
नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर की भीषण गर्मी में डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाली महिलाओं की हालत भयावह होती जा रही है। 'हीटवॉच' की नई रिपोर्ट "जलते शहर में हमेशा तैयार" ने गिग इकॉनमी के उस स्याह सच को उजागर किया है, जो अब तक आम जनता और सरकार की नज़रों से ओझल था। यह रिपोर्ट गहराई से बताती है कि कैसे ऐप का एल्गोरिद्म, लगातार काम का दबाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी इन महिलाओं के स्वास्थ्य, आय और गरिमा पर भयंकर चोट कर रही है।
ब्यूटी सेवाओं, घरेलू काम और डिलीवरी जैसी ऐप-आधारित सेवाओं में लगी इन महिलाओं को अक्सर अपने स्वास्थ्य और आजीविका के बीच एक क्रूर चुनाव करना पड़ता है। सर्वेक्षण के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, 69 प्रतिशत कामगारों को गर्मी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण अपना काम रोकना या कम करना पड़ा। काम के दौरान 77 प्रतिशत ने थकान, 74 प्रतिशत ने सिरदर्द और 63 प्रतिशत ने चक्कर आने की शिकायत की है।
शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ भयंकर गर्मी ने इन महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह झकझोर दिया है। 51 प्रतिशत महिलाओं ने अत्यधिक गर्म दिनों में तनाव, चिंता और एकाग्रता में कमी जैसे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े गंभीर लक्षण झेले हैं। इस चिलचिलाती धूप में केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही ऐसी थीं, जिनके काम में कोई बदलाव नहीं आया।
आर्थिक मोर्चे पर भी इन कामगारों की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वेक्षण में शामिल 40 प्रतिशत महिलाओं की मासिक आय मात्र 10,000 से 20,000 रुपये के बीच है। ऐसे में गर्मी के कारण होने वाले अतिरिक्त खर्चों का बोझ उठाना उनके लिए असंभव हो जाता है। 40 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने छायादार विश्राम स्थल, पेयजल और स्वच्छ शौचालय तक पहुँच को अपनी सबसे तत्काल और बड़ी आवश्यकता बताया है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म का एल्गोरिद्म इन महिलाओं के लिए किसी चाबुक से कम नहीं है। बुकिंग रद्द होने पर आर्थिक दंड, खराब रेटिंग का डर और लगातार काम करने की अनकही शर्तें उन्हें बीमारी में भी काम करने को विवश करती हैं। एक ऐप-आधारित डिलीवरी कामगार के शब्दों में, ब्रेक लेना उनके हाथ में नहीं होता क्योंकि रेटिंग गिरने या इंसेंटिव छिन जाने का डर हमेशा सताता है।
इसी तरह एक घरेलू कामगार का दर्द है कि अत्यधिक गर्मी में शरीर बिल्कुल साथ नहीं देता और उन्हें कम बुकिंग लेनी पड़ती है। काम घटने से कमाई कम हो जाती है, लेकिन पानी, दवाइयों और यात्रा का खर्च बढ़ जाता है, जबकि घर का खर्च जस का तस बना रहता है। ऐसी परिस्थितियों में कार्य-घंटों के चुनाव की कथित स्वतंत्रता केवल एक छलावा साबित होती है।
इस अमानवीय स्थिति पर रिपोर्ट की लेखिका अनन्या तिवारी कहती हैं कि घर बैठे तुरंत मिलने वाली ब्यूटी सेवाओं के पीछे इन महिलाओं की भारी शारीरिक और मानसिक मेहनत छिपी है। हीटवॉच फ़ाउंडेशन की संस्थापक अपेक्षिता वार्ष्णेय ने भी जोर देकर कहा कि इस समस्या का समाधान संभव है। यदि कामगारों को दंड के भय के बिना सवेतन विश्राम मिले और नीतियां महिलाओं की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनें, तो बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
नई दिल्ली में इस रिपोर्ट के विमोचन के दौरान 'अंडर 51 डिग्रीज़: वीमेन हू डिलिवर, केयर एंड बिल्ड' नामक लघु वृत्तचित्र भी दिखाया गया। तुलिका बंसल द्वारा निर्मित यह फिल्म इन महिलाओं के तपते संघर्ष को पर्दे पर लाती है। हालात सुधारने के लिए रिपोर्ट में स्पष्ट मांग की गई है कि राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय हीट एक्शन योजनाओं में अत्यधिक गर्मी को व्यावसायिक स्वास्थ्य और श्रम-अधिकार का मुद्दा माना जाए।
रिपोर्ट प्लेटफॉर्म कंपनियों और जन-स्वास्थ्य एजेंसियों से समन्वित कार्रवाई का आह्वान करती है। इसके तहत हीटवेव के दौरान अनिवार्य प्रोटोकॉल बनाने, सवेतन विश्राम देने और उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में कूलिंग सेंटर व स्वच्छ शौचालय बनाने की मांग की गई है। रिपोर्ट कड़े शब्दों में चेतावनी देती है कि कामगारों की सुरक्षा केवल पानी साथ रखने जैसे व्यक्तिगत उपायों पर नहीं छोड़ी जा सकती, बल्कि ऐसी नीतियां बनानी होंगी ताकि रोजी-रोटी कमाने के लिए किसी भी महिला को अपनी जान दांव पर न लगानी पड़े।
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