एमपी के जीवाजी विश्वविद्यालय में संघवाद विषय पर विवाद! दलित प्रोफेसर के समर्थन में आए शोधार्थी, जानिए क्या है मामला?

विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच के लिए छह सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति पूरे प्रकरण की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी।
एमपी के जीवाजी विश्वविद्यालय में संघवाद विषय पर विवाद
एमपी के जीवाजी विश्वविद्यालय में संघवाद विषय पर विवाद
Published on

भोपाल। मध्यप्रदेश के ग्वालियर जीवाजी विश्वविद्यालय की विधि अध्ययनशाला में पीएचडी कोर्सवर्क की एक कक्षा को लेकर उठे विवाद के बीच अब बड़ी संख्या में शोधार्थी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राम शंकर के समर्थन में सामने आ रहे हैं। जानकारी के अनुसार करीब 17 शोधार्थियों ने विश्वविद्यालय के कुलसचिव को लिखित ज्ञापन दिया है, जबकि लगभग 10 पूर्व छात्रों ने ई-मेल के माध्यम से अलग-अलग ज्ञापन भेजकर शिक्षक के अध्यापन को तथ्यपरक और पाठ्यक्रम के अनुरूप बताया है। शोधार्थियों का कहना है कि कक्षा में जो विषय पढ़ाया गया, वह पूरी तरह शैक्षणिक था और उसे गलत तरीके से प्रस्तुत कर विवाद खड़ा किया गया है।

संघवाद के पाठ पर शुरू हुआ विवाद

शोधार्थियों के अनुसार पीएचडी कोर्सवर्क की कक्षा में संघवाद (Federalism) से जुड़ा विषय पढ़ाया जा रहा था। इसमें केंद्र की जिम्मेदारियां, राज्यों के भीतर आंतरिक अशांति और अनुच्छेद 356 व 365 के प्रावधान जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। विद्यार्थियों का कहना है कि इस विषय को समझाने के लिए पहले परिसंघ (Confederation), संघ (Federation/Union) और संघवाद (Federalism) की अवधारणाओं को स्पष्ट किया गया, ताकि शासन व्यवस्था की संरचना को बेहतर ढंग से समझाया जा सके।

शोधार्थी दीपक सिंह गोरख ने बताया कि संघवाद पढ़ने से पहले उसके मूल ढांचे को समझना जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि परिसंघ में अलग-अलग राज्य स्वतंत्र रहते हैं और कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए साथ आते हैं, जबकि संघीय व्यवस्था में केंद्र अधिक मजबूत होता है और राज्य उससे अलग नहीं हो सकते। भारतीय संविधान भारत को “राज्यों का संघ” कहता है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संतुलन बनाया गया है।

ऐतिहासिक उदाहरणों के जरिए समझाया गया विषय

शोधार्थियों ने अपने ज्ञापन में कहा कि कक्षा के दौरान शिक्षक ने संघीय ढांचे को समझाने के लिए ऐतिहासिक और लोकगाथाओं से जुड़े उदाहरण भी दिए थे। इनमें बुंदेलखंड की लोकगाथाओं में वर्णित आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान से जुड़ा प्रसंग भी शामिल था। छात्रों का कहना है कि यह उदाहरण केवल तुलनात्मक अध्ययन के उद्देश्य से दिया गया था, ताकि यह समझाया जा सके कि अलग-अलग क्षेत्रों और शक्तियों के बीच संबंध किस प्रकार बनते हैं और राजनीतिक संरचनाएं कैसे विकसित होती हैं।

अनुच्छेद 356 और 365 पर भी हुई चर्चा

शोधार्थी रुपेश उच्चकोटिया ने बताया कि कक्षा में संविधान के अनुच्छेद 356 और 365 के प्रावधानों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। इसमें यह बताया गया कि यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाता है, तो राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। इस संदर्भ में ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ यह भी समझाया गया कि केंद्र और राज्यों के बीच संबंध किस प्रकार काम करते हैं।

छात्रों के अनुसार कक्षा में समसामयिक मुद्दों के संदर्भ में भी चर्चा हुई, जिसमें शासन व्यवस्था और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार किया गया। उनका कहना है कि यह चर्चा पूरी तरह अकादमिक थी और किसी विशेष विचारधारा के समर्थन या विरोध के रूप में नहीं थी।

भाषा और समाज पर चर्चा

शोधार्थियों ने बताया कि कक्षा के दौरान भाषा और समाज के संबंध पर भी चर्चा की गई। इसमें यह बताया गया कि कई भाषाओं का विकास सामाजिक परिस्थितियों और समाज में उनके उपयोग से जुड़ा होता है। उदाहरण के तौर पर संस्कृत नाटकों में यह देखा गया है कि शिक्षित पुरुष संस्कृत बोलते थे, जबकि महिलाएं और सामान्य वर्ग प्राकृत भाषा का उपयोग करते थे। विद्यार्थियों का कहना है कि यह चर्चा भी साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर की गई थी।

छात्रा के आरोपों को शोधार्थियों ने बताया निराधार

शोधार्थी ज्योति गौतम ने कहा कि कक्षा में पढ़ाई गई अधिकांश सामग्री सामान्य शैक्षणिक स्रोतों और इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। उनका कहना है कि यदि किसी छात्रा को अध्यापन से आपत्ति थी तो वह कक्षा में ही सवाल उठा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। शोधार्थियों का आरोप है कि बाद में इस मुद्दे को सोशल मीडिया के माध्यम से विवाद का रूप दिया गया।

कुछ शोधार्थियों ने यह भी कहा कि पीएचडी स्तर की पढ़ाई में वैश्विक शोध और तुलनात्मक अध्ययन शामिल होता है, इसलिए गहन चर्चा और बहस स्वाभाविक है। उनका कहना है कि किसी विषय को आंशिक रूप से प्रस्तुत कर विवाद पैदा करना उचित नहीं है।

शोधार्थियों ने निष्पक्ष जांच की मांग की

ज्ञापन में शोधार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी शिक्षक की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन का वातावरण प्रभावित नहीं होना चाहिए।

द मूकनायक से बातचीत में डॉ. युवराज खरे, एसोसिएट प्रोफेसर, जे.एस. कॉलेज ऑफ लॉ, निवाड़ी ने कहा कि वे डॉ. राम शंकर को पिछले लगभग 15 वर्षों से जानते हैं और वे उनके शिक्षक भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. राम शंकर जो भी पढ़ाते हैं, वह प्रमाणित और तथ्यपरक होता है। उनकी छवि धूमिल करने के लिए यह सब एक सोची-समझी साजिश के तहत किया जा रहा है। डॉ. खरे ने बताया कि एक शिक्षक की छवि को नुकसान पहुंचाने के मामले में उन्होंने कुलसचिव को पत्र लिखकर संबंधित छात्रा के विरुद्ध कार्रवाई की मांग भी की है।

विश्वविद्यालय ने गठित की जांच समिति

इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच के लिए छह सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति पूरे प्रकरण की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।

द मूकनायक से बातचीत में शिक्षाविद और समजशात्री डॉ. इम्तियाज खान ने कहा, की विश्वविद्यालय बहस और विचारों के केंद्र हैं। उन्होंने कहा विश्वविद्यालय ऐसे स्थान होते हैं जहां विभिन्न विचारों पर खुलकर चर्चा होती है। यदि शिक्षक पाठ्यक्रम के अंतर्गत ऐतिहासिक संदर्भों और अलग-अलग दृष्टिकोणों को सामने रखते हैं, तो उसे विवाद का रूप देना उचित नहीं है। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में तर्क, संवाद और विश्लेषण की क्षमता विकसित करना होता है।

इन शोधार्थियों ने दिया ज्ञापन

शिक्षक के समर्थन में ज्ञापन देने वालों में दीपक सिंह, भीमदत्त भारती, आकाश, गजेन्द्र सिंह आर्य, उमा कनौजिया, हीना कुमारी, शालिनी आर्य, कृष्णा तारब, कल्पना, अरुण बघेल, अभिषेक, हेमंत कुमार शर्मा, रुपेश उच्चकोटिया, नेमी जाटव, ज्योति गौतम, कुलदीप इटोरिया और सोनू जाटव सहित कई शोधार्थी शामिल हैं।

एमपी के जीवाजी विश्वविद्यालय में संघवाद विषय पर विवाद
MP: मतदाता सूची में फर्जीवाड़े के आरोप, भोपाल में एक ही पते पर दर्ज मिले दर्जनों नाम, कांग्रेस ने चुनाव आयोग से शिकायत की
एमपी के जीवाजी विश्वविद्यालय में संघवाद विषय पर विवाद
MP: कुरकुरे दिलाने का लालच देकर 5 साल की बच्ची को ले गया युवक, अश्लील हरकत कर हुआ फरार, MP में बढ़ रहे नाबालिगों से यौन उत्पीड़न के मामले!
एमपी के जीवाजी विश्वविद्यालय में संघवाद विषय पर विवाद
MP: एम्स भोपाल की डॉक्टर की आत्महत्या पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सख्त, एम्स प्रबंधन और पुलिस को नोटिस भेजा, जानिए मामला?

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com