
पुणे - विशेष पोक्सो न्यायालय, पुणे ने 29 जून को एक 3 वर्षीय बालिका के साथ दुष्कर्म और उसके बाद उसकी हत्या करने के मामले में आरोपी भीमराव प्रभाकर कांबले (65) को मौत की सजा सुनाई। न्यायालय ने इस घटना को "अत्यंत दुर्लभतम" (रैरेस्ट ऑफ द रेयर) श्रेणी का मामला बताते हुए फाँसी की सजा को उचित ठहराया।
अपने फैसले में न्यायाधीश एस.आर. सालुंखे ने कहा कि "इस मामले की क्रूरता, उसे अंजाम देने का तरीका और 3 साल की बच्ची के साथ किया गया अमानवीय व्यवहार, आरोपी को किसी भी अन्य विकल्प के बारे में सोचने से दूर ले जाता है। आजीवन कारावास की सामान्य संभावना इस मामले में निश्चित रूप से समाप्त हो जाती है।"
घटना 1 मई 2026 को नासरापुर, तालुका भोर, जिला पुणे में घटी। आरोपी कांबले, जो पहले से ही महिलाओं के प्रति अभद्र व्यवहार के लिए गाँव से बाहर निकाला जा चुका था, ग्रामीणों के लिए मजदूरी कर रहा था। वो पीड़िता 3 वर्षीय बच्ची को उसके परिवार की देखरेख से बहला-फुसलाकर एक टिन शेड में ले गया, जहाँ उसके साथ दुष्कर्म किया और फिर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। आरोपी ने मृत शरीर को एक बोरी में छिपा दिया था। घटना की FIR 2 मई को दर्ज हुई, पुलिस ने 28 मई को चार्जशीट दाखिल की और उसके एक माह में अदालत ने सजा सुना दिया जो ऐसे मामलों में त्वरित न्याय की एक मिसाल है।
अभियोजन पक्ष ने 55 गवाहों और 370 से अधिक दस्तावेजों के माध्यम से अपना मामला सिद्ध किया, जिसमें CCTV फुटेज, डिजिटल साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और चिकित्सा रिपोर्ट शामिल थीं।
CCTV फुटेज और 'लास्ट सीन टुगेदर' थ्योरी: सबसे अहम सबूत CCTV फुटेज था, जिसमें आरोपी 1 मई 2026 को दोपहर 3:12 बजे बच्ची के साथ टिन शेड की ओर जाता हुआ दिखा, जबकि 3:51 बजे वह अकेला लौटता नजर आया। कोर्ट ने इस 39 मिनट के अंतराल को महत्वपूर्ण माना। न्यायाधीश ने कहा, "आरोपी ने जब स्वीकार किया कि वह 3:12 बजे बच्ची के साथ शेड की ओर गया और 3:51 बजे अकेला लौटा, तो वह इसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका। उसका स्पष्टीकरण अविश्वसनीय है।"
चिकित्सा और फोरेंसिक साक्ष्य: पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 18 गंभीर चोटें दर्ज की गईं, जिनमें चेहरे, छाती और निजी अंगों पर चोटें शामिल थीं। डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि मृत्यु श्वासावरोध (एस्फेक्सिया), दम घोंटने (स्मदरिंग) और मुँह में कपड़ा ठूंसने (गैगिंग) के संयुक्त प्रभाव से हुई। डीएनए प्रोफाइलिंग ने पुष्टि की कि पीड़िता के शरीर पर मिले वीर्य के नमूने आरोपी से मेल खाते हैं, जिससे उसकी बेरुखी साबित होती है। न्यायालय ने कहा, "यौन और शारीरिक हमले चिकित्सा साक्ष्यों से साबित होते हैं। इन हमलों का लेखकत्व वैज्ञानिक साक्ष्यों, जैसे डीएनए, वीर्य और अन्य फोरेंसिक रिपोर्टों से सिद्ध हुआ है।"
बचाव पक्ष का तर्क था कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और साक्ष्यों में विसंगतियाँ हैं। हालांकि, न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया। आरोपी ने अपने बयान में दावा किया कि बच्ची उसके साथ फिसल गई और उसे चोट लग गई, जिसके बाद उसने उसे छोड़ दिया। कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कहा कि "आरोपी ने जब उसे बच्ची के साथ शेड में जाते और अकेले लौटते हुए CCTV में देखा, तो उसने अचानक से इनकार के बजाय बचाव का रुख अपना लिया। परंतु उसका यह बचाव विश्वसनीय नहीं है।"
सजा पर सुनवाई के दौरान, विशेष लोक अभियोजक अजय मीसर ने तर्क दिया कि आरोपी समाज के लिए खतरा है और उसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है। दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने उम्र (65 वर्ष) को कम करने वाला कारक बताते हुए आजीवन कारावास की माँग की।
हालाँकि, न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया और कहा, "आरोपी की उम्र को कम करने वाले कारक के रूप में नहीं माना जा सकता, बल्कि यह एक गंभीर परिस्थिति है। उसकी वासना की प्यास इस उम्र में भी नहीं बुझी है, बल्कि यह बहुत खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है।"
फैसले में आगे कहा गया कि "न्यायालय न केवल 'विचार' करता है, बल्कि 'साक्ष्य' को अपनी 'इन्द्रियों' से 'अनुभव' भी करता है। इस न्यायालय ने CCTV में दर्ज उस बच्ची की अंतिम चीख सुनी है, और उस छोटे से बच्चे पर लगी 18 चोटों को महसूस किया है।"
न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने सभी संदेहों से परे आरोपी के अपराध को सिद्ध कर दिया है। न्यायाधीश सालुंखे ने कहा, "परिस्थितियों की अटूट श्रृंखला केवल और केवल आरोपी की ओर इशारा करती है जिसने यह अपराध किया है।"
सजा सुनाते हुए, अदालत ने आरोपी को BNS की धारा 103(1) (हत्या), 65(2) (12 वर्ष से कम आयु की बच्ची से दुष्कर्म) और POCSO अधिनियम की धारा 6 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत मौत की सजा सुनाई। उसे अन्य धाराओं (137(2), 140(1), 74, 64, 238 BNS और POCSO की धारा 4, 8, 12) के तहत भी दोषी ठहराया गया, हालाँकि मौत की सजा को सभी के लिए पर्याप्त माना गया। कोर्ट ने कहा, "विधायिका ने सबसे कठोर सजाओं का प्रावधान करके अपना कार्य पूरा कर दिया है। अब समय आ गया है कि न्यायालय इन सजाओं को अपराध की गंभीरता के अनुसार कठोरता से लागू करें।"
फैसले के अनुसार, आरोपी को फाँसी पर लटकाकर मौत दी जाएगी। मौत की सजा के सत्यापन के लिए मामले को उच्च न्यायालय, बॉम्बे भेजा जाएगा। साथ ही, न्यायालय ने आदेश दिया कि पीड़िता के माता-पिता को मुआवजा देने के लिए फैसले की एक प्रति जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), पुणे को भेजी जाए।
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