
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा अपने आप समाप्त नहीं होता। अदालत के अनुसार, कोई व्यक्ति एसटी समुदाय का हिस्सा बना रहता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी जनजातीय पहचान, रीति-रिवाजों और सामुदायिक जीवन को कितना कायम रखता है।
जस्टिस अरुण कुमार ने यह अहम टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के साल 2026 के 'चिंताद आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' फैसले का हवाला देते हुए की। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजाति के दर्जे का निर्धारण पूरी तरह इस बात पर टिका होता है कि दावेदार ने अपनी जनजातीय जड़ों को कितना सहेज कर रखा है और समुदाय में उसकी स्वीकार्यता कैसी है।
यह पूरा मामला निन्हकी उर्फ नइमुनिशा से जुड़ा है। खुद को भुइया अनुसूचित जनजाति का बताने वाली इस महिला ने सोनभद्र के डिप्टी कलेक्टर के उन तीन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें उसके पक्ष में किए गए भूमि हस्तांतरण को शून्य घोषित कर दिया गया था।
राजस्व अधिकारियों ने पाया था कि यह भूमि हस्तांतरण उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-बी और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 99 का सीधा उल्लंघन है। इन नियमों के तहत एसटी समुदाय के सदस्य की जमीन किसी गैर-एसटी व्यक्ति को ट्रांसफर नहीं की जा सकती। इसी आधार पर जमीन राज्य सरकार के अधीन कर दी गई थी।
याचिकाकर्ता महिला की दलील थी कि उसका जन्म भुइया जनजाति में हुआ है। उसके पास तहसीलदार द्वारा जारी एक वैध एसटी प्रमाण पत्र भी मौजूद है। उसने यह जमीन गोंड जनजाति के सदस्यों से खरीदी थी, इसलिए यह पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने महिला के मौजूदा एसटी दर्जे पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने अदालत को बताया कि महिला ने इस्लामी रीति-रिवाजों से एक मुस्लिम व्यक्ति से निकाह किया था। इसके बाद वह नइमुनिशा बन गई और दशकों तक उसी परिवेश में रही।
सरकार के मुताबिक, उसके दो बच्चे भी हैं जिनके नाम मुस्लिम हैं और परिवार रजिस्टर में भी उसका धर्म इस्लाम दर्ज है। ऐसे में अपनी नई धार्मिक और सामाजिक पहचान अपनाने के बाद वह एसटी दर्जे का दावा करने की हकदार नहीं रह जाती है।
इसके जवाब में महिला ने तर्क दिया कि मुस्लिम से शादी करने के बावजूद उसने अपनी जनजातीय पहचान नहीं छोड़ी है। उसने दावा किया कि वह अभी भी अपने गांव में ही रहती है, भुइया जनजाति के सभी रीति-रिवाजों का पालन करती है और समुदाय का अभिन्न हिस्सा है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने यह साफ किया कि ऐसा कोई कानूनी नियम नहीं है कि धर्म बदलते ही किसी की एसटी सदस्यता छिन जाए। यदि उसकी जनजातीय विशेषताएं, परंपराएं और समुदाय से जुड़ाव बरकरार है, तो वह व्यक्ति एसटी बना रह सकता है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कोई एक सख्त पैमाना लागू नहीं किया जा सकता। महज एक दस्तावेज में किसी को मुस्लिम लिख देने से एसटी का दर्जा खत्म नहीं होता। हालांकि, इस विशेष मामले में अदालत का निष्कर्ष मौजूदा परिस्थितियों और जनजातीय जीवन की निरंतरता दिखाने वाले सबूतों के अभाव पर आधारित था।
कोर्ट ने महिला के एसटी प्रमाणपत्र की जांच करते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण सबूत जरूर है। लेकिन, अगर बाद में सामने आए तथ्य इस दावे पर संदेह पैदा करते हैं, तो अधिकारियों को मौजूदा दर्जे की बारीकी से जांच करने का पूरा अधिकार है।
अंततः अदालत ने पाया कि विवादित सेल डीड की तारीखों पर याचिकाकर्ता अपना भुइया एसटी दर्जा साबित करने में पूरी तरह विफल रही। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि वह महिला कई दशकों तक एक अलग नाम और पूरी तरह से अलग धार्मिक व सामाजिक परिवेश में अपना जीवन बिता रही थी।
न्यायालय ने जोर देकर कहा कि उनका यह फैसला सिर्फ शादी, धर्म परिवर्तन या मुस्लिम के रूप में दर्ज होने की किसी इकलौती प्रविष्टि पर आधारित नहीं है। यह फैसला उन लंबे समय से चली आ रही परिस्थितियों और भुइया रीति-रिवाजों से जुड़े रहने के ठोस सबूतों की कमी को देखते हुए लिया गया है।
इन्हीं आधारों पर 14 सितंबर को सुनाए गए अपने फैसले में अदालत ने माना कि यह लेनदेन गैर-एसटी व्यक्तियों के पक्ष में हस्तांतरण पर लागू वैधानिक प्रतिबंध के दायरे में आता है। इसी के साथ कोर्ट ने महिला की रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए राजस्व अधिकारियों के आदेशों को बरकरार रखा।
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