Dalit History Month | शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव और आत्महत्याओं को लेकर सवाल पर सरकार का गोलमोल जवाब; सुसाइड के कारणों में 'जाति' नहीं, ये कारण गिनाए

सरकार ने छात्र आत्महत्याओं और जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कोई ठोस आंकड़ा नहीं दिया और न ही यह बताया कि जाति-आधारित उत्पीड़न को लेकर कितनी शिकायतें आईं और कितनी का समाधान हुआ।
कांग्रेस का कहना है कि 2023 में अकेले 66,955 युवाओं ने आत्महत्या की और पिछले दस साल में छात्र आत्महत्याएं 65 प्रतिशत बढ़ी हैं, लेकिन सरकार जातिगत कारणों को नजरअंदाज कर केवल सामान्य मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।
कांग्रेस का कहना है कि 2023 में अकेले 66,955 युवाओं ने आत्महत्या की और पिछले दस साल में छात्र आत्महत्याएं 65 प्रतिशत बढ़ी हैं, लेकिन सरकार जातिगत कारणों को नजरअंदाज कर केवल सामान्य मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।ग्राफिक- आसिफ निसार/ द मूकनायक
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नई दिल्ली- लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की बढ़ती आत्महत्याओं और जातिगत भेदभाव के बीच संभावित संबंध को लेकर हाल ही में पूछे गए स्पष्ट सवालों पर केंद्र सरकार ने गोलमोल जवाब देकर मुद्दे से किनारा कर लिया। अतारांकित प्रश्न संख्या-4963 के लिखित उत्तर में शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने जातिगत भेदभाव को छात्र आत्महत्याओं का कारण मानने से साफ इनकार कर दिया और एनसीआरबी रिपोर्ट के हवाले से आत्महत्या के सामान्य कारण गिनाए, लेकिन जाति आधारित भेदभाव, संस्थागत उत्पीड़न या आरक्षण से जुड़े विवाद का कहीं कोई जिक्र तक नहीं किया।

सरकार ने जातिगत भेदभाव के कारण छात्रों द्वारा की गई आत्महत्याओं और कॉलेजों में जाति आधारित उत्पीड़न की शिकायतों पर कोई राज्य-वार, वर्ष-वार या सामाजिक श्रेणी-वार आंकड़ा भी नहीं दिया, जबकि राहुल गांधी ने ठीक इन्हीं मुद्दों पर विस्तृत जानकारी मांगी थी।

कांग्रेस का कहना है कि 2023 में अकेले 66,955 युवाओं ने आत्महत्या की और पिछले दस साल में छात्र आत्महत्याएं 65 प्रतिशत बढ़ी हैं, लेकिन सरकार जातिगत कारणों को नजरअंदाज कर केवल सामान्य मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।
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जब सवाल साफ़ हैं तो जवाब सीधा स्पष्ट क्यों नहीं ?

राहुल गांधी ने अपने सवाल में सीधे पूछा था कि क्या सरकार को पता है कि 2013 से 2023 के बीच छात्र आत्महत्याओं में 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इसके क्या कारण हैं। उन्होंने विगत दस वर्षों में सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी संस्थानों में छात्र आत्महत्याओं का वर्ष-वार, राज्य-वार और सामाजिक श्रेणी-वार ब्यौरा मांगा था।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि उन्होंने स्पष्ट रूप से पूछा था कि क्या सरकार ने जाति आधारित भेदभाव और आत्महत्याओं के बीच संबंध सहित छात्र आत्महत्या के प्रमुख कारणों का पता लगाने के लिए कोई अध्ययन कराया है?

इसके अलावा उन्होंने विगत दस वर्षों में शैक्षणिक संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की राज्य-वार शिकायतों की संख्या, उनके निपटारे का ब्यौरा और जातिगत भेदभाव के कारण होने वाली आत्महत्याओं के लिए संस्थागत जवाबदेही तय करने हेतु कानून सुदृढ़ करने या नया कानून बनाने की योजना के बारे में भी जानकारी मांगी थी।

आत्महत्या के कारणों की सूची में शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने पेशेवर/करियर की समस्याएं, अलगाव की भावना, दुर्व्यवहार, हिंसा, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक विकार, शराब की लत, वित्तीय नुकसान और पुरानी पीड़ा जैसे सामान्य मुद्दे गिनाए। इस सूची में जाति आधारित भेदभाव का नामोनिशान तक नहीं था।
लेकिन सरकार का जवाब इन सवालों से पूरी तरह किनारा करता नजर आया। डॉ. सुकांत मजूमदार ने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) आत्महत्या के मामलों का डेटा एकत्र करता है और इसका विवरण एडीएसआई रिपोर्ट में उपलब्ध है, जिसे वेबसाइट पर देखा जा सकता है। आत्महत्या के कारणों की सूची में उन्होंने पेशेवर/करियर की समस्याएं, अलगाव की भावना, दुर्व्यवहार, हिंसा, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक विकार, शराब की लत, वित्तीय नुकसान और पुरानी पीड़ा जैसे सामान्य मुद्दे गिनाए। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस सूची में जाति आधारित भेदभाव का नामोनिशान तक नहीं था। सरकार ने छात्र आत्महत्याओं और जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कोई ठोस आंकड़ा नहीं दिया और न ही यह बताया कि जाति-आधारित उत्पीड़न को लेकर कितनी शिकायतें आईं और कितनी का समाधान हुआ।

सरकार ने इसके बजाय मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी अपनी विभिन्न पहलों का विस्तृत ब्यौरा दिया। शिक्षा मंत्रालय की ‘मनोदर्पण’ पहल, यूजीसी के दिशानिर्देश, जुलाई 2023 की व्यापक रूपरेखा, मालवीय मिशन के तहत शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, टेली-मानस हेल्पलाइन (जिस पर 34,91,000 से अधिक कॉल्स आईं) और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को शामिल करने जैसी योजनाओं का जिक्र किया गया। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गठित राष्ट्रीय कार्य बल (एनटीएफ) का भी उल्लेख किया गया। लेकिन इन सबके बीच जातिगत भेदभाव को लेकर कोई ठोस कदम या नया कानून बनाने की घोषणा नहीं की गई।

विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार समस्या को ही स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जब राहुल गांधी ने रोहित वेमुला जैसे मामलों का हवाला देते हुए जाति और आत्महत्या के संबंध पर सवाल उठाया तो सरकार ने इसे मानने से इनकार कर दिया। कांग्रेस का कहना है कि 2023 में अकेले 66,955 युवाओं ने आत्महत्या की और पिछले दस साल में छात्र आत्महत्याएं 65 प्रतिशत बढ़ी हैं, लेकिन सरकार जातिगत कारणों को नजरअंदाज कर केवल सामान्य मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर जोर दे रही है। कांग्रेस हैंडल से x पर किये पोस्ट में कहा, "राहुल गांधी जी ने रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्रों का भी ज़िक्र किया। जाति और आत्महत्या के बीच संबंध पर सवाल उठाया, लेकिन सरकार ने छात्र आत्महत्याओं के कारणों में जातिगत भेदभाव को मानने से ही इनकार कर दिया। जब सरकार समस्या ही मानने को तैयार नहीं, तो समाधान कैसे निकलेगा? इनका तरीका यही है - आंखें मूंद लो, नज़रअंदाज़ करो, और सच को छिपाते रहो।"

Summary

शिक्षाविदों और छात्र संगठनों का भी यही मानना है कि शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव और संस्थागत उत्पीड़न कई छात्रों की आत्महत्या का बड़ा कारण बन रहे हैं, लेकिन सरकार के इस गोलमोल जवाब से साफ है कि वह इन मुद्दों पर आंखें मूंदे बैठी है। सवाल उठता है कि जब सरकार स्पष्ट सवालों के जवाब में आंकड़े देने और जातिगत भेदभाव को कारण मानने से ही कतराती है तो छात्रों की सुरक्षा के लिए वास्तविक समाधान कैसे निकलेगा?

कांग्रेस का कहना है कि 2023 में अकेले 66,955 युवाओं ने आत्महत्या की और पिछले दस साल में छात्र आत्महत्याएं 65 प्रतिशत बढ़ी हैं, लेकिन सरकार जातिगत कारणों को नजरअंदाज कर केवल सामान्य मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।
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