41 साल से जमीन के लिए तरसता रहा बुजुर्ग: KDA की मनमानी पर भड़का हाईकोर्ट, 'लापरवाह अफसरों की जेब से वसूलें हर्जाना'

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी सरकार को सख्त निर्देश: 41 साल से प्लॉट का कब्जा न देने वाले कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) के लापरवाह अधिकारियों से वसूलें भारी हर्जाना।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) के अधिकारियों की कथित लापरवाही पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से इस मामले में जांच के आदेश देने की अपील की है।

यह पूरा मामला आवंटित जमीन का कब्जा देने में 41 साल की लंबी देरी से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस अकारण देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से ही नुकसान की भरपाई की जाए।

अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सिस्टम की खामियों पर गंभीर चिंता जताई। यह मामला एक 90 वर्षीय वादी से जुड़ा है, जिन्हें साल 1984 में 999 साल की लीज मिली थी। हालांकि, बार-बार गुहार लगाने के बावजूद उन्हें आज तक अपनी जमीन का कब्जा नहीं मिल सका है।

लीज धारक बी. एन. त्रिपाठी द्वारा दायर प्रथम अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस संदीप जैन ने एक बेहद तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अब केवल भगवान ही जानता है कि उन्हें अपनी जमीन का कब्जा कब मिल पाएगा।

अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि इस मामले की दूसरी वादी युगरानी देवी का 13 सितंबर 2011 को ही निधन हो चुका है। वहीं, मुख्य वादी त्रिपाठी अब जीवन के नौवें दशक में पहुंच चुके हैं।

राज्य सरकार को जवाबदेह ठहराते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केडीए एक वैधानिक निकाय है। ऐसे में प्राधिकरण के मनमाने और गैरकानूनी कार्यों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार भी परोक्ष रूप से जिम्मेदार है।

अदालत ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लेने का आग्रह किया है। कोर्ट ने कहा कि लापरवाह अधिकारियों से हर्जाना वसूला जाना चाहिए क्योंकि उनके इस अनुचित, मनमाने और सनक भरे रवैये ने राज्य की छवि को धूमिल किया है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्य सरकार को केडीए अधिकारियों के खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। उनके गैरकानूनी कार्यों ने न केवल जनता को परेशान किया है, बल्कि सार्वजनिक रूप से राज्य और इसकी कार्यप्रणाली की साख को भी नुकसान पहुंचाया है।

केस के रिकॉर्ड के अनुसार, वादियों को साल 1984 में केडीए द्वारा 2,222 वर्ग गज का एक प्लॉट आवंटित किया गया था। इसके बाद प्राधिकरण ने 15 प्रतिशत वार्षिक शुल्क की मांग की, जिसके खिलाफ वादियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और अपने पक्ष में डिक्री प्राप्त की।

अदालत से राहत मिलने के बाद भी केडीए ने कभी जमीन का कब्जा नहीं सौंपा। साल 1985 से लगातार किए जा रहे निवेदनों का भी कोई असर नहीं हुआ। थक-हारकर वादियों ने साल 2005 में प्राधिकरण को एक कानूनी नोटिस भेजा और कब्जा, हर्जाना तथा बिल्डिंग प्लान की मंजूरी के लिए एक और मुकदमा दायर कर दिया।

पीड़ितों का दावा था कि यह प्लॉट एक फैक्ट्री स्थापित करने के लिए खरीदा गया था, जिसके लिए उन्होंने पंजीकरण भी प्राप्त कर लिया था। लेकिन इस लंबी और अनुचित देरी के कारण उन्हें 41 लाख रुपये से अधिक का भारी नुकसान उठाना पड़ा।

अपने 9 अप्रैल 2026 के फैसले में अदालत ने उल्लेख किया कि 1985 से लेकर मुकदमा दायर करने तक, वादियों ने जमीन के कब्जे के लिए केडीए को कई बार पत्र लिखे। उन्होंने सभी जरूरी दस्तावेज भी पेश किए, लेकिन प्राधिकरण की ओर से उन्हें कोई जवाब या कारण नहीं बताया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि वादी उस नुकसान की भरपाई के पूरी तरह हकदार हैं जो उन्हें फैक्ट्री शुरू न कर पाने के कारण झेलना पड़ा है।

अदालत ने 1 जुलाई 1987 से लेकर कब्जा सौंपे जाने तक वादियों को 13,700 रुपये प्रति माह का हर्जाना देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, लंबित मुकदमे की अवधि (पेंडेंटे लाइट) और भविष्य के लिए 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी दिया जाएगा।

इसके अलावा, फैक्ट्री स्थापित करने में हुए शुरुआती खर्च के मद में कोर्ट ने 5 लाख रुपये मंजूर किए हैं, जिस पर 5 प्रतिशत का ब्याज देय होगा। वहीं, इतने सालों के उत्पीड़न और मानसिक संताप के लिए 2 लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया है।

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