
भोपाल। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के अजयगढ़ क्षेत्र में मझगांय मध्यम सिंचाई बांध परियोजना से प्रभावित किसानों और आदिवासी परिवारों का आंदोलन 13वें दिन भी जारी रहा। गुरुवार, 24 सितंबर को प्रभावितों ने हाथ-पैरों में प्रतीकात्मक लोहे की बेड़ियां पहनकर ‘बेड़ी सत्याग्रह’ किया। आंदोलनकारियों ने इसे अपने अधिकारों, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक आवाज पर लगाई जा रही कथित बेड़ियों का प्रतीक बताया।
जय किसान संगठन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन में प्रभावित परिवार बढ़ते जलस्तर और खराब मौसम के बावजूद धरना दे रहे हैं। इससे पहले आंदोलनकारी चिता आंदोलन, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह और फांसी-सूली सत्याग्रह जैसे प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं।
‘बेड़ियां’ पहनकर जताया विरोध
गुरुवार को किए गए बेड़ी सत्याग्रह में आंदोलनकारियों ने हाथ-पैरों में लोहे की बेड़ियां पहनकर अपना विरोध दर्ज कराया। आंदोलनकारियों का कहना है कि जिन परिवारों की जमीन, घर और आजीविका बांध परियोजना के कारण प्रभावित हो रही है, उन्हें पर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास दिए बिना विस्थापन की स्थिति में धकेला जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि बेड़ी सत्याग्रह इस बात का प्रतीक है कि प्रभावित लोगों के संवैधानिक अधिकारों पर बेड़ियां डाल दी गई हैं। उनके अनुसार, ग्रामीण लगातार अपनी समस्याएं प्रशासन के सामने रख रहे हैं, लेकिन समाधान नहीं होने के कारण आंदोलन को अलग-अलग सत्याग्रह के माध्यमों से आगे बढ़ाना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि न्याय मिलने तक आंदोलन अहिंसक तरीके से जारी रहेगा और आने वाले दिनों में इसे और व्यापक किया जाएगा।
मुआवजा और पुनर्वास को लेकर सबसे बड़ा विवाद
विस्थापित परिवारों का आरोप है कि बांध परियोजना के कारण प्रभावित होने के बावजूद कई परिवारों को अब तक पूरा मुआवजा और पुनर्वास पैकेज नहीं मिला है। आंदोलनकारियों के अनुसार, मकानों और फलदार पेड़ों के मूल्यांकन से जुड़ी राशि भी कई परिवारों को नहीं मिली है।
ग्रामीणों ने सर्वे और मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि कुछ मामलों में सिंचित जमीन को कागजों में असिंचित दर्ज किए जाने से मुआवजा कम हो गया। इसके अलावा सर्वे, ग्रामसभा और मुआवजा तय करने की प्रक्रिया में प्रभावित परिवारों की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है।
इससे पहले भी आंदोलनकारी पारदर्शी सर्वे, लंबित मुआवजे के भुगतान और समयबद्ध पुनर्वास की मांग उठा चुके हैं।
बढ़ता जलस्तर बढ़ा रहा चिंता
मझगांय बांध के डूब क्षेत्र में जलस्तर बढ़ने के साथ प्रभावित परिवारों की चिंता भी बढ़ रही है। सितंबर के मध्य में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, डूब क्षेत्र के कुछ घरों और बस्तियों तक पानी पहुंचने लगा था और ग्रामीणों ने अपने घरों तथा खेतों के डूबने की आशंका जताई थी।
ऐसे में प्रभावितों का कहना है कि यदि विस्थापन अपरिहार्य है तो पहले परिवारों को उनका पूरा अधिकार, मुआवजा और रहने के लिए उचित पुनर्वास स्थल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
आंदोलन अब दूसरे परियोजना प्रभावितों को भी जोड़ रहा
अमित भटनागर का कहना है कि मझगांय बांध का आंदोलन अब केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं है। आंदोलन में रूंझ परियोजना, केन-बेतवा लिंक परियोजना और ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग से प्रभावित परिवारों के मुद्दे भी उठाए जा रहे हैं। इससे पहले इन परियोजनाओं से प्रभावित किसान और आदिवासी भी मझगांय क्षेत्र के आंदोलन में शामिल हुए हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि बड़े विकास और सिंचाई प्रोजेक्टों की कीमत स्थानीय किसान और आदिवासी परिवार अपनी जमीन, घर, जंगल और आजीविका गंवाकर चुका रहे हैं। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के साथ प्रभावित परिवारों के अधिकारों और पुनर्वास को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
पेड़ों की कटाई और पर्यावरण का मुद्दा भी उठाया
आंदोलन के दौरान विस्थापन के साथ पर्यावरणीय नुकसान का मुद्दा भी उठाया गया है। आंदोलनकारियों ने केन नदी, पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के जंगलों में परियोजनाओं से जुड़ी कथित बड़े पैमाने की पेड़ कटाई पर चिंता जताई है।
अमित भटनागर ने दावा किया कि क्षेत्र में विभिन्न परियोजनाओं के कारण लाखों पेड़ों की कटाई हुई है और इससे जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है। इन आंकड़ों और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर संबंधित सरकारी विभागों के आधिकारिक आंकड़े और स्वतंत्र पर्यावरणीय आकलन से अलग-अलग दावों की पुष्टि किया जाना जरूरी है।
लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं
आंदोलनकारियों का कहना है कि उनका संघर्ष केवल जमीन या मुआवजे तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार यह जल, जंगल, जमीन, आजीविका, सम्मान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे विकास परियोजनाओं के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विकास की प्रक्रिया में विस्थापित होने वाले लोगों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उनका जोर पारदर्शी सर्वे, उचित मुआवजे और सम्मानजनक पुनर्वास पर है।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों का समर्थन
आंदोलन को स्थानीय स्तर पर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों का समर्थन मिला है। इनमें दिव्या अहिरवार, अनमोल आदिवासी, पवन पटेल, गया प्रसाद पटेल और महेश पटेल सहित अन्य लोग शामिल हैं।
आंदोलनकारियों ने कहा है कि जब तक लंबित मुआवजे, पुनर्वास और सर्वे से जुड़े मामलों का समाधान नहीं होता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। सितंबर में शुरू हुआ यह आंदोलन अब 13वें दिन तक पहुंच चुका है और हर दिन विरोध का अलग तरीका अपनाकर प्रभावित परिवार अपनी मांगों को सामने रख रहे हैं।
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