
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि सार्वजनिक परीक्षाओं में उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त किए गए अंक गोपनीय नहीं होते हैं। अदालत के मुताबिक, सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत इन अंकों की जानकारी मांगी जा सकती है और इसके लिए किसी तीसरे पक्ष की सहमति की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, इसकी एक शर्त यह है कि यह जानकारी मांगने वाला व्यक्ति उसी परीक्षा का ही कोई अन्य उम्मीदवार होना चाहिए।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने 26 फरवरी को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक परीक्षा में हासिल किए गए नंबर ऐसी कोई निजी या संवेदनशील जानकारी नहीं हैं जिन्हें आरटीआई एक्ट की धारा 8 के तहत संरक्षण दिया जाए।
अदालत ने इसके साथ ही यह भी जोड़ा कि अगर परीक्षा प्रक्रिया से बाहर का कोई बाहरी व्यक्ति ऐसी जानकारी मांगता है, तो संबंधित विभाग गोपनीयता का बचाव लेते हुए इसे देने से इनकार कर सकता है।
अपने इस विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट ने अंकों और उत्तर पुस्तिकाओं (आंसर शीट) के बीच एक बड़ा और स्पष्ट अंतर बताया है। अदालत ने कहा कि उत्तर पुस्तिकाओं की फोटोकॉपी उपलब्ध कराने से परीक्षकों की पहचान, उनके हस्ताक्षर या अन्य ऐसी संवेदनशील जानकारियां उजागर हो सकती हैं, जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे हालात में अधिकारी फोटोकॉपी जारी करने के बजाय उम्मीदवारों को केवल उत्तर पुस्तिकाएं देखने या उनका निरीक्षण करने की अनुमति दे सकते हैं।
खंडपीठ का सख्त लहजे में कहना था कि किसी भी आवेदक को दूसरे उम्मीदवार की आंसर शीट की फोटोकॉपी प्राप्त करने का कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है, बल्कि वह केवल अपनी ही उत्तर पुस्तिका की प्रति प्राप्त करने का हकदार है।
यह पूरा मामला वाराणसी स्थित डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (DLW) के महाप्रबंधक के माध्यम से भारत संघ द्वारा दायर एक रिट याचिका से जुड़ा है। साल 2008 में संतोष कुमार नाम के एक व्यक्ति ने रेलवे में कानूनी सहायक (लीगल असिस्टेंट) के पद के लिए परीक्षा दी थी। इसके बाद उन्होंने आरटीआई कानून का इस्तेमाल करते हुए खुद सहित तीन उम्मीदवारों की मार्कशीट की मांग की थी।
उस वक्त अधिकारियों ने उन्हें उत्तर पुस्तिकाओं का निरीक्षण तो करने दिया, लेकिन फोटोकॉपी देने से मना कर दिया। इस बात से नाराज होकर संतोष कुमार दिल्ली स्थित केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) पहुंचे। सीआईसी ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह आवेदक को फोटोकॉपी उपलब्ध कराए। इसके जवाब में डीएलडब्ल्यू ने एक समीक्षा याचिका दाखिल की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसी के बाद यह पूरा मामला हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंचा।
मामले की गंभीरता से सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि ऐसी कोई भी व्यक्तिगत जानकारी जिसका व्यापक जनहित से कोई लेना-देना न हो, उसे निजता के अनावश्यक हनन से बचने के लिए रोका जा सकता है। लेकिन अगर किसी जानकारी के खुलासे से जनता का फायदा होता है, तो उसे जरूर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। आरटीआई एक्ट की धारा 11 का हवाला देते हुए अदालत ने बताया कि जब किसी तीसरे पक्ष की जानकारी मांगी जाती है, तो कानून में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जिनमें उस तीसरे पक्ष को अनिवार्य रूप से नोटिस देना भी शामिल है।
अदालत की मुख्य चिंता गोपनीयता बनाए रखने और निजता के अधिकार का सम्मान करने को लेकर थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी उम्मीदवार के खिलाफ कोई विभागीय या अन्य जांच लंबित है, तो जानकारी रोकी जा सकती है।
खंडपीठ ने अपने निष्कर्ष में कहा कि आरटीआई आवेदक द्वारा जो अंक मांगे गए थे, वे तो उसे दिए जाने चाहिए थे, लेकिन अधिकारियों को उत्तर पुस्तिकाओं की फोटोकॉपी जारी करने के लिए बिल्कुल मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि सरकारी विभाग इस तरह के खुलासों के संबंध में अपने नियम खुद तय कर सकते हैं।
कोर्ट ने साफ किया कि यदि रिकॉर्ड का निरीक्षण करने भर से आवेदक का उद्देश्य पूरा हो जाता है, तो यह आरटीआई अधिनियम की बुनियादी जरूरतों को पूरा करता है। अदालत का यह मानना है कि मांगी गई प्रासंगिक जानकारी देना ही आवेदन को संतुष्ट करना है। इसलिए यह कतई जरूरी नहीं है कि विभाग हमेशा आधिकारिक दस्तावेजों की प्रतियां ही मुहैया कराए, अगर विभाग को लगता है कि सिर्फ दस्तावेज दिखाना पर्याप्त है, तो उसे मान्य माना जाएगा।
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