
भोपाल। प्रदेश में दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित हजारों रिक्त पदों को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस डीडी बंसल की एकल पीठ ने सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव संजय शुक्ला और मध्य प्रदेश वेयरहाउस एंड लॉजिस्टिक कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक अनुराग वर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि पूर्व में दिए गए आदेशों के बावजूद विभिन्न विभागों में दिव्यांगों के लिए आरक्षित पद अब तक क्यों नहीं भरे गए। मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि 30 जनवरी 2024 को दिए गए निर्देशों का अनुपालन किस स्तर तक हुआ है। कोर्ट ने पूछा कि जब छह माह की मोहलत दी जा चुकी थी, तब भी विभागीय स्तर पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई। न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि आदेशों की अवहेलना पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि दिव्यांगजनों को रोजगार देना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व और समान अवसर के अधिकार से जुड़ा विषय है।
22 हजार पद खाली होने का दावा
दरअसल, नरसिंहपुर निवासी दिव्यांग अभ्यर्थी राजेंद्र मेहरा ने याचिका दायर कर बताया कि प्रदेश के विभिन्न शासकीय विभागों में दिव्यांगों के लगभग 22 हजार पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। याचिका में कहा गया कि यह स्थिति न केवल दिव्यांगजनों के अधिकारों का हनन है, बल्कि सरकार की आरक्षण नीति और दिव्यांगजन अधिकार कानून की भावना के विपरीत भी है। इससे पहले भी इसी मुद्दे पर याचिका दायर की गई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने सरकार को रिक्त पद भरने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
छह माह की मोहलत के बाद भी नहीं भरे पद
पिछली सुनवाई में न्यायालय ने राज्य सरकार को छह माह की समय-सीमा देते हुए रिक्त पदों की गणना कर उन्हें भरने की प्रक्रिया प्रारंभ करने को कहा था। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि सभी विभाग आरक्षित पदों की स्थिति स्पष्ट करें और भर्ती की कार्ययोजना प्रस्तुत करें। लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आदेश के बाद भी न तो समुचित विज्ञापन जारी हुए और न ही चयन प्रक्रिया में ठोस प्रगति दिखाई दी। यही कारण है कि अब अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए वरिष्ठ अधिकारियों को सीधे नोटिस जारी किया है।
याचिकाकर्ता ने कहा, “अधिकारियों द्वारा जानबूझकर अवमानना”
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता शिवम त्रिपाठी ने अदालत में तर्क रखा कि संबंधित अधिकारी न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवहेलना कर रहे हैं। उन्होंने इसे अवमानना से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि यदि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी पद रिक्त रहते हैं तो यह न्यायिक आदेशों की अवमानना की श्रेणी में आता है। अधिवक्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और दिव्यांग अभ्यर्थियों के हित में ठोस समयबद्ध आदेश पारित किए जाएं। कोर्ट ने प्रमुख सचिव सहित अन्य अधिकारियों को 15 अप्रैल तक अपना पक्ष स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
दिव्यांगजनों के अधिकारों से जुड़ा व्यापक प्रश्न
यह मामला केवल रिक्त पदों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिव्यांगजनों को समान अवसर देने की संवैधानिक प्रतिबद्धता से भी जुड़ा हुआ है। सरकारी नौकरियों में दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण का प्रावधान उनके सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रमुख माध्यम माना जाता है। लंबे समय तक पद खाली रहने से हजारों योग्य अभ्यर्थी रोजगार से वंचित रह जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भी नियुक्तियां नहीं होतीं, तो यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
नरसिंहपुर निवासी दिव्यांग अभ्यर्थी राजेंद्र मेहरा ने बताया कि प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में दिव्यांगों के करीब 22 हजार पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। उन्होंने कहा कि इन पदों को भरने के लिए पहले भी अदालत ने निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि रिक्त पदों के कारण हजारों योग्य दिव्यांग अभ्यर्थी नौकरी से वंचित हैं, इसलिए उन्होंने मजबूर होकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।
15 अप्रैल को तय होगी आगे की दिशा
अब सभी की निगाहें 15 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि सरकार संतोषजनक जवाब और ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं करती है, तो अदालत कड़े आदेश पारित कर सकती है। यह मामला प्रदेश में दिव्यांगजनों की रोजगार स्थिति और आरक्षण नीति के क्रियान्वयन की वास्तविकता को सामने लाने वाला माना जा रहा है। न्यायालय का यह रुख संकेत देता है कि दिव्यांगजनों के अधिकारों से जुड़े मामलों में अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
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