एमपी में पेंशन पर बढ़ा विवाद! हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा लाड़ली बहनों को 1500 रुपये तो दिव्यांग-वृद्ध को सिर्फ 600 क्यों?

महंगाई के दौर में 55 लाख हितग्राही प्रभावित, वित्त विभाग की मंजूरी न मिलने से अटका निर्णय; अन्य राज्यों से तुलना में एमपी काफी पीछे
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट.
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भोपाल। मध्य प्रदेश में बढ़ती महंगाई के बीच सामाजिक सुरक्षा पेंशन की कम राशि अब बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। प्रदेश के लाखों बुजुर्ग, दिव्यांग और विधवा महिलाएं आज भी महज 600 रुपये प्रतिमाह की पेंशन पर निर्भर हैं, जो वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद अपर्याप्त मानी जा रही है। राज्य सरकार जहां एक ओर विभिन्न योजनाओं में आर्थिक सहायता बढ़ाने और महंगाई के अनुसार भत्तों में वृद्धि करने की बात कर रही है, वहीं सामाजिक सुरक्षा पेंशन में बढ़ोतरी का प्रस्ताव लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है। इस स्थिति ने सरकार की प्राथमिकताओं और नीतिगत संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसी मुद्दे को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब राज्य सरकार “लाड़ली बहना योजना” के तहत महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह दे रही है, तो दिव्यांगजनों और अन्य सामाजिक सुरक्षा पेंशन हितग्राहियों को केवल 600 रुपये ही क्यों दिए जा रहे हैं। अदालत ने इस असमानता को गंभीर मानते हुए सरकार से जवाब तलब किया है। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है, और अब सभी की नजर सरकार के जवाब पर टिकी हुई है।

वित्त विभाग ने नहीं दी मंजूरी!

दरअसल, सामाजिक न्याय एवं निशक्तजन संचालनालय ने करीब एक वर्ष पहले सामाजिक सुरक्षा पेंशन को बढ़ाकर 1500 रुपये प्रतिमाह करने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा था। इस प्रस्ताव का उद्देश्य महंगाई के अनुरूप पेंशन राशि को यथार्थवादी बनाना और कमजोर वर्गों को राहत देना था। हालांकि, यह प्रस्ताव अब तक मध्य प्रदेश वित्त विभाग की मंजूरी नहीं मिलने के कारण लंबित पड़ा हुआ है। वित्त विभाग द्वारा अतिरिक्त वित्तीय भार का हवाला दिए जाने के कारण इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है, जिससे लाखों हितग्राही आज भी पुराने और अपर्याप्त पेंशन ढांचे में फंसे हुए हैं।

यदि वित्तीय पहलू पर नजर डालें तो प्रदेश में वर्तमान में लगभग 55 लाख हितग्राही सामाजिक सुरक्षा पेंशन का लाभ ले रहे हैं। राज्य सरकार इस योजना पर हर महीने करीब 330 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जो सालाना लगभग 4000 करोड़ रुपये बैठता है। यदि पेंशन राशि को 600 रुपये से बढ़ाकर 1500 रुपये किया जाता है, तो राज्य सरकार पर करीब 6000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वार्षिक भार पड़ेगा। यही कारण है कि वित्त विभाग इस प्रस्ताव पर सतर्क रुख अपनाए हुए है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह खर्च सामाजिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा के लिहाज से आवश्यक निवेश है, न कि केवल वित्तीय बोझ।

अन्य राज्यों की स्थिति बेहतर

प्रदेश की स्थिति को यदि अन्य राज्यों से तुलना करके देखा जाए, तो मध्य प्रदेश काफी पीछे नजर आता है। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य ने दिव्यांगजनों की पेंशन को 1700 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये तक कर दिया है, जबकि हरियाणा में यह राशि करीब 3200 रुपये प्रतिमाह है। राजस्थान में सामाजिक सुरक्षा पेंशन 1000 से 1250 रुपये के बीच दी जा रही है। महाराष्ट्र में इंदिरा गांधी विधवा पेंशन योजना के तहत 1500 रुपये प्रतिमाह दिए जा रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में भी 1000 रुपये प्रतिमाह की व्यवस्था है। छत्तीसगढ़, जहां अभी 500 रुपये पेंशन मिलती है, वहां भी इसे बढ़ाकर 1500 रुपये करने की घोषणा की जा चुकी है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश इस मामले में कई राज्यों से काफी पीछे है।

सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के अंतर्गत आने वाले लाभार्थियों में मुख्य रूप से बुजुर्ग, दिव्यांगजन और विधवा महिलाएं शामिल हैं। ये वे वर्ग हैं, जिनकी आय के साधन बेहद सीमित या लगभग समाप्त हो चुके होते हैं। ऐसे में 600 रुपये की मासिक पेंशन उनके जीवनयापन के लिए नाकाफी साबित हो रही है। महंगाई के इस दौर में दवाइयों, भोजन, किराए और अन्य आवश्यक खर्चों को देखते हुए यह राशि प्रतीकात्मक मात्र रह गई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि यह न केवल आर्थिक बल्कि मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नीतियों में विरोधाभास उजागर!

इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य सरकार की नीतियों में एक प्रकार के विरोधाभास को भी उजागर किया है। एक ओर सरकार नई योजनाओं में उदारता दिखाते हुए बड़ी राशि वितरित कर रही है, वहीं पहले से चल रही सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सुधार की गति बेहद धीमी है। हाई कोर्ट की सख्ती के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या वित्त विभाग इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है या नहीं।

फिलहाल, प्रदेश के लाखों हितग्राही 600 रुपये की सीमित पेंशन के सहारे अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। आने वाले समय में अदालत की सुनवाई और सरकार के निर्णय से यह तय होगा कि उन्हें राहत मिलती है या यह मुद्दा और लंबा खिंचता

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