बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: पति की मृत्यु के बाद संपत्ति से मिलता रहेगा गुजारा भत्ता, लेकिन रकम बढ़ाने की मांग होगी नामंजूर

बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम आदेश: जानिए पति के निधन के बाद संपत्ति से मिलने वाले भरण-पोषण पर क्या हैं महिलाओं के कानूनी अधिकार और शर्तें।
बॉम्बे हाई कोर्ट
बॉम्बे हाई कोर्टA. Savin
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नई दिल्ली: बॉम्बे हाई कोर्ट ने 15 जून को गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) के नियमों को स्पष्ट करते हुए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि कोई विधवा अपने दिवंगत पति की संपत्ति से पहले से तय गुजारा भत्ता प्राप्त करना जारी रख सकती है। हालांकि, वह उस संपत्ति या कानूनी उत्तराधिकारियों से इस भत्ते की राशि को बढ़ाने की मांग नहीं कर सकती।

अदालत ने अपने फैसले में एक स्थापित अधिकार को जारी रखने और एक नई देनदारी तय करने के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर को समझाया है। यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने एक विधवा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

याचिकाकर्ता महिला ने अपने पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति से हर महीने गुजारा भत्ता जारी रखने की गुहार लगाई थी। महिला के पति का निधन साल 2012 में हो गया था। इससे काफी पहले, साल 1999 में बांद्रा फैमिली कोर्ट ने पति को निर्देश दिया था कि वह अपनी पत्नी को 6,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करे।

इस दंपती की कोई संतान नहीं थी। ऐसे में पति के निधन के बाद उसकी सारी संपत्ति उसके भाई-बहनों के नाम हो गई। संपत्ति के इन नए मालिकों यानी कानूनी उत्तराधिकारियों ने विधवा के गुजारा भत्ता पाने के दावे का कड़ा विरोध किया था।

इस मामले में सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की मृत्यु के बाद गुजारा भत्ते का आदेश अपने आप खत्म नहीं होता है। बकाया राशि और आगे के नियमित भुगतान के लिए पति की संपत्ति या उसके कानूनी उत्तराधिकारी पूरी तरह से जिम्मेदार बने रहते हैं।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि संपत्ति पर कोई प्रभार (चार्ज) बनाया गया हो या नहीं, गुजारा भत्ते का आदेश पति की संपत्ति के खिलाफ हर हाल में लागू किया जा सकता है। मृत्यु के बाद भी यह फैसला मान्य रहता है और पत्नी अपने बकाये की वसूली के लिए संपत्ति के खिलाफ कानूनी कदम उठा सकती है।

अदालत के अनुसार, पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार एक व्यक्तिगत और निहित अधिकार है। पति के जीवित रहते हुए पत्नी का भरण-पोषण करना उसकी निजी जिम्मेदारी होती है। वहीं, उसके निधन के बाद यह जिम्मेदारी उन कानूनी उत्तराधिकारियों के पास चली जाती है जिनके हाथों में वह संपत्ति होती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार केवल पत्नी तक सीमित है और उसकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है, इसे किसी और व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

गुजारा भत्ते की रकम बढ़ाने के मुद्दे पर अदालत ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 37 का विशेष रूप से हवाला दिया। हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के समान ही, यह धारा परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर एक नई न्यायिक समीक्षा की अनुमति देती है।

अदालत ने कहा कि जब पति जीवित ही नहीं है, तो भुगतान करने की उसकी क्षमता का आकलन करना असंभव है जो कि इस न्यायिक प्रक्रिया का सबसे मुख्य हिस्सा होता है। जजों ने तर्क दिया कि कानूनी उत्तराधिकारियों के खिलाफ भत्ते की रकम बढ़ाने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि पूर्व पत्नी का भरण-पोषण करना उनका कोई व्यक्तिगत कर्तव्य नहीं है।

खंडपीठ ने कहा कि अगर भत्ते की राशि बढ़ाने की अनुमति दी जाती है तो यह स्थिति बेतुकी और अनिश्चितता से भरी होगी। अगर उत्तराधिकारियों की अपनी मेहनत और प्रयासों से संपत्ति का मूल्य बढ़ता है, तो उस आधार पर पत्नी का भत्ता बढ़ाना उनके साथ सीधे तौर पर अन्याय होगा।

इस तरह के दावों को मंजूरी देने से उत्तराधिकारी कभी अपनी विरासत में मिली संपत्ति का खुलकर इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। साथ ही वह संपत्ति हमेशा के लिए कानूनी विवादों और मुकदमों में उलझी रहेगी।

इन सभी ठोस तर्कों के साथ खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए इस याचिका का निपटारा कर दिया। अदालत ने अंतिम तौर पर साफ किया कि संपत्ति से पहले से तय भत्ता पाना पत्नी का कानूनी अधिकार है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम की धारा 37 के तहत कानूनी उत्तराधिकारियों से इस रकम को बढ़ाने की मांग कतई स्वीकार नहीं की जा सकती।

इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दीपा चव्हाण को न्याय मित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया गया था। वहीं, पति के भाई-बहनों का अदालत में प्रतिनिधित्व अधिवक्ता डॉ. प्रदीप चव्हाण और श्वेता बोऱ्हाडे ने किया।

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