
नई दिल्ली: देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) का नॉर्थ कैंपस 13 फरवरी को विचारधाराओं के अखाड़े में तब्दील हो गया. मामला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नई गाइडलाइंस पर रोक के विरोध का था, लेकिन सुर्खियों में आया एक 'पानी का सवाल'. यह सवाल प्यास बुझाने के लिए नहीं था, बल्कि दलित अस्मिता और ऐतिहासिक 'महाड सत्याग्रह' पर किया गया एक तीखा और अपमानजनक व्यंग्य था. इस घटना ने न केवल विश्वविद्यालय के माहौल को गरमाया, बल्कि एक बार फिर 'सवर्ण मीडिया' की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
घटना की जड़: 'पानी' का तंज और महाड सत्याग्रह का अपमान
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में यूट्यूबर रुचि तिवारी (जो खुद को पत्रकार बताती हैं) प्रदर्शनकारी बहुजन छात्रों के पास दौड़-दौड़ कर एक ही सवाल पूछती नजर आती हैं: "क्या बात पानी नहीं मिला भैया? आपको भी पानी नहीं मिला? 5000 सालों तक पानी नहीं मिला... देखो, ये नहीं बोलेंगे कि आरक्षण नहीं चाहिए...."
जानकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कोई साधारण रिपोर्टिंग नहीं थी. यह सीधा हमला उस ऐतिहासिक पीड़ा पर था, जिसके खिलाफ डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 1927 में 'महाड सत्याग्रह' किया था, ताकि अछूत माने जाने वाले वर्गों को चवदार तालाब से पानी पीने का मानवीय अधिकार मिल सके. फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर ने भी इस वीडियो को साझा करते हुए स्पष्ट किया कि यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि छात्रों को उकसाने (Instigate) की एक सोची-समझी साजिश थी.
असली पीड़ित कौन? अंजलि या रुचि तिवारी?
मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपनी रिपोर्ट्स में रुचि तिवारी को भीड़ से घिरी हुई एक 'पीड़ित महिला' के रूप में पेश किया, जिसे पुलिस बचाकर ले जा रही है. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू, जिसे टीवी स्क्रीन्स ने जानबूझकर गायब कर दिया, वह बेहद भयावह है.
मौके पर मौजूद छात्रा और प्रत्यक्षदर्शी अंजलि ने जो बयां किया, वह चौंकाने वाला है. अंजलि के मुताबिक, विवाद की शुरुआत तब हुई जब रुचि तिवारी बामसेफ न्यूज़ के पत्रकार नवीन कुमार नंदन का फोन छीनने और उन्हें धमकाने लगीं. जब अंजलि बीच-बचाव करने पहुंचीं, तो रुचि तिवारी ने अंजलि का मुंह पकड़कर उन्हें जोरदार धक्का दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गईं.
अंजलि बताती हैं, "मुझे उनका नाम तक नहीं पता था. मैंने देखा कि वह नवीन को दोनों हाथों से जकड़े हुए थीं. जब मैंने छुड़ाने की कोशिश की, तो उन्होंने मुझे पटक दिया. मैं कुछ देर के लिए सुन्न हो गई. यह सब पुलिस और सुरक्षाबलों की मौजूदगी में हुआ."
अंजलि का आरोप है कि घटना के बाद जब वह मौरिस नगर थाने में FIR दर्ज कराने गईं, तो वहां पहले से ही 50-100 लोगों की उन्मादी भीड़ जमा थी, जिन्होंने उन्हें घेर लिया, भद्दे इशारे किए और रेप की धमकियां दीं. अंजलि सवाल उठाती हैं, "मेरे अंडरगारमेंट्स दिख रहे थे, मुझे मारा गया, मेरी डिग्निटी का क्या? क्या सुरक्षा और सम्मान सिर्फ एक पक्ष का अधिकार है?"
पत्रकार नवीन कुमार नंदन का बड़ा खुलासा: 'ANI ने मेरा बयान दबाया'
इस पूरे घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है. बामसेफ न्यूज़ के पत्रकार नवीन कुमार नंदन ने आरोप लगाया है कि न्यूज़ एजेंसी ANI ने उनका साक्षात्कार रिकॉर्ड किया था, लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया.
नवीन ने अपने बयान में कहा, "लाल/ऑरेंज स्वेटर वाली महिला (रुचि तिवारी) मुझसे मेरा फोन छीन रही थी और कह रही थी कि जंतर-मंतर वाला वीडियो डिलीट करो, वरना मेरी गाड़ी में बैठो. यह खुलेआम किडनैपिंग की कोशिश थी. जब मैंने अपने कैमरामैन से रिकॉर्ड करने को कहा, तो कैमरे पर हाथ मारा गया."
नवीन का कहना है कि रुचि तिवारी और उनके साथ आए कुछ लोगों ने जानबूझकर माहौल खराब करने की कोशिश की, जैसा कि उन्होंने पहले भी भीम आर्मी के प्रदर्शन में किया था.
मीडिया का दोहरा चरित्र: जाति देख कर तय होती है 'पीड़िता'?
इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू भारतीय मीडिया का रवैया रहा है. घटना के बाद टीवी चैनलों ने प्रमुखता से सिर्फ रुचि तिवारी के उन विजुअल्स को चलाया जिसमें उन्हें बाहर निकाला जा रहा था. लेकिन इस बात की तस्दीक किसी ने नहीं की कि आखिर यह नौबत आई क्यों?
क्यों रुचि तिवारी द्वारा एक दलित पत्रकार का फोन छीनने का वीडियो प्राइम टाइम से गायब रहा? क्यों अंजलि को जमीन पर पटके जाने की घटना और उसके बाद थाने में उसे मिली रेप की धमकियों पर एंकर्स खामोश रहे? नवीन कुमार का पक्ष क्यों दबा दिया गया?
विश्लेषकों का मानना है कि न्यूज़ रूम्स में बैठे सवर्ण संपादकों और एंकर्स ने जानबूझकर एक तरफ़ा नरेटिव सेट किया ताकि बहुजन छात्रों के आंदोलन को बदनाम किया जा सके और एक विशेष विचारधारा की यूट्यूबर को 'वीरांगना' घोषित किया जा सके.
अंजलि ने अपने बयान के अंत में एक महत्वपूर्ण बात कही है- "बात अंजलि वर्सेस रुचि की नहीं है, बात राइट वर्सेस लेफ्ट की नहीं है. बात उनकी है जो समाज में बराबरी चाहते हैं बनाम वो जो दमन करना अपना अधिकार समझते हैं."
डीयू का यह विवाद सिर्फ एक झड़प नहीं है, बल्कि यह मीडिया के उस चेहरे को बेनकाब करता है जहाँ खबरें तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि जाति और विचारधारा के चश्मे से दिखाई जाती हैं. अगर मीडिया ने अंजलि और नवीन का पक्ष भी दिखाया होता, तो रुचि तिवारी के तथाकथित पीड़ित होने का भ्रम देश के सामने कब का टूट चुका होता.
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