MP: सौतेले पिता की फांसी उम्रकैद में बदली, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- डर और सामाजिक बंदिशों के कारण महिला की चुप्पी गवाही को झूठा नहीं बनाती

धार के 8 साल पुराने मामले में दोषसिद्धि बरकरार, 6 साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट
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भोपाल। मध्य प्रदेश के धार जिले के मनावर से जुड़े करीब आठ साल पुराने एक गंभीर आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी सौतेले पिता की दोषसिद्धि बरकरार रखी है, लेकिन उसे दी गई मौत की सजा को बदलकर बिना किसी छूट के उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया। मामला छह साल की बच्ची के बार-बार यौन उत्पीड़न और उसकी हत्या से जुड़ा है। मामले में बच्ची की मां अभियोजन पक्ष की प्रमुख और एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थी। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में उसकी गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए खास तौर पर यह दलील दी थी कि घटना के बाद महिला कई महीनों तक चुप रही और उसने तत्काल पुलिस या परिवार के किसी सदस्य से शिकायत नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि किसी महिला की चुप्पी को परिस्थितियों से अलग करके उसकी गवाही पर संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता।

डर और सामाजिक दबाव के बीच चुप रहना असामान्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में महिला की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना। अदालत के मुताबिक, यौन और घरेलू हिंसा के मामलों में पीड़िता या प्रत्यक्षदर्शी महिला का तुरंत शिकायत न करना अपने आप में उसकी बात को झूठा साबित नहीं करता। खासकर तब, जब वह आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक रूप से आरोपी पर निर्भर हो और उसके पास सुरक्षित तरीके से बाहर निकलने का विकल्प न हो। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जिस डर और दबाव के कारण कोई अपराधी पीड़ित महिला को चुप रहने के लिए मजबूर करता है, बाद में उसी चुप्पी को उसकी गवाही को अविश्वसनीय साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

पीठ ने भारतीय सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए माना कि सामाजिक बंदिशें, बदनामी का डर, परिवार टूटने की आशंका, आर्थिक निर्भरता और अकेले पड़ जाने का भय कई बार महिलाओं को हिंसा के बावजूद शिकायत करने से रोक सकते हैं। इसलिए न्यायालय के सामने किसी महिला की गवाही का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसने घटना के तुरंत बाद शिकायत क्यों नहीं की।

पहला पति खो चुकी थी महिला, आरोपी के घर में खुद भी असहाय थी

मामले की परिस्थितियों को समझने के लिए अदालत ने महिला की स्थिति को भी देखा। वह पहले ही अपने पति को खो चुकी थी और उसके सामने परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी थी। इसके बाद जिस व्यक्ति पर बच्ची के खिलाफ गंभीर अपराध करने का आरोप था, उसी के घर में उसे रहना पड़ रहा था। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि महिला पर आरोपी का नियंत्रण था और उसकी परिस्थितियां ऐसी थीं कि वह स्वतंत्र रूप से विरोध या शिकायत करने की स्थिति में नहीं थी।

अदालत ने इसी संदर्भ में उसकी स्थिति को लगभग 'बंदी जैसी स्थिति' के रूप में समझाया। यानी केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि घर का दरवाजा खुला था या महिला के पास बाहर जाने का कोई भौतिक रास्ता था। वास्तविक सवाल यह है कि क्या वह सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक दबाव से मुक्त होकर उस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत करने की स्थिति में थी, जिसके साथ वह रह रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि असहाय महिला के लिए घर से बाहर निकलने का रास्ता होना और वास्तव में सुरक्षित रूप से बाहर निकल पाने की क्षमता होना दो अलग-अलग बातें हैं।

बचाव पक्ष ने महीनों की चुप्पी को बनाया था मुख्य आधार

दोषी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुख्य दलीलों में से एक यह थी कि बच्ची की मां घटना की प्रत्यक्षदर्शी थी, लेकिन उसने तत्काल किसी को कुछ नहीं बताया। बचाव पक्ष के मुताबिक, यदि उसने वास्तव में ऐसी घटना देखी थी तो उसे तुरंत पुलिस, रिश्तेदारों या किसी अन्य व्यक्ति को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी। महीनों तक चुप रहने के बाद सामने आई उसकी कहानी को संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को परिस्थितियों की वास्तविकता से काटकर देखने वाला माना। अदालत ने कहा कि गंभीर यौन हिंसा और घरेलू हिंसा के मामलों में प्रतिक्रिया हर व्यक्ति की एक जैसी नहीं होती। भय, सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और आरोपी के नियंत्रण जैसी परिस्थितियां शिकायत में देरी का कारण बन सकती हैं। इसलिए सिर्फ शिकायत में देरी को गवाही को खारिज करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।

एनएफएचएस-5 के आंकड़ों का भी सुप्रीम कोर्ट ने किया उल्लेख

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा से जुड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। अदालत ने बताया कि सर्वेक्षण के अनुसार 18 से 49 वर्ष की करीब 29.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने पति द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव होने की जानकारी दी थी। इनमें बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की थी जिन्होंने हिंसा के बावजूद न तो किसी से मदद मांगी और न ही घटना के बारे में किसी को बताया।

इन आंकड़ों का उल्लेख करते हुए अदालत ने यह समझाने की कोशिश की कि हिंसा के बाद चुप रहना कोई ऐसी असामान्य प्रतिक्रिया नहीं है, जिसे देखकर हर मामले में महिला की बात पर संदेह किया जाए। अदालत के सामने सवाल केवल यह नहीं था कि महिला ने शिकायत कब की, बल्कि यह भी था कि वह किन परिस्थितियों में रह रही थी और उसके लिए शिकायत करना कितना संभव था।

अपराध साबित करने के लिए अदालत ने गवाही और परिस्थितियों को साथ देखा

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसका अर्थ है कि अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन के बाद निचली अदालतों द्वारा आरोपी को दोषी ठहराए जाने के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं किया। धार की जिला अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने 2019 में उस फैसले को बरकरार रखा था।

इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई शामिल थे। पीठ ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा के स्तर पर बदलाव किया और मृत्युदंड को शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास में बदल दिया।

मौत की सजा बदली, लेकिन दोषसिद्धि बरकरार

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अदालत ने आरोपी को अपराध से बरी नहीं किया। दोषसिद्धि बरकरार रही, केवल मृत्युदंड को कम किया गया। अदालत ने आरोपी को बिना किसी छूट के उसके प्राकृतिक जीवन की शेष अवधि तक जेल में रखने का आदेश दिया।

इस तरह मामले में सुप्रीम कोर्ट का मुख्य संदेश दो स्तरों पर सामने आता है। पहला, गंभीर अपराध में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि कायम रही। दूसरा, महिला की शिकायत में देरी या लंबे समय तक चुप रहने को केवल उसी आधार पर उसकी गवाही को अविश्वसनीय मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर जब उसके पीछे भय, सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और आरोपी के नियंत्रण जैसी परिस्थितियां मौजूद हों।

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