सुप्रीम कोर्ट सख्त: दहेज हत्या के आरोपियों को आसानी से न दें जमानत, पटना हाईकोर्ट का फैसला किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द, कहा- दहेज हत्या समाज पर बड़ा कलंक, जमानत देने में न अपनाएं यांत्रिक रवैया।
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देश भर के उच्च न्यायालयों को हिदायत दी है कि दहेज हत्या के मामलों में आरोपियों को जमानत देते समय अत्यधिक सावधानी बरती जाए। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि दहेज रूपी यह सामाजिक बुराई आज भी हजारों महिलाओं की जान ले रही है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय विश्नोई की पीठ ने पटना हाईकोर्ट के ऐसे ही एक जमानत आदेश को रद्द कर दिया। इस मामले में शादी के महज डेढ़ साल के भीतर ही पत्नी की हत्या कर दी गई थी और इसका कथित कारण दहेज की मांग पूरी न होना था। सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज हत्या के मामलों में हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने के 'यांत्रिक दृष्टिकोण' पर गहरी चिंता व्यक्त की।

इस मामले में बिहार सरकार की ओर से वकील समीर अली खान और मृतका की मां की तरफ से वकील रजनीश कुमार पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि पटना हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देकर बड़ी गलती की है, क्योंकि वह केवल डेढ़ साल से ही हिरासत में था। वकीलों ने बताया कि इतने जघन्य अपराध के आरोपी को राहत देने के लिए हाईकोर्ट ने कोई विशेष कारण भी नहीं बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को 'पूरी तरह से अस्थिर' करार दिया। अदालत ने कहा कि दहेज हत्या जैसे बेहद गंभीर अपराध में उच्च न्यायालय को अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए था।

पीठ ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने मामले के कई अहम पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया। इनमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका के शरीर पर पाई गई कई चोटें और 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' की धारा 114 के तहत अपराध के अनुमान जैसे महत्वपूर्ण तथ्य शामिल थे।

अदालतों में दहेज उत्पीड़न, महिलाओं की हत्या या आत्महत्या के अनगिनत मामले सुनने के बाद जजों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि दहेज हत्या वास्तव में एक गहरा कलंक है और एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है, जो मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा का घोर उल्लंघन करती है।

पीठ ने आगे कहा कि तमाम कानूनी पाबंदियों के बावजूद इस कुप्रथा के कारण हजारों महिलाओं की अप्राकृतिक मौत हो रही है। दूल्हे के परिवार की लालच भरी मांगों के कारण अक्सर या तो उनकी हत्या कर दी जाती है या फिर उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया जाता है। कोर्ट ने इसे समाज पर एक बड़ा धब्बा बताया।

सुनवाई के दौरान आरोपी पति के वकील संतोष कुमार मिश्रा ने दावा किया कि मृतका मानसिक रूप से अस्वस्थ थी और उसने एक इमारत की छठी मंजिल से कूदकर आत्महत्या की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी को अपना यह दावा ट्रायल के दौरान साबित करना होगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि इस मामले का ट्रायल अभी चल रहा है, इसलिए हाईकोर्ट को जमानत याचिका खारिज कर देनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को एक सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है।

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