Bombay High Court के आदेश के बावजूद वर्धा विश्वविद्यालय नहीं दे रहा शोधार्थियों को फेलोशिप

दो पीएचडी शोधार्थियों का निष्कासन उच्च न्यायालय ने अवैधानिक करार दिया; फेलोशिप भुगतान अभी लंबित
शोधार्थियों का कहना है कि पिछले चार वर्षों से विश्वविद्यालय में हो रही अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियों, वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का विरोध करने की यह कीमत है।
शोधार्थियों का कहना है कि पिछले चार वर्षों से विश्वविद्यालय में हो रही अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियों, वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का विरोध करने की यह कीमत है।
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वर्धा-  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा इन दिनों एक नए विवाद के केंद्र में है। नागपुर उच्च न्यायालय द्वारा दो शोधार्थियों– राजेश कुमार यादव और रामचंद्र – के निष्कासन एवं निलंबन को अवैधानिक ठहराए जाने के बावजूद, विश्वविद्यालय प्रशासन पर उनकी शोधवृत्ति (फेलोशिप) रोककर रखने तथा मानसिक प्रताड़ना देने के गंभीर आरोप लगे हैं। दोनों शोधार्थी स्त्री अध्ययन विभाग (सत्र 2021) से जुड़े हैं।

शोधार्थियों का कहना है कि पिछले चार वर्षों से विश्वविद्यालय में हो रही अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियों, वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का विरोध करने की यह कीमत है। इस मामले ने 16 अप्रैल को प्रस्तावित दीक्षांत समारोह से पहले प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने वाली हैं।

27 जनवरी 2024 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने राजेश कुमार यादव को निष्कासित और रामचंद्र को निलंबित कर दिया था। आरोप था कि दोनों ने आईआईएम नागपुर के निदेशक की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। इस कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताते हुए दोनों ने उच्च न्यायालय, नागपुर पीठ का दरवाजा खटखटाया।

दोनों शोधार्थी विश्वविद्यालय में अनियमितताओं और अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियों के खिलाफ पिछले वर्षों से लिखित शिकायतें, ज्ञापन और अहिंसक प्रदर्शन कर रहे थे।

उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (दूसरे पक्ष को सुनने का अधिकार) का उल्लंघन थी। न्यायालय के आदेश के बाद दोनों को बहाल कर दिया गया, लेकिन उनकी शोधवृत्ति (फेलोशिप) और आर्थिक सहायता अभी तक पूरी तरह जारी नहीं की गई है। राजेश कुमार यादव की जनवरी 2023 से दिसंबर 2025 तक की फेलोशिप और रामचंद्र की जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 तक की फेलोशिप बकाया बताई जा रही है। पुनर्बहाली के बाद के तीन महीनों में भी भुगतान में देरी का मामला सामने आया है।

शोधार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षा मंत्रालय, यूजीसी, राष्ट्रपति सचिवालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को कई आवेदन दिए, लेकिन शुरुआती स्तर पर कोई समाधान नहीं निकला। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।

विश्वविद्यालय 16 अप्रैल को दीक्षांत समारोह आयोजित कर रहा है, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने वाली हैं। इस आयोजन की तैयारियां चल रही हैं।

'निजी कुंठा’ और ‘प्रतिशोध’ का आरोप

शोधार्थियों का कहना है कि पिछले चार वर्षों से विश्वविद्यालय में हो रही अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियों, वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का विरोध करने की यह कीमत है। राजेश कुमार यादव के खिलाफ पहले ही तीन मिथ्या एफ.आई.आर. दर्ज कराई जा चुकी हैं। उनका आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी अपनी “निजी कुंठा” का तुषारापात उन पर कर रहे हैं।

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल वर्तमान कार्यवाहक कुलसचिव कादर नवाज खान पर उठ रहा है। सूत्रों के अनुसार, 2019-2023 के बीच जब प्रो. रजनीश शुक्ल कुलपति थे, तब कादर नवाज के कार्यकाल में 18 अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियाँ हुईं। उन पर फर्जी प्रमाणपत्र, एसएफएस पदों के अवैधानिक रूपांतरण, बीसीआई (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) प्रकरण में लापरवाही (जिसमें विवि पर 6 लाख का जुर्माना लगा) तथा विश्वविद्यालय निधि से निजी आवास पर खर्च करने के गंभीर आरोप हैं। हैरानी की बात यह है कि आरोपों के बावजूद न केवल उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई, बल्कि 2025 में उन्होंने स्वयं स्थायी कुलसचिव पद के लिए आवेदन भी किया।

मामले की जांच के लिए प्रशासन ने प्रो. अवधेश कुमार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह वही प्रो. अवधेश कुमार हैं जिन्होंने 27 जनवरी 2024 को अवैधानिक निष्कासन/निलंबन के आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। शोधार्थियों का कहना है कि “कोई अपने मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता” (निमो जूडेक्स इन कॉसा सुआ) के सिद्धांत का यह घोर उल्लंघन है। साथ ही, इस समिति में एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग का कोई प्रतिनिधि नहीं होना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन बताया जा रहा है, जिसे संस्थागत जातीय पक्षपात करार दिया जा रहा है।

शोधार्थियों ने अपनी ये मांगों रखी हैं:

  • बकाया फेलोशिप तत्काल जारी की जाए।

  • 27 जनवरी 2024 की कार्रवाई में शामिल अधिकारियों और शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।

  • 2019-2023 की शिक्षक नियुक्तियों की स्वतंत्र जांच (CBI या सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में) कराई जाए।

  • वर्तमान कार्यवाहक कुलसचिव श्री कादर नवाज खान के 2019-2023 के कार्यकाल में कई नियुक्तियों पर सवाल उठे हैं, उन्हें पद से हटाकर उनकी भूमिका की जांच की जाए।

  • प्रो. अवधेश कुमार की अध्यक्षता वाली जांच समिति को रद्द किया जाए, क्योंकि इसमें पूर्वाग्रह का आरोप है और SC/ST/OBC प्रतिनिधि शामिल नहीं हैं।

  • राजेश कुमार यादव के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर रद्द की जाएं।

शोधार्थियों का कहना है कि पिछले चार वर्षों से विश्वविद्यालय में हो रही अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियों, वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का विरोध करने की यह कीमत है।
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