीड़िता के बयान और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर प्राथमिक रूप से अपराध का मामला बनता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह एफआईआर बदले की भावना से दर्ज कराई गई है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है कि परिवादी पहले xxया को परेशान कर रहा था या उसने उसे प्रपोज किया था।
एफआईआर यूपी के अवैध धर्मांतरण कानून की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस कानून के तहत 'प्रलोभन' (Allurement) की बहुत व्यापक परिभाषा दी गई है। कोर्ट ने कहा कि क्या याचिकाकर्ताओं के कृत्य प्रलोभन या अनुचित प्रभाव की श्रेणी में आते हैं, यह जांच का विषय है और एफआईआर खारिज करने के चरण में इस पर विचार करना जल्दबाजी होगी।
अपने आदेश में न्यायालय ने यूपी के धर्मांतरण कानून की मंशा पर गहरी चिंता जताते हुए कहा:
"यह अधिनियम समाज में उभरती एक गंभीर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था, जहां कुछ लोग अपने धर्म का प्रचार-प्रसार नहीं करते, बल्कि इस भ्रांति में दूसरों पर इसे थोपते हैं कि जिस धर्म में वे विश्वास रखते हैं, उसका पालन दूसरे भी करें। यदि यह प्रवृत्ति युवाओं में देखने को मिले, तो यह और भी चिंताजनक है। यह वह समय होता है जब उन्हें शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अपने कौशल विकसित करने और समाज व राष्ट्र की सेवा में खुद को समर्पित करने के बारे में सोचना चाहिए।"
न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी नए कानून के शुरुआती चरणों में ही उसे रोक देना उसके उद्देश्य को विफल करना होगा:
"एक क़ानून जो किसी आपातकालीन दुष्प्रवृत्ति को रोकने के लिए बनाया गया है, यदि उसके प्रवर्तन के शुरुआती चरणों में ही उसे रोक दिया जाता है, तो वह क़ानून अवरुद्ध हो जाएगा और उसका उद्देश्य विफल हो जाएगा।"
कोर्ट ने दोनों याचिकाओं (क्रिमिनल मिस्क रिट पिटीशन नंबर 3203/2026 और 4128/2026) को खारिज कर दिया। साथ ही एक अन्य याचिकाकर्ता को 12 फरवरी 2026 को दी गई अंतरिम गिरफ्तारी से राहत (stay of arrest) भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई है।
कोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुलिस इस मामले में अपनी जांच जारी रख सकेगी। न्यायालय ने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के प्रधान सचिव (गृह), लखनऊ, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुरादाबाद और थाना बिलारी के प्रभारी निरीक्षक को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
गौरतलब है कि इस मामले की मुख्य आरोपी ने पहले ही अपनी याचिका वापस ले ली थी, जबकि अन्य आरोपियों ने FIR रद्द करने की मांग की थी जिसे अदालत ने खारिज कर दिया है।
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