
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की है। महिला के बयानों में बलात्कार के स्पष्ट आरोप होने के बावजूद पुलिस द्वारा संबंधित धाराएं न लगाने पर अदालत ने इसे एक बहुत बड़ी और गंभीर लापरवाही माना है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने यूपी के डीजीपी, प्रमुख सचिव (गृह) और बरेली के एसएसपी को तलब किया है।
अदालत ने इन आला अधिकारियों से एफआईआर दर्ज करने में हुई इस भारी चूक पर स्पष्टीकरण देने और सुधारात्मक कदम उठाने की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
यह सख्त आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए पारित किया गया है। जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की पीठ ने डीजीपी और प्रमुख सचिव (गृह) को पुलिस अधिकारियों को ऐसे मामलों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए एक उचित तंत्र विकसित करने का भी निर्देश दिया।
इसके साथ ही, अदालत ने बरेली के एसएसपी को इस घोर लापरवाही के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
यह पूरा मामला बरेली के रहने वाले शिवम सिंह द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने 17 अप्रैल 2024 की चार्जशीट और बरेली के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 15 जनवरी 2025 को पारित किए गए संज्ञान आदेश को रद्द करने की उच्च न्यायालय से मांग की थी।
पुलिस ने इस मामले में शुरुआत में आईपीसी की धारा 498-ए (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला के साथ क्रूरता) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत केस दर्ज किया था।
अदालत में कार्यवाही के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि दर्ज की गई एफआईआर में धारा 498-ए या 506 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। उनका तर्क था कि दोनों पक्षों के बीच कोई वैध विवाह हुआ ही नहीं था, इसलिए लगाए गए आरोप पूरी तरह से अस्पष्ट और निराधार हैं। वहीं, राज्य सरकार की तरफ से पेश वकील ने इस दलील का कड़ा विरोध किया।
सरकार का स्पष्ट कहना था कि आरोपी ने शादी और सरकारी नौकरी का झूठा झांसा देकर शिकायतकर्ता के साथ शारीरिक संबंध बनाए थे।
दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनने के बाद, अदालत ने पाया कि एफआईआर और पीड़िता के बयान प्रथम दृष्टया बलात्कार के आरोपों की तरफ साफ इशारा करते हैं। इसके बावजूद पुलिस ने बलात्कार की कोई धारा नहीं लगाई, जिसे कोर्ट ने पुलिस की एक बहुत बड़ी और गंभीर चूक करार दिया। अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर हैरानी जताते हुए लिखित शिकायत और दर्ज की गई एफआईआर के बीच के भारी अंतर को भी अपने रिकॉर्ड में लिया।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जहां लिखित शिकायत में बलात्कार का साफ जिक्र था, वहीं पुलिस की एफआईआर में इसे पूरी तरह गायब कर दिया गया। इस तथ्य ने पूरी पुलिस जांच की निष्पक्षता और नीयत पर ही गंभीर संदेह पैदा कर दिया है।
इस संदर्भ में उच्च न्यायालय ने 'रमेश कुमारी बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली)' मामले के ऐतिहासिक फैसले का प्रमुखता से हवाला दिया। अदालत ने इस फैसले के सिद्धांतों को दोहराते हुए यह स्पष्ट किया कि संज्ञेय अपराधों के मामलों में एफआईआर दर्ज करना पुलिस के लिए अनिवार्य है और इसमें किसी भी तरह की कोताही या मनमानी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
अपने कड़े रुख को बरकरार रखते हुए, हाईकोर्ट ने 17 मार्च को पारित अपने आदेश में इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख भी मुकर्रर कर दी है। अदालत ने इस मामले को 27 अप्रैल से शुरू होने वाले सप्ताह में सूचीबद्ध किया है।
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