POCSO मामले में 10 साल की बच्ची के बार-बार मनोवैज्ञानिक परीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का इंकार; बाल-कल्याण को माना सर्वोपरि

शीर्ष अदालत ने कहा कि पीड़ित बच्चे के साथ किसी भी तरह की बातचीत में कम-से-कम दखल और कम-से-कम एक्सपोज़र के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए, और साथ ही यह भी पक्का किया जाना चाहिए कि बच्चे की भलाई और मानसिक सेहत को सबसे ज़्यादा अहमियत दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत नेल्सन मंडेला के इस प्रसिद्ध कथन से की कि "किसी समाज की आत्मा का सबसे गहरा चित्रण इस बात से होता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत नेल्सन मंडेला के इस प्रसिद्ध कथन से की कि "किसी समाज की आत्मा का सबसे गहरा चित्रण इस बात से होता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"सोशल मीडिया
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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यौन शोषण की शिकार बच्ची को बार-बार और कई विशेषज्ञों के सामने पेश करने को उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को संशोधित किया है, जिसमें 10 साल की एक बच्ची के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए चार विशेषज्ञों का पैनल बनाया गया था। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि बच्चे का कल्याण, गरिमा और मानसिक सुरक्षा ही सर्वोपरि है और न्यायिक प्रक्रियाएं खुद बच्चे के लिए 'पुनः आघात' (re-traumatisation) और 'द्वितीयक पीड़ा' (secondary victimisation) का कारण बन सकती हैं। कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत नेल्सन मंडेला के इस प्रसिद्ध कथन से की कि "किसी समाज की आत्मा का सबसे गहरा चित्रण इस बात से होता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012' (POCSO एक्ट) के तहत बच्चों की सुरक्षा के जो सिद्धांत हैं, उन्हें कस्टडी, मुलाक़ात और माता-पिता के संपर्क से जुड़े उन मामलों में भी ध्यान में रखा जाना चाहिए जिनमें बच्चे पीड़ित हों।

क्या है विवाद?

यह मामला शीतल वसंत ठाकुर (मां) और चिराग अरोड़ा (पिता) के बीच अभिभावकता और मुलाकात के अधिकार को लेकर है। दोनों की शादी 10 फरवरी 2015 को फरीदाबाद, हरियाणा में हुई थी और 24 जून 2016 को अमेरिका में उनकी बेटी का जन्म हुआ। मां ने आरोप लगाया कि 2018-2019 के दौरान पिता ने उनके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया और ढाई साल की बच्ची के साथ यौन शोषण किया। 29 दिसंबर 2019 को घरेलू हिंसा की घटना के बाद मां बच्ची को लेकर 30 दिसंबर 2019 को भारत लौट आईं और पिता के खिलाफ पोक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत एफआईआर दर्ज कराई, जो वर्तमान में येरवडा पुलिस स्टेशन, पुणे में विचाराधीन है। पिता को 13 जून 2024 को बॉम्बे हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली है।

पिता ने फैमिली कोर्ट, पुणे में याचिका दायर कर बच्ची के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ (independent expert) नियुक्त करने की मांग की, जिसका मां ने विरोध करते हुए कहा कि बच्ची पहले से ही एक मनोवैज्ञानिक से चिकित्सीय सत्र (therapy) ले रही है, बच्ची को और अधिक मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से गुजरना उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा, और पोक्सो अधिनियम बच्चे को आरोपी के संपर्क से बचाने का प्रावधान करता है। 28 अप्रैल 2022 को फैमिली कोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी और कहा कि जब तक पोक्सो मामला चल रहा है, बच्ची को इस प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम की धारा 24, 33(5), 36 और 39 का हवाला दिया, जो बच्चों के अनुकूल (child-friendly) प्रक्रियाओं पर जोर देती हैं और बच्चे को अनावश्यक मानसिक तनाव से बचाने का आदेश देती हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या दिया आदेश?

पिता ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 7 जनवरी 2023 को फैमिली कोर्ट के आदेश में आंशिक हस्तक्षेप करते हुए एक 'स्वतंत्र विशेषज्ञ' की नियुक्ति का निर्देश दिया। इसके बाद 27 अप्रैल 2023 को हाईकोर्ट ने अपने ही पिछले आदेश को बदलते हुए 'विशेषज्ञ' की जगह 'विशेषज्ञों का पैनल' (panel of experts) शब्द जोड़ दिया और 7 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट ने खुद ही चार सदस्यीय पैनल का गठन कर दिया, जिसमें डॉ. अंजलि छाबड़िया, डॉ. कमला लंदन (अमेरिका स्थित), डॉ. यज्योति सिंह और डॉ. भूषण शुक्ला शामिल थे, और इस पैनल में पिता द्वारा सुझाए गए विशेषज्ञों को शामिल किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों संशोधित किया बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को "मौलिक त्रुटि" (fundamental flaw) बताते हुए कहा कि अभिभावकता या मुलाकात के अधिकार के मामलों में बच्चे का कल्याण ही सबसे महत्वपूर्ण है और माता-पिता के अधिकार इसके अधीन हैं। कोर्ट ने कहा कि एक विशेषज्ञ की जगह चार विशेषज्ञों का पैनल बनाना कोई मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि यह बच्चे के मानसिक संपर्क (psychological exposure) को काफी हद तक बढ़ा सकता है। कोर्ट ने चिंता जताई कि पैनल में पिता द्वारा सुझाए गए विशेषज्ञों को शामिल किया गया, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता और स्वतंत्रता (neutrality) पर सवाल उठता है। कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम की धारा 24, 33(5), 36 और 39 का हवाला दिया, जो बच्चों के अनुकूल (child-friendly) प्रक्रियाओं पर जोर देती हैं और बच्चे को अनावश्यक मानसिक तनाव से बचाने का आदेश देती हैं।

पिता ने आशंका जताई थी कि मां बच्ची को उनके खिलाफ भड़का रही है (जिसे 'पेरेंटल एलियनेशन सिंड्रोम' कहा जाता है)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह एक वास्तविक मुद्दा है, लेकिन अदालतों को बिना ठोस सबूतों के किसी भी माता-पिता पर ऐसा लेबल नहीं लगाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे को यह नहीं लगना चाहिए कि उसे अपने माता-पिता में से किसी एक का साथ चुनना है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में बच्चा दोनों माता-पिता के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। कोर्ट ने एक अध्ययन का भी जिक्र किया जिसमें बताया गया कि अभिभावकता के विवादों में बच्चे मानसिक तनाव, व्यवहारिक समस्याओं और मनोदैहिक लक्षणों (psychosomatic symptoms) से पीड़ित होते हैं और माता-पिता के बीच झगड़े के दौरान बच्चा एक कमजोर दर्शक बन जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 27 अप्रैल 2023 और 7 दिसंबर 2023 के आदेशों को संशोधित करते हुए मामले को वापस फैमिली कोर्ट (पुणे) को भेज दिया है और नए निर्देश दिए हैं। फैमिली कोर्ट बच्ची को शामिल किए बिना पहले दोनों माता-पिता (खासकर मां) के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए एक मनोवैज्ञानिक (psychologist) नियुक्त करेगा। इसके बाद, वही मनोवैज्ञानिक बच्ची के वर्तमान चिकित्सक से बात करके बच्ची की मानसिक स्थिति का आकलन करेगा और फैमिली कोर्ट को रिपोर्ट सौंपेगा। इस रिपोर्ट के आधार पर फैमिली कोर्ट तय करेगा कि यदि आवश्यक न हो तो बच्ची का कोई और मूल्यांकन नहीं होगा, और यदि आवश्यक हो तो मूल्यांकन बच्ची के वर्तमान चिकित्सक के परामर्श से न्यूनतम हस्तक्षेप (minimum intrusion) के साथ किया जाएगा। फैमिली कोर्ट बच्ची की बढ़ती उम्र और बदलती जरूरतों को देखते हुए समय-समय पर उसके मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता की समीक्षा करेगा। दोनों पक्षों को फैमिली कोर्ट को पोक्सो मामले की वर्तमान स्थिति से अवगत कराना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण, भावनात्मक सुरक्षा और मानसिक भलाई को सर्वोपरि रखने को महत्व देते हुए कहा कि बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रूटीन का मामला नहीं होना चाहिए। मूल्यांकन का आदेश देने से पहले अदालत को ठोस कारण लिखित में दर्ज करने होंगे और बच्चे के साथ न्यूनतम संपर्क (minimum exposure) का सिद्धांत अपनाया जाएगा। आमतौर पर बार-बार या कई-स्तरीय (multi-layered) मूल्यांकन से बचना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो मूल्यांकन एक ही स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिक द्वारा कराया जाए।

विशेषज्ञों का पैनल एक अपवाद होना चाहिए, नियम नहीं, और विशेषज्ञ पूरी तरह से स्वतंत्र और तटस्थ होना चाहिए। मूल्यांकन बच्चे के हित में हो, किसी पक्ष का मुकदमा मजबूत करने के लिए नहीं, और बच्चे को अपनी पीड़ा बार-बार न सुनानी पड़े। प्रक्रिया पोक्सो अधिनियम के अनुकूल होनी चाहिए और बच्चे की पहचान, बयान और रिपोर्ट गोपनीय रखी जाए। अदालत पूरी प्रक्रिया पर अपनी निगरानी बनाए रखे और आदेश को बदल या रोक सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके ये दिशा-निर्देश हर मामले पर लागू नहीं किए जा सकते, क्योंकि हर मामले की अपनी परिस्थितियां होती हैं और अदालतें उनके अनुसार निर्णय लेंगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे की भावनाएं और जरूरतें समय के साथ बदलती रहती हैं, इसलिए अदालतों को समय-समय पर बाल मनोवैज्ञानिक की मदद से बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य का आकलन करते रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा, " इन बातों को हर मामले में मशीनी तौर पर लागू करने के लिए पूरी या पक्की गाइडलाइन नहीं समझा जाना चाहिए। बच्चे की साइकोलॉजिकल हालत, इमोशनल रिस्पॉन्स और भलाई की ज़रूरतों से जुड़े मामले, खासकर माता-पिता के खराब रिश्तों और गलत व्यवहार के आरोपों के बैकग्राउंड में, सख्त फ़ॉर्मूले या एक जैसे स्टैंडर्ड लागू करने की इजाज़त नहीं देते। इंसानी भावनाएँ, खासकर बच्चे की, कम से कम दो अलग-अलग मामलों में अपने आप बदलती रहती हैं। पहला, एक बच्चे का इमोशनल रिस्पॉन्स दूसरे बच्चे से काफ़ी अलग हो सकता है, जो दिखने में एक जैसे हालात में हो। दूसरा, एक ही बच्चे के मामले में भी, इमोशनल रिस्पॉन्स और ज़रूरतें एक जैसी नहीं रह सकतीं, बल्कि समय बीतने, बढ़ती उम्र, इलाज में तरक्की, परिवार का माहौल, स्कूलिंग, सोशल एक्सपोज़र और दूसरे हालात के साथ बदल सकती हैं, जिनमें से कुछ अकेले में मामूली लग सकती हैं, लेकिन फिर भी आखिर में बच्चे की इमोशनल हालत पर असर डाल सकती हैं। दूसरे शब्दों में, आस-पास के हालात हमेशा बदलते रहेंगे क्योंकि इंसानी भावनाएं और आपसी रिश्ते एक जैसे नहीं रहेंगे, बल्कि हमेशा बदलते रहेंगे।"

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत नेल्सन मंडेला के इस प्रसिद्ध कथन से की कि "किसी समाज की आत्मा का सबसे गहरा चित्रण इस बात से होता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"
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