
मध्य प्रदेश: रीवा स्थित एक सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां भर्ती एक मरीज के परिजनों ने आरोप लगाया है कि ब्लड बैंक के कर्मचारियों ने उनके एक परिचित का खून लेने से साफ इनकार कर दिया, क्योंकि वह ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखते हैं। परिजनों का कहना है कि कर्मचारियों ने उनसे अपनी ही जाति का डोनर लाने को कहा, जबकि मरीज वैश्य समुदाय से है।
यह कथित घटना मंगलवार, 22 सितंबर को रीवा के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत आने वाले संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल में हुई। हालांकि, अस्पताल प्रशासन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। प्रबंधन का तर्क है कि परिवार द्वारा लाए गए दो संभावित डोनर्स को उनकी मेडिकल स्थिति के कारण अस्वीकार किया गया था।
सीधी जिले की रहने वाली इस बीमार बच्ची के चाचा बैजनाथ वैश्य ने बताया कि डॉक्टरों ने पहले परिवार के एक सदस्य का खून लेने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उसकी उम्र 17 साल से कम थी। इसके बाद उन्होंने अपने एक मित्र जितेंद्र पांडेय को रक्तदान के लिए बुलाया था।
बैजनाथ के मुताबिक, जब वे जितेंद्र को लेकर ब्लड बैंक पहुंचे, तो वहां मौजूद डॉक्टर ने उनसे पूछा कि वे कहां से आए हैं। इसके बाद डॉक्टर ने कथित तौर पर कहा कि आप पांडेय हैं और मरीज वैश्य है, इसलिए यह खून नहीं चलेगा। बैजनाथ ने दावा किया कि डॉक्टर ने उन्हें किसी रिश्तेदार या अपनी ही जाति के व्यक्ति को लाने, या फिर इलाज कर रहे डॉक्टर से लिखित अनुमति लाने को कहा।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बच्ची का इलाज कर रहे डॉक्टर ने पहले कहा था कि वे ब्लड बैंक में किसी भी ग्रुप का खून देकर मरीज के लिए मैचिंग ब्लड ले सकते हैं। लेकिन बाद में जब वे दोबारा डॉक्टर के पास गए, तो उन्होंने मैचिंग ब्लड ही लाने को कह दिया। परिजनों का कहना है कि इसके बाद उन्हें अस्पताल के गेट से अंदर भी नहीं जाने दिया गया।
मरीज के एक अन्य रिश्तेदार वीरेंद्र सिंह वैश्य ने बताया कि बच्ची को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था और उसे तुरंत खून चढ़ाने की जरूरत थी। उन्होंने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा कि ब्लड बैंक ने उनके परिचित का खून लेने से मना कर दिया और वह खुद कुछ समय बाद एक ऑपरेशन से गुजरने वाले हैं, इसलिए रक्तदान नहीं कर सकते। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी आपात स्थिति में वे और लोगों को कहां से ढूंढ कर लाएं।
इन गंभीर आरोपों पर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. प्रियांक शर्मा ने अपना पक्ष रखते हुए सभी दावों को खारिज कर दिया और बताया कि मामले की जांच की गई है। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. लोकेश त्रिपाठी ने जांच के बाद स्पष्ट किया कि ब्लड बैंक में कभी भी किसी की जाति नहीं पूछी जाती है।
डॉ. त्रिपाठी ने एक वीडियो बयान जारी कर कहा कि यह एक बेहद गंभीर मामला है जो उनके संज्ञान में आया है। जांच में पता चला कि परिवार के साथ दो लोग आए थे। नियमों का हवाला देते हुए उन्होंने पूरी बात का खुलासा न करते हुए बताया कि उनमें से एक डोनर 'हाई रिस्क बिहेवियर' की श्रेणी में था। वहीं दूसरा व्यक्ति हर्निया का मरीज था, जिसे ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने तभी रक्तदान करने की सलाह दी थी, अगर वह निकट भविष्य में अपना ऑपरेशन नहीं करवाने वाला हो।
प्रभारी ने कहा कि डॉक्टरों ने परिजनों को यही सलाह दी थी कि वे परिवार के किसी ऐसे सदस्य को लाएं जिसकी मेडिकल हिस्ट्री उन्हें पता हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्लड बैंक ही वह जगह है जहां जाति या धर्म कभी नहीं पूछा जाता और यह आरोप पूरी तरह से निराधार है। उन्होंने यह बयान इसलिए जारी किया ताकि ब्लड बैंक को लेकर कोई गलतफहमी न फैले।
वहीं, अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जिस व्यक्ति का खून खारिज किया गया था, उसने एक रात पहले शराब का सेवन किया था, जो मरीज के लिए सुरक्षित नहीं था। उन्होंने माना कि यह पूरी गलतफहमी शायद इसलिए पैदा हुई क्योंकि परिवार अपनी बच्ची की तबीयत को लेकर भारी तनाव में था।
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