पत्नी कमाऊ हो तो भी पति गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट, 'जीवन के स्तर' को माना आधार

पत्नी सालाना 11 लाख कमाती है तो क्या हुआ? पति की कमाई 40 लाख है, इसलिए 'जीवन स्तर' बराबर रखने के लिए गुजारा भत्ता देना ही होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ते (Maintenance) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पत्नी का केवल शिक्षित होना, नौकरी करना या आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना ही उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने एक पति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी को कामकाजी बताते हुए भत्ते के आदेश को चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 का उद्देश्य सिर्फ पत्नी को भुखमरी या बदहाली से बचाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वह उसी गरिमा और जीवन स्तर (Standard of Living) के साथ जी सके, जिसकी वह ससुराल में रहने के दौरान आदी थी।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) से जुड़ा है, जिसे रविंद्र सिंह बिष्ट ने दाखिल किया था। उन्होंने गाजियाबाद के फैमिली कोर्ट (अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश) द्वारा पिछले साल 4 जनवरी को दिए गए आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में रविंद्र सिंह को निर्देश दिया था कि वह अपनी पत्नी को भत्ते के रूप में 15,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करें।

पति ने हाई कोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत का फैसला गलत है क्योंकि उसकी पत्नी न केवल उच्च शिक्षित है बल्कि नौकरी भी करती है। अपने दावे के समर्थन में पति के वकील ने पत्नी द्वारा 2018 में दाखिल किया गया इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भी कोर्ट के सामने रखा, जिसके मुताबिक पत्नी की सालाना क्रेडिटेड सैलरी 11,28,780 रुपये थी।

दूसरी ओर, पत्नी ने कोर्ट को बताया कि पति अपनी असली कमाई छिपा रहा है। पत्नी के वकील ने ट्रायल कोर्ट में दर्ज पति के बयान का हवाला दिया, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह अप्रैल 2018 से अप्रैल 2020 तक एक कंपनी में कार्यरत था और उसका सालाना पैकेज लगभग 40 लाख रुपये था।

'कमाई में भारी अंतर की अनदेखी नहीं की जा सकती'

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा, "भले ही हम यह मान लें कि पत्नी के पास आय का कुछ स्रोत है, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज यह साफ दिखाते हैं कि पति और पत्नी की कमाई की क्षमता और आर्थिक स्थिति में भारी अंतर (Substantial Disparity) है।"

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की, "पत्नी की जो आय बताई गई है, उसे इतना पर्याप्त नहीं माना जा सकता कि वह उससे ठीक वही जीवन स्तर बनाए रख सके, जो उसे अपने वैवाहिक जीवन के दौरान प्राप्त था।"

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

आदेश पारित करते हुए बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही यह तय कर चुकी है कि "पत्नी का केवल कमाना उसे भत्ते से वंचित नहीं करता; निर्णायक कसौटी यह है कि क्या उसकी आय उसे ससुराल जैसा जीवन स्तर देने के लिए पर्याप्त है या नहीं।"

पति की दलीलें हुईं खारिज

सुनवाई के दौरान पति के वकील ने यह भी तर्क दिया कि पत्नी ने स्वेच्छा से ससुराल छोड़ा था और वह पति के वृद्ध माता-पिता के साथ रहने या अपनी जिम्मेदारियां निभाने को तैयार नहीं थी। पति ने दावा किया कि उसे अपने बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी और अब उसके पास भत्ते का भुगतान करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि पति ने अपनी आर्थिक तंगी और देनदारियों को लेकर जो बातें कही हैं, वे केवल "कोरे दावे" (Bald Assertion) हैं। कोर्ट ने कहा, "रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता (पति) के पास इतने साधन नहीं हैं कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण कर सके।"

फैसला: 15,000 रुपये का भत्ता जायज

अंत में, अदालत ने माना कि मामले के तथ्यों और पति की कमाई की क्षमता को देखते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 15,000 रुपये की राशि पूरी तरह से न्यायसंगत और उचित है। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई भी अवैधता या गड़बड़ी नहीं है जिसके लिए हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े। इस आधार पर रविंद्र सिंह बिष्ट की याचिका को खारिज कर दिया गया।

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