
भोपाल। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मझगाय-रुंझ मध्यम सिंचाई परियोजना और केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित किसानों और आदिवासी परिवारों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। मुआवजे, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की मांग को लेकर चल रहा ‘चिता आंदोलन’ बुधवार को 11वें दिन और उग्र हो गया। सैकड़ों महिला और पुरुष ग्रामीण पानी में उतरकर जल सत्याग्रह करते नजर आए।
प्रदर्शनकारियों ने पानी में खड़े होकर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। इसके साथ ही ग्रामीणों ने अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर विरोध जताया। आंदोलनकारियों का कहना है कि परियोजनाओं के लिए उनकी जमीन, घर और आजीविका प्रभावित हो रही है, लेकिन उन्हें अब तक उनके अधिकारों के मुताबिक मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिला है।
मझगाय बांध में जलस्तर बढ़ने के बीच शुरू हुआ यह आंदोलन अब कई परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों का साझा आंदोलन बन गया है। हालिया रिपोर्टों में भी मझगाय, रुंझ और केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित किसानों एवं आदिवासी परिवारों के एकजुट होकर आंदोलन करने की बात सामने आई है।
चिता से जल सत्याग्रह तक पहुंचा आंदोलन
आंदोलन की शुरुआत प्रभावित परिवारों ने प्रतीकात्मक चिता बनाकर की थी। इसके बाद मिट्टी सत्याग्रह, सांकेतिक फांसी और अब जल सत्याग्रह के जरिए ग्रामीण अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जिन गांवों और परिवारों की जमीन परियोजनाओं की वजह से प्रभावित हो रही है, उनके सामने केवल जमीन खोने का सवाल नहीं है, बल्कि घर, खेती, रोजगार, सामाजिक संबंध और वर्षों से चली आ रही जीवन व्यवस्था के खत्म होने का संकट भी है।
जय किसान संगठन के नेता और आंदोलन की अगुवाई कर रहे अमित भटनागर ने प्रभावित परिवारों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि लोगों के घर और खेत डूबने की कगार पर हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान अब तक नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल मुआवजे की राशि बढ़ाने की मांग तक सीमित नहीं है। प्रभावित परिवार चाहते हैं कि उनके पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी हो, पात्र परिवारों को उनका अधिकार मिले और जमीन के वास्तविक स्वरूप के आधार पर मुआवजा दिया जाए।
सिंचित जमीन को असिंचित दर्ज किया गया
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि कई किसानों की उपजाऊ और सिंचित जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में असिंचित दर्ज किया गया है। उनका कहना है कि जमीन की श्रेणी बदलने से मुआवजे की राशि पर सीधा असर पड़ा और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि कई स्थानों पर खड़ी फसलों के बीच निर्माण कार्य कराया गया या मशीनें चलाए जाने से किसानों की फसल और आजीविका प्रभावित हुई।
आंदोलनकारियों की मांग है कि जमीन का वास्तविक उपयोग और उसकी सिंचाई व्यवस्था रिकॉर्ड में दर्ज की जाए तथा मुआवजे का निर्धारण निष्पक्ष तरीके से किया जाए।
सिर्फ मुआवजे की नहीं, जमीन और भविष्य की लड़ाई
अमित भटनागर का कहना है कि प्रभावित परिवारों की लड़ाई केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है। उनका दावा है कि बड़े बांध और दूसरी परियोजनाओं के कारण स्थानीय पर्यावरण, जंगल, जैव विविधता और ग्रामीणों की पारंपरिक आजीविका भी प्रभावित हो रही है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर बुंदेलखंड में लंबे समय से विस्थापन, पर्यावरण और पुनर्वास से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। परियोजना के तहत पन्ना क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जमीन के डूब क्षेत्र में आने और लोगों के विस्थापन को लेकर विरोध भी दर्ज किया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि विकास परियोजनाओं का लाभ व्यापक क्षेत्र को मिल सकता है, लेकिन उसकी कीमत केवल उन परिवारों से नहीं वसूली जानी चाहिए जिनकी जमीन और घर परियोजना के लिए लिए जा रहे हैं।
जब तक पूरा हक नहीं, तब तक आंदोलन
आंदोलन में शामिल ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें केवल कागजों पर पुनर्वास नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा पुनर्वास चाहिए जहां वे अपने परिवार के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। उनका कहना है कि जमीन और घर के बदले मिलने वाला मुआवजा उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए पर्याप्त और न्यायपूर्ण होना चाहिए।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार प्रशासन की ओर से कुछ प्रभावित परिवारों को राहत और मुआवजा दिए जाने की बात कही गई है, जबकि आंदोलनकारी बड़ी संख्या में परिवारों के अब भी अपने अधिकारों से वंचित होने का दावा कर रहे हैं।
21 सितंबर की रिपोर्टों में यह भी सामने आया था कि प्रभावितों ने जल सत्याग्रह के बाद मिट्टी सत्याग्रह के जरिए आंदोलन तेज किया था। वहीं 22 सितंबर को कुछ विस्थापितों को मुआवजा संबंधी प्रमाण पत्र वितरित किए जाने की खबर भी सामने आई। इसके बावजूद आंदोलन जारी है।
अब प्रभावित परिवारों का कहना है कि जब तक सभी पात्र विस्थापितों को उचित मुआवजा, जमीन का सही मूल्यांकन और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिलता, तब तक उनका सत्याग्रह जारी रहेगा।
विकास परियोजनाओं के बीच विस्थापन का सवाल
पन्ना में चल रहा यह आंदोलन एक बार फिर यह सवाल सामने ला रहा है कि बड़ी विकास परियोजनाओं से प्रभावित किसानों और आदिवासी परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और न्यायपूर्ण है। मझगाय और रुंझ बांध के साथ केन-बेतवा लिंक परियोजना तथा ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग से प्रभावित परिवार अलग-अलग स्तर पर विस्थापन और मुआवजे की समस्याएं उठा रहे हैं।
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