इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: किसी एक धर्म को 'एकमात्र सच्चा धर्म' बताना धर्मनिरपेक्ष भारत में गलत

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: धर्मनिरपेक्ष देश में किसी एक धर्म को 'एकमात्र सच्चा' बताना अन्य धर्मों का अपमान है, यह IPC की धारा 295A के तहत दंडनीय अपराध है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्टफोटो साभार- इंटरनेट
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उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी भी व्यक्ति का यह दावा करना गलत है कि उसका धर्म ही 'एकमात्र सच्चा धर्म' है।

अदालत के अनुसार, इस तरह के दावे का सीधा मतलब अन्य धर्मों को नीचा दिखाना या उनका अपमान करना है। यह कृत्य भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295ए के तहत एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने 18 मार्च को यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। इसी के साथ अदालत ने रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की गुहार लगाई थी।

फादर परेरा पर आईपीसी की धारा 295ए के तहत आरोप लगाए गए हैं। यह कानूनी धारा किसी भी वर्ग के धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने से जुड़ी है।

दर्ज की गई एफआईआर के मुताबिक, याचिकाकर्ता पर आरोप है कि वह अक्सर प्रार्थना सभाओं का आयोजन करते थे। इन सभाओं में कथित तौर पर बार-बार यह दावा किया जाता था कि केवल ईसाई धर्म ही एकमात्र धर्म है।

पुलिस शिकायत में कहा गया है कि उनके इन बयानों से एक विशेष धर्म की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है।

इस मामले की जांच के दौरान जांच अधिकारी (आईओ) ने पाया था कि इलाके में कोई अवैध धर्मांतरण नहीं हुआ है। हालांकि, दूसरे धर्मों की आलोचना करने के गंभीर आरोपों को देखते हुए पुलिस ने अपनी चार्जशीट दाखिल करने का फैसला किया।

सुनवाई के दौरान फादर विंसेंट के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल को इस मामले में पूरी तरह से झूठा फंसाया गया है। उनका मुख्य तर्क यह था कि एफआईआर में लिखी बातों के आधार पर धारा 295ए के तहत कोई भी अपराध नहीं बनता है।

बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह भी दावा किया कि मजिस्ट्रेट ने बिना किसी न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए ही पुलिस की चार्जशीट पर संज्ञान ले लिया था।

वहीं दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता की बातों में तथ्यों को लेकर विवाद है और इसके लिए सबूतों की अदालत में उचित जांच होना बेहद जरूरी है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस श्रीवास्तव ने इस बात पर जोर दिया कि भारत एक ऐसा देश है जहां संविधान के तहत सभी आस्थाओं और मान्यताओं के लोग एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में एक साथ मिलजुल कर रहते हैं।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यही कारण है कि किसी भी धर्म के लिए यह दावा करना बिल्कुल गलत है कि केवल वही सच्चा धर्म है, क्योंकि ऐसा कहने से स्वाभाविक रूप से अन्य आस्थाओं का अपमान होता है।

अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि धारा 295ए की शुरुआती पंक्तियां विशेष रूप से नागरिकों के किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के 'जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण' इरादों से संबंधित हैं।

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का कृत्य पूरी तरह से आईपीसी की धारा 295-ए के दायरे में आता है। ऐसे में इस शुरुआती स्तर पर यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है।

अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि संज्ञान लेने के स्तर पर मजिस्ट्रेट को केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर अपनी प्रथम दृष्टया राय दर्ज करनी होती है। उस स्तर पर किसी भी तरह का 'मिनी ट्रायल' आयोजित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

कोर्ट ने अपनी बात समाप्त करते हुए स्पष्ट किया कि संज्ञान लेते समय अदालत का मुख्य काम केवल यह देखना है कि क्या प्रथम दृष्टया कोई मामला मौजूद है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अदालत को केवल यह जाँचना होता है कि क्या अपराध होने के पर्याप्त सबूत हैं, न कि उस वक्त मामले के गुण-दोष या सबूतों की गहराई में जाना होता है।

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