
पश्चिम चंपारण: आज के दौर में जब देश भर के थानों और अदालतों में दहेज प्रताड़ना की फाइलें भरी पड़ी हैं, बिहार के पश्चिम चंपारण का एक इलाका समाज के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरा है। यह कहानी है बगहा पुलिस जिले के गोबरहिया थाना क्षेत्र की, जहां दर्जनों गांवों ने मिलकर एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था कायम की है कि पिछले कई सालों में यहाँ दहेज की मांग या इससे जुड़े उत्पीड़न का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है।
दहेज का यह अभाव कोई सरकारी आंकड़ों का संयोग नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा 'सामाजिक ताना-बाना' (Social Design) है, जिसे यहाँ के थारू समुदाय ने बड़ी शिद्दत से बुना है।
दहेज लेना पाप, दोषी का होता है हुक्का-पानी बंद
भारतीय थारू कल्याण महासंघ के सचिव और नौरंगिया दून के 'गुमस्ता' (सामाजिक प्रधान), महेंद्र महतो इस बदलाव का श्रेय अपनी संस्कृति के प्रति समुदाय की निष्ठा को देते हैं। TOI के हवाले से वह कहते हैं, "हमारे समाज के लिए अपनी संस्कृति को बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। हमारे यहाँ शादी में दहेज लेना पाप माना जाता है।"
महतो बताते हैं कि उनकी न्याय व्यवस्था बेहद सख्त है। अगर किसी परिवार पर दहेज के लेन-देन का आरोप लगता है, तो तत्काल एक बैठक बुलाई जाती है। 'गुमस्ता' की अध्यक्षता में पंचायत होती है और मामले की जांच की जाती है। यदि कोई दोषी पाया जाता है, तो उस पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाने से लेकर सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) तक की सजा सुनाई जाती है। असल में, थारू समुदाय ने अपने नैतिक ढांचे के भीतर ही दहेज को 'अपराध' घोषित कर दिया है, जहाँ सामाजिक डर पुलिस के डंडे से ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।
पुलिस भी करती है सलाम
इस सामाजिक पहल की तारीफ खुद पुलिस प्रशासन भी करता है। बगहा के एसपी रामानंद कौशल बताते हैं कि गोबरहिया थाने के अंतर्गत करीब 20 से 22 थारू गांव आते हैं। हैरानी और खुशी की बात यह है कि पिछले एक दशक में यहाँ महिलाओं के उत्पीड़न या दहेज का एक भी मामला सामने नहीं आया है।
एसपी कौशल ने इस समुदाय को बेहद शांतिप्रिय और सामाजिक रूप से जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि यहाँ घरेलू विवाद भी थाने तक नहीं पहुंचते, बल्कि 'गुमस्ता' की मौजूदगी में आपसी सहमति से ही सुलझा लिए जाते हैं।
सौदा नहीं, संस्कार है शादी: 5 या 11 रुपये का शगुन
थारू समुदाय के लिए विवाह कोई व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि एक पवित्र बंधन है। थारू कल्याण बौद्धिक विचार मंच के अध्यक्ष शारदा प्रसाद कहते हैं, "विवाह ईश्वर द्वारा तय किया गया मिलन है, जहाँ दूल्हा और दुल्हन दोनों को पूजा जाता है।"
परंपरा के अनुसार, यहाँ लड़के के अभिभावक खुद रिश्ता लेकर लड़की के घर जाते हैं। जब रिश्ता पक्का हो जाता है, तो शगुन के तौर पर लड़के या लड़की के हाथ में मात्र 5 या 11 रुपये रखे जाते हैं। यह राशि प्रतीकात्मक है, जो बताती है कि रिश्ता पैसों से नहीं, प्रेम से जुड़ा है।
मिसाल हैं ये शादियां
समाज में हो रहे इस बदलाव के कई जीते-जागते उदाहरण हैं। हरनाटांड के डॉक्टर कृष्णमोहन राय की बेटी अचला राय, जो खुद एक एमबीबीएस (MBBS) हैं, की शादी बेलहवा गांव के सेल्स टैक्स ऑफिसर अश्विनी कुमार से हुई। इस हाई-प्रोफाइल शादी में दहेज का एक पैसा भी नहीं लिया गया। इसी तरह, मिश्रौली गांव के असिस्टेंट प्रोफेसर महेंद्र चौधरी ने भी बिना किसी दहेज के कठैया गांव में विवाह किया।
3 लाख की आबादी, 500 शादियां, पर नियम एक
पश्चिम चंपारण में थारू आबादी मुख्य रूप से छह राजस्व गांवों—राजपुर, चौपारण, चैगवान, जमहौली, दून और रामगिर बारह गवां—में बसी है। यहाँ की अनुमानित जनसंख्या करीब तीन लाख है और हर साल समुदाय में 500 से अधिक शादियां होती हैं। नियम हर जगह एक ही है: न दूल्हे का परिवार दहेज मांगता है और न ही दुल्हन का परिवार इसकी पेशकश करता है।
स्थानीय निवासी कुसुमी देवी बताती हैं कि "दहेज पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन अपनी खुशी और सामर्थ्य के अनुसार कोई उपहार देना चाहे तो दे सकता है। शादी का खर्च भी अक्सर रिश्तेदार मिलकर उठाते हैं। शादी के बाद हम अपनी बहू को बेटी की तरह ही रखते हैं।"
डॉक्टर-इंजीनियर बनने के बाद भी नहीं भूली परंपरा
नौरंगिया गांव के महेश्वर काजी एक और अहम पहलू की ओर इशारा करते हैं। भारत-नेपाल सीमा पर बसे थारू परिवारों में अब शिक्षा का स्तर काफी ऊंचा हो गया है। यहाँ के बच्चे अब डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और बैंकर बन रहे हैं।
काजी गर्व से कहते हैं, "शिक्षा, खान-पान और जीवनशैली में बदलाव के बावजूद हमने अपनी परंपराओं को सहेज कर रखा है और खुद को दहेज प्रथा से अछूता रखा है।"
जहाँ देश भर में कड़े कानूनों के बावजूद दहेज प्रथा जारी है, वहीं थारू समुदाय का यह अनुभव बताता है कि असली बदलाव कानून से नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प से आता है।
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