
भोपाल। पिता-पुत्री जैसे पवित्र रिश्ते को कलंकित करने वाले एक जघन्य मामले में विशेष न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपी पिता को- अंतिम सांस तक कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने न केवल कठोर दंड दिया, बल्कि पीड़िता के पुनर्वास और भविष्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पांच लाख रुपये की प्रतिकर राशि भी स्वीकृत की। फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे अपराध समाज की नैतिक संरचना पर सीधा प्रहार हैं और इन पर कठोरतम दृष्टिकोण अपनाना ही न्याय की वास्तविक भावना है।
इस मामले की एक अहम बात यह रही कि आरोपी की पत्नी, जो पीड़िता की मां है, अदालत में पति के पक्ष में खड़ी नजर आईं। बावजूद इसके, वैज्ञानिक साक्ष्य, विशेष रूप से डीएनए रिपोर्ट ने सच को उजागर किया और अदालत ने तथ्यों के आधार पर दोष सिद्ध माना। यह फैसला इस बात का संकेत है कि पारिवारिक दबाव या सामाजिक संकोच न्याय की राह में बाधा नहीं बन सकते।
अभियोजन के अनुसार 27 अक्टूबर 2024 को पीड़िता ने अपनी मां के साथ म्याना थाने पहुंचकर पूरी आपबीती दर्ज कराई। उसने बताया कि वह आठ भाई-बहनों में से एक है। परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से ही तनावपूर्ण थी। पिता को शराब की लत थी और आए दिन घर में विवाद होता था। लगभग छह माह पहले माता-पिता के बीच गंभीर झगड़ा हुआ था, जिसके बाद मां छोटी बेटी को लेकर घर छोड़कर चली गई थीं।
इसी पारिवारिक कलह और मां की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर आरोपी ने 11 बजे रात के करीब अपनी ही बेटी के साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता ने पुलिस को बताया कि आरोपी ने उसे किसी को कुछ भी न बताने की धमकी दी। भय, सामाजिक शर्म और पारिवारिक दबाव के कारण वह लंबे समय तक चुप रही। लेकिन यह अपराध एक बार पर नहीं रुका- आरोपी ने कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया।
पीड़िता के बयान, चिकित्सकीय परीक्षण और बाद में प्राप्त डीएनए रिपोर्ट ने अभियोजन की कहानी को पुष्ट किया। अदालत में बचाव पक्ष ने विभिन्न तर्क दिए, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्य और पीड़िता की सुसंगत गवाही ने आरोपी को दोषी साबित कर दिया।
इस प्रकरण में एक पीड़ादायक पहलू यह भी रहा कि मां ने अदालत में पति का पक्ष लिया। विशेषज्ञों के अनुसार, कई मामलों में सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक विघटन का भय महिलाओं को ऐसे रुख अपनाने पर मजबूर कर देता है। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गवाही और साक्ष्य का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर किया जाएगा, न कि पारिवारिक निष्ठाओं के आधार पर।
डीएनए रिपोर्ट ने यह सिद्ध किया कि आरोपी ही अपराध का जिम्मेदार है। अदालत ने माना कि वैज्ञानिक साक्ष्य निष्पक्ष और विश्वसनीय होते हैं तथा ऐसे मामलों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसी आधार पर विशेष न्यायालय ने कठोरतम सजा सुनाई।
फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने भावनात्मक टिप्पणी की, जिसने पूरे कक्ष को स्तब्ध कर दिया। आदेश में लिखा गया- “एक बेटी का बचपन बार-बार भरोसे के टूटने से सिसकता रहा। पिता के विश्वासघात ने उसकी हर खुशी को बुझा दिया था। वह टूटी थी, अपनों से हारी थी, पर बिखरी नहीं। उसने सच की रोशनी और अटल साहस से न्याय के दरवाजे को खटखटाया, तब न्यायालय ने एक और निर्भया को इंसाफ दिलाया।”
अदालत की यह टिप्पणी न केवल पीड़िता के साहस की सराहना है, बल्कि समाज को भी यह संदेश देती है कि अपराधी चाहे परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।
न्यायालय ने पांच लाख रुपये की प्रतिकर राशि स्वीकृत करते हुए कहा कि यह राशि पीड़िता के पुनर्वास, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए उपयोगी होगी। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए कि राशि समय पर और सुरक्षित तरीके से पीड़िता तक पहुंचे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की आर्थिक सहायता पीड़ितों को नई शुरुआत करने में मदद करती है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है, समाज को संवेदनशीलता, परामर्श सेवाओं और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना होगा।
गुना की यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि यौन अपराध केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रश्न है। जब घर की चारदीवारी के भीतर ही बच्चियां असुरक्षित हों, तो यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का समय है।
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