
इंफाल: पश्चिमी इंफाल के पास पहाड़ियों की तलहटी में बसे गांवों में, युवाओं ने पिछले तीन साल रातों को जागकर बिताए हैं। लाठियों और मशालों के साथ अपनी बस्तियों के किनारे पहरा देना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि ज़रूरत बन चुका है। कुकी गांवों में 3 मई, 2023 को संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद ही रात की गश्त शुरू हो गई थी। वहीं, नगा-बहुल गांवों में इस हफ्ते लिटन में तनाव बढ़ने के बाद चौकसी और बढ़ा दी गई।
लेकिन इस तनावपूर्ण माहौल के बीच, असम राइफल्स के न्यू कीथेलमनबी गैरीसन में एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला। सुबह की पहरेदारी खत्म करने के बाद, कुछ युवा सीधे यहां पहुंचे। ये कोई और नहीं, बल्कि फुटबॉल खिलाड़ी थे। ‘ऑपरेशन सद्भावना’ के तहत असम राइफल्स द्वारा आयोजित 'फुटहिल्स फुटबॉल टूर्नामेंट' में हिस्सा लेने के लिए सोमवार से गुरुवार तक 13 टीमें (आठ नगा, तीन मैतेई और दो कुकी) गैरीसन के मैदान में इकट्ठा हुईं।
बफर ज़ोन के पार: 4 किलोमीटर का सफर
कीथेलमनबी उस जगह पर स्थित है जहां इंफाल घाटी पहाड़ियों से मिलती है। यह भूगोल अब बफर ज़ोन और कड़े पहरे वाले क्षेत्रों में बदल चुका है। टूर्नामेंट में टीमों के नाम उनके गांवों के नाम पर रखे गए थे। वैसे तो दूरी कम है, लेकिन यहां 4 किलोमीटर का सफर भी मीलों लंबा लगता है।
सबसे खास बात यह रही कि कुकी टीमें—जिनमें गुरुवार को फाइनल में पहुंचने वाली 'हाईबंग एफसी' भी शामिल थी—मई 2023 के बाद पहली बार असम राइफल्स की बसों में सुरक्षा गार्डों के साथ बफर ज़ोन पार करके यहां पहुंचीं।
इतिहास गवाह है कि फुटबॉल अक्सर समाज की गहरी दरारों का आईना रहा है। 1990 में डायनमो ज़गरेब और रेड स्टार बेलग्रेड के बीच हुआ संघर्ष यूगोस्लाविया के बिखरने का प्रतीक बना था। 1969 में अल सल्वाडोर और होंडुरास के बीच हुआ तथाकथित "फुटबॉल युद्ध" यह बताता है कि कैसे एक खेल पहले से सुलग रही आग को भड़का सकता है। उन मामलों में, फुटबॉल ने नफरत पैदा नहीं की, लेकिन उसे बढ़ाया जरूर था।
मगर कीथेलमनबी में, फुटबॉल को संयम और शांति का दूत बनने का काम सौंपा गया था।
सख्त नियम और खेल भावना
आयोजकों ने बेहद सावधानी के साथ इस टूर्नामेंट को अंजाम दिया। किक-ऑफ से पहले वरिष्ठ असम राइफल्स अधिकारियों ने टीमों को स्पष्ट कर दिया: खेल को खेल की भावना से खेलें। प्रतिद्वंद्वी को जानबूझकर चोट पहुंचाने की किसी भी कोशिश पर सीधा 'रेड कार्ड' मिलेगा और गंभीर अपराध पर पूरी टीम को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
पक्षपात के आरोपों से बचने के लिए पूर्वोत्तर के बाहर के सैनिकों को रेफरी बनाया गया। मैदान के चारों ओर सुरक्षाकर्मी तैनात थे। कमेंट्री बॉक्स से हिंदी में एक ही बात बार-बार दोहराई जा रही थी, खासकर तब जब मुकाबले में आक्रामकता बढ़ने लगती: "खेल की सद्भावना बनाए रखें। रेफरी के निर्णय का पालन करें।"
मैदान पर पिघलती दूरियां
बुधवार को सुबह 8 बजे पहले सेमीफाइनल में दो पूरी तरह से मैतेई टीमें—न्यू कीथेलमनबी टीम बी और केटीवाईडब्ल्यूए (KTYWA) कीनौ—आमने-सामने थीं। लेकिन दूसरे सेमीफाइनल का माहौल थोड़ा भारी था। यहां नगा टीम 'खोंगलोंग यूथ क्लब' का मुकाबला कुकी टीम 'हाईबंग एफसी' से था।
कुछ दिन पहले ही उखरूल जिले के लिटन में, जो यहां से लगभग 100 किमी दूर है, कुकी और नगा समुदायों के बीच हिंसा भड़क उठी थी। हालांकि खोंगलोंग गांव को कोई सीधा नुकसान नहीं पहुंचा था, लेकिन चिंता की लहर दौड़ गई थी। नगा युवाओं ने भी रात की गश्त शुरू कर दी थी। परिवारों को टीम को भेजने में हिचकिचाहट हो रही थी। खोंगलोंग के एक खिलाड़ी ने कहा, "लोग चिंतित थे, लेकिन अगर हम मिलना-जुलना बिल्कुल बंद कर देंगे, तो यह भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा।"
मैदान पर कोई कड़वाहट नहीं दिखी। हाईबंग ने एकतरफा मुकाबले में जीत हासिल की। मैच खत्म होने पर हाथ मिलाने की रस्म महज औपचारिकता नहीं, बल्कि सहज थी। इसने एक ऐसे फाइनल की नींव रखी जिसकी भविष्यवाणी बहुत कम लोगों ने की थी—3 मई, 2023 के बाद पहला 'कुकी-मैतेई' फुटबॉल मैच।
खिलाड़ियों की संघर्षपूर्ण दास्तान
हाईबंग एफसी का फाइनल में पहुंचना खेल से कहीं बढ़कर था। टीम की औसत उम्र मात्र 19 साल है। ट्रेनिंग के बजाय, इनमें से कई युवा रात में संतरी (पहरेदार) की भूमिका निभा रहे थे। एक खिलाड़ी ने कहा, "यह हमारी अपनी सुरक्षा के लिए है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम किसी दूसरे समुदाय से लड़ना चाहते हैं।"
टूर्नामेंट के दौरान उन्हें गश्त से छूट दी गई थी। एक अन्य खिलाड़ी ने धीमी आवाज़ में कहा, "उन दिनों हम ठीक से सो नहीं पाते, लेकिन यह हमारी जिम्मेदारी है।"
हाईबंग के कोच नगामगौलेन (30), जिन्हें प्यार से गोगो कहा जाता है, 28 अप्रैल, 2023 को दिल्ली से लौटे थे, जहां वे मणिपुर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। कुछ ही हफ्तों में उनके गांव पर पांच बार हमला हुआ। उनके चचेरे भाई निलसन कुकी का घर जलकर खाक हो गया। आवाजाही प्रतिबंधित हो गई। सबसे नज़दीकी हवाई अड्डे तक पहुँचने के लिए भी बफर ज़ोन पार करना पड़ता था। इंफाल के रास्ते बंद होने के कारण, निवासियों को आइजोल या दीमापुर के रास्ते यात्रा करनी पड़ी। गोगो गांव के मुखिया के छोटे भाई होने के नाते अपने लोगों का साथ देने के लिए वहीं रुक गए, जबकि उनका सामान अब भी दिल्ली में है।
टीम के डिफेंडर सेमिंथांग हाओकिप (20) अब एक राहत शिविर में रहते हैं, क्योंकि उनका गांव दो बार जलाया जा चुका है। वह प्रादेशिक सेना (Territorial Army) में अपने आवेदन के अगले चरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फुलबैक थांगखोपाओ सिंगसिट (21) सीडीएस (CDS) परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, जब जुलाई 2023 में उनके गांव पर हमला हुआ, जिसमें तीन ग्रामीणों की मौत हो गई और एक अभी भी लापता है।
गोलकीपर चोंगौमन किपजेन (21) अपने पिता के साथ एक निजी स्कूल चलाते थे, जिसमें मैतेई, कुकी, नगा और अन्य छोटी जनजातियों के शिक्षक कार्यरत थे। संघर्ष ने सह-अस्तित्व को असंभव बना दिया। मिडफील्डर थांगमिनसी किपजेन (19) अब कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन द्वारा संचालित क्षेत्र के एकमात्र सामुदायिक स्कूल में पढ़ाते हैं, क्योंकि अधिकांश योग्य शिक्षक राज्य छोड़ चुके हैं।
फाइनल मुकाबला: एक यादगार मैच
जब फाइनल शुरू हुआ, तो स्टैंड खचाखच भरे थे। ग्रामीणों को सेना के वाहनों में सशस्त्र सुरक्षा के बीच लाया गया था, जहां वे बुजुर्गों और स्थानीय लोगों के साथ शामिल हुए। असम राइफल्स के वरिष्ठ अधिकारी भी वहां मौजूद थे।
पहला हाफ बेहद रोमांचक रहा। न्यू कीथेलमनबी का दबदबा था और हाफ टाइम तक मैतेई टीम ने 3-0 की बढ़त बना ली थी। ब्रेक के बाद हाईबंग ने वापसी की कोशिश की और मैच दोबारा शुरू होते ही दो गोल दाग दिए। दूसरे हाफ के बीच में, एक टैकल को लेकर विरोध और हल्की धक्का-मुक्की हुई, लेकिन असम राइफल्स के जवानों ने तुरंत हस्तक्षेप किया। कमेंटेटर ने फिर याद दिलाया— "खेल की सद्भावना बनाए रखें।"
मैच 5-2 से न्यू कीथेलमनबी के पक्ष में समाप्त हुआ। पूरे मैच में पांच येलो कार्ड दिखाए गए।
खेल खत्म, फिर वही रात
अंतिम सीटी बजते ही, खिलाड़ियों ने बिना किसी हिचकिचाहट के एक कतार बनाई और एक-दूसरे से हाथ मिलाया। यह सब बहुत सामान्य और संक्षिप्त था। एक खिलाड़ी ने बाद में कहा, "हमने बस खेल खेला।"
सुरक्षाकर्मी तब तक वहीं डटे रहे जब तक टीमें वहां से निकल नहीं गईं। मैतेई टीम घाटी की ओर लौट गई। वहीं, हाईबंग एफसी के खिलाड़ी असम राइफल्स की बसों में सवार होकर, सशस्त्र सुरक्षा के साये में बफर ज़ोन पार कर वापस उन गांवों की ओर चले गए—जहां रात होते ही उनकी गश्त फिर शुरू होने वाली थी।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.