
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक पत्रकार पर लगाए गए एससी/एसटी एक्ट के आरोपों को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल यह जानना कि कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से है और उसे महज गाली देना, इस अधिनियम के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।
यह सुनवाई मऊ जिले के पत्रकार संजीव राय द्वारा दायर एक अपील पर की जा रही थी। उनके खिलाफ पिछले साल 26 फरवरी को मोहम्मदाबाद सर्कल के तत्कालीन डिप्टी एसपी अजय विक्रम सिंह ने मामला दर्ज कराया था। अजय विक्रम सिंह वर्तमान में आजमगढ़ में मुख्य हवाईअड्डा सुरक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने 2 अप्रैल को दिए अपने आदेश में मामले की कानूनी स्थिति को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि धारा 3(1)(एस) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि आरोपी ने सार्वजनिक स्थान पर पीड़ित को उसकी जाति के नाम पर अपमानित किया हो। आरोपों से यह साफ झलकना चाहिए कि गालियों के साथ जानबूझकर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।
अदालत ने इस मौजूदा मामले का जिक्र करते हुए कहा कि एफआईआर या जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों में ऐसा कोई भी तथ्य सामने नहीं आया जो यह साबित करे कि आरोपी का इरादा शिकायतकर्ता को उसकी जाति के आधार पर नीचा दिखाना था। बिना किसी जातिगत मंशा के महज गाली-गलौज या हाथापाई होना एससी/एसटी एक्ट की कठोर धाराओं को लागू करने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता।
फैसले में आगे टिप्पणी की गई कि इस मामले में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध के आवश्यक तत्व पूरी तरह से नदारद हैं। यदि अभियोजन पक्ष की कहानी को पूर्ण रूप से स्वीकार भी कर लिया जाए, तो यह ज्यादा से ज्यादा एक व्यक्तिगत विवाद के कारण हुई मामूली हाथापाई का मामला लगता है। इसे बेवजह एक विशेष कानून के तहत आपराधिक रंग देने का प्रयास किया गया है।
पत्रकार संजीव राय ने मुहम्मदाबाद पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में बीएनएस की विभिन्न धाराओं और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(डीए) के तहत दायर चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी। इसके साथ ही, उन्होंने मऊ के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम) द्वारा पिछले साल 1 सितंबर को चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद जारी किए गए समन आदेश को भी चुनौती दी थी।
पुलिस अधिकारी अजय विक्रम सिंह द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के अनुसार, राय ने अपने अनैतिक कार्यों में सहयोग के लिए स्थानीय पुलिस को डराने और दबाव बनाने का प्रयास किया था। अधिकारी का दावा था कि जब उन्होंने इससे इनकार किया, तो राय ने उच्च अधिकारियों से उनकी झूठी शिकायतें कीं। अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले सिंह ने यह भी आरोप लगाया था कि 8 नवंबर 2024 को एक स्थानीय स्कूल के समारोह में राय ने उन्हें जातिसूचक गालियां दी थीं।
वहीं दूसरी ओर, पत्रकार राय के वकील ने अदालत में दलील दी कि घटनास्थल को लेकर अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास मौजूद है। गवाहों के दर्ज बयानों के मुताबिक, जब कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया, तब पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद ही नहीं थे। बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि पटाखे फोड़ने से उपजे एक सामान्य विवाद को जानबूझकर एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध का रूप दे दिया गया।
अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता और पुलिस अधिकारी सिंह के वकील ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि मामले में कोई विसंगति नहीं है और आरोपी ने जातिगत गालियों का ही इस्तेमाल किया था।
हालांकि, दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस सिंह की पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि जांच में जुटाए गए सबूत यह नहीं दर्शाते हैं कि कथित कृत्य शिकायतकर्ता की जाति के कारण या उन्हें अनुसूचित जाति का होने के चलते अपमानित करने के इरादे से किए गए थे।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा। इसी आधार पर अदालत ने 1 जुलाई 2025 की चार्जशीट और 1 सितंबर 2025 के संज्ञान-सह-समन आदेश को एससी/एसटी एक्ट की धाराओं के संदर्भ में तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।
हालांकि, आदेश के अंत में यह स्पष्ट किया गया है कि अपीलकर्ता के खिलाफ आईपीसी और बीएनएस के तहत दर्ज अन्य अपराधों से जुड़ी कानूनी कार्यवाही पहले की तरह जारी रहेगी।
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